इंदौर ( कला संवाददाता )। वेस्ट को आज बेस्ट बताकर युवाओं को उम्दा फिल्मों से दूर किया जा रहा है। इसकी मिसाल बहुत से शहरों में होने वाले फिल्म समारोह हैं जहां पर बहुत कम संख्या में युवा फिल्में देखने आते हैं। मशहूर फिल्म विश्लेषक और संपादक श्रीराम ताम्रकर की पुण्यतिथि (13 दिंसबर ) पर आयोजित दो दिवसीय कार्यक्रम में यह बात प्रख्यात चित्रकार और लेखक प्रभु जोशी ने कही। उन्होंने इस बात पर भी चिंता जताई कि भारतीय फिल्मों को पुरातनपंथी बताकर भी दर्शकों को भ्रमित किया जा रहा है। उन्होंने कहा, लोग श्रीराम ताम्रकर जी को सिनेमा का चलता-फिरता इनसाइक्लोपीडिया कहते थे, मगर मेरे लिये तो वे सिनेमा की चलती-फिरती उम्मीद थे। नेपथ्य में रहकर उन्होंने जो कुछ सिने संसार को दिया है, उसका सही आकलन करने में अभी समय लगेगा। अभी तो हमें उनके द्वारा लिखी गई आखिरी किताब को प्रकाशित कर लोगों तक पहुंचाना है। आयोजन में कृष्ण कुमार अष्ठाना और सत्यनारायण व्यास ने भी अपने विचार रखे। उनके योगदान को याद किया।
सिनेमा और समाज का पुराना नाता
कार्यक्रम में सिनेमा और समाज विषय पर आयोजित सत्र को सर्वश्री मनमोहन चड्ढा, जयदीप कर्णिक और अनिल चौबे ने संबोधित किया। अनिल चौबे ने कहा कि आज कम बजट में बेहतरीन फिल्में बन रही हैं। ये फिल्में ऐसी हैं जो समाज में चल रहे आज के मुद्दों पर बात करती हैं। लेखक मनमोहन चड्ढा ने कहा कि सिनेमा और समाज में पुराना नाता है। उसने समाज को बहुत कुछ सिखाने के साथ-साथ समाज को बदला भी है। विश्वविद्यालयों में सिनेमा को पढ़ाया जाना चाहिए। आज भी सिनेमा को लेकर घरों में बात नहीं होती है। इस सोच को दूर करने की जरूरत है। युवाओं को अच्छे निर्देशकों की फिल्म देखना चाहिए।
ताम्रकर एक अच्छे इंसान और शिक्षक थे
जयदीप कर्णिक ने नईदुनिया में श्रीराम ताम्रकर के साथ बिताए वक्त को याद किया। उन्होंने कहा कि श्रीराम जी इंदौर में रहकर फिल्म समीक्षक के रूप में पूरे देश में चर्चित रहे। वे जितने अच्छे इंसान थे, उतने ही बेहतर शिक्षक भी थे। वंचित वर्ग के बच्चों की उन्होंने काफी मदद की। उन्होंने कहा, मदर इंडिया, सलीम लंगड़े पर मत रो, चक दे इंडिया, भाग मिल्खा भाग जैसी फिल्में समाज पर सीधा असर डालती हैं। फिल्मों का समाज से गहरा संबंध है। हालांकि ‘फायर’ जैसी फिल्मों को स्वीकारने में समाज हिचक भी दिखाता है, इनकी आलोचना भी होती है, लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं कि फिल्में समाज में बदलाव लाती हैं। कर्णिक ने सवाल उठाया कि हमें यह देखना होगा कि समाज में जो प्रतीक ढह रहे हैं, उनका स्थान क्या फिल्में ले सकती हैं? साथ ही कहा कि फिल्में समाज में उपदेशक की भूमिका भी निभा सकती हैं।’सिनेमा: शिक्षा और समझ’ पर एके सिंह, चन्दन गुप्ता और अनुराधा शर्मा ने बात रखी। अरुण मिश्र द्वारा निर्देशित ‘श्रीराम ताम्रकर पर लघु फिल्म भी दिखाई गई। साथ ही विमल रॉय द्वारा निर्देशित फिल्म ‘परख’ का भी प्रदर्शन हुआ।
कार्यक्रम में शशिकपूर को दी गई श्रद्धांजलि
कार्यक्रम के दूसरे दिन ‘सिनेमा: नयी सदी और उसके दो दशक’ पर बात करते हुए पिछले सत्रह वर्षों की सर्वश्रेष्ठ 15 फिल्मों पर अनिल चौबे ने चर्चा की। मधु शुक्ला और विनोद भारद्वाज ने ‘सिनेमा में स्त्री एवं स्त्री निर्देशकों का सिनेमा’ पर बात की। संजय पटेल ने ‘जीवन में गूंजता फिल्म संगीत’ विषय पर चर्चा रखे जबकि जय प्रकाश चौकसे ने ‘शशि कपूर: बड़े कद का अनुज’ में शशि कपूर से जुड़े कई रोचक किस्से सुनाए। इस दिन सत्यजीत रे की फिल्म ‘सद्गति’ और इस्माइल मर्चेंट की फिल्म ‘इन कस्टडी’ का प्रदर्शन हुआ। कार्यक्रम में सिनेमा प्रेमी और श्रीराम ताम्रकर से जुड़े कई लोगों ने हिस्सा लिया।

