इंदौर स्टूडियो डॉट कॉम। भारत भवन,रंगमंडल के कलाकारों के लिये 12 फरवरी 2022 का दिन बेहद यादगार बनने जा रहा है। इस दिन रंगमंडल के वे सभी कलाकार एक बार फिर मिलेंगे जो करीब 40 साल पहले भारत भवन में पहली बार एक-दूसरे से मिलना शुरू हुये थे। 40 साल पहले इन कलाकारों ने ‘बाबा’ यानी बी.वी. कारंत के नेतृत्व में नाटकों का एक ऐसा अविस्मरणीय युग रचा था, जो अब असंभव लगता है। कलाकारों के मिलने का यह प्लान कैसे बना ? यह बताने के साथ ही रंगमंडल के उन दिनों याद कर रहे हैं वरिष्ठ अभिनेता,लेखक-आशीष कोतवाल।’
——————————– …अचानक मुंबई से गंगा का फोन आया। गंगा मतलब मुंबई का स्थापित प्रसिद्ध अभिनय प्रशिक्षक आनंद मिश्रा .. गंगा के शिष्यों में शुमार है .. कैटरीना कैफ, वरुण धवन जैसे कई सितारे । गंगा ने एक प्रस्ताव रखा .. आशीष, एक गेट टू गेदर करते हैं, पुराने रंग मंडलियों का, बरसों हो गए सबको मिले हुए, कई मित्र तो अब इस दुनिया में ही नहीं रहे, इस कोरोना काल में कब कौन बिछड़ जायेगा कोई नहीं जानता। मैं भी सोचने लगा .. बात तो सही है, आयडिया भी बहुत ही बढ़िया हैं। धीरे-धीरे यह बात रंग मंडल के कलाकारों को पहुंचने लगी, सभी ने कहा, मिलते हैं 12 फरवरी को, भारत भवन के उद्घाटन की तारीख के एक दिन पहले।(नाटक ‘घासीराम कोतवाल’…सबसे बीच में फिरंगी की भूमिका में द्वारका पुस्वल )
मेरे दिमाग में वह दिन तैरने लगे .. 1982 में लम्बी प्रक्रिया के बाद इंदौर से गोपाल दुबे और मेरा चुनाव भारत भवन के रंग मंडल में बतौर प्रशिक्षु अभिनेता के तौर पर हुआ और हम दोनों भारत भवन पहुंचे। उन दिनों भारत भवन का निर्माण चल रहा था, रंग मंडल के नाटकों की रिहर्सल गाँधी भवन में होती थी, ज्वानिंग लैटर देते ही हमारी रवानगी गाँधी भवन कर दी गई। (नाटक ‘घासीराम कोतवाल’ का एक और यादगार दृश्य )
घासीराम कोतवाल की रिहर्सल चल रही थी, गेरुआ कुर्ता और काली पेंट पहने कारंत जी (हम सब के “बाबा”) एक ओर खड़े रिहर्सल करवा रहे थे। हमें देखते ही उन्होंने जयंत को इशारा किया, जयंत यानी की आज का फिल्म और टीवी का प्रसिद्ध कला निर्देशक जयंत देशमुख। वे उस वक्त ‘घासीराम कोतवाल’ नाटक के स्टेज मैनेजर थे, जयंत ने हमें घासीराम के ब्राम्हणों में शामिल कर दिया, मेरी तो समझ में ही नही आ रहा था कि करना क्या है ? ‘घासीराम कोतवाल’ नाटक हमने देखा भी नहीं था। जयंत ने मजाक किया .. आशीष कोतवाल, तू तो है ही कोतवाल, सब हो जायेगा, दो दिन में हमने नाटक के ब्राम्हणों की मूवमेंट सीख ली .. घासीराम कोतवाल से शुरू हुई मेरी रंग यात्रा अगले पांच साल तक निरंतर चलती रही।(रंगमंडल, भारत भवन की एक और यादगार प्रस्तुति – ‘दो कश्तियों का सवार’ ) रंग मंडल में नए दोस्त बने .. जबलपुर से शोभा मोदी, गंगा मिश्रा, राज कुमार कामले, आलोक चटर्जी और रंग मंडल के सहायक निदेशक अलख नंदन | ग्वालियर से सरोज शर्मा और आभा चतुर्वेदी। भोपाल से कुलभूषण दिल्लौरी, अरुण वर्मा, राकेश बिदुआ, कमल जैन, प्रभा माथुर, संगीतकार आमोद भट्ट और हमारे प्रॉडक्शन मैनेजर जावेद जैदी। रायपुर से जयंत देशमुख, दिनेश दुबे, जेपी शर्मा और ओम प्रकाश मौर्य। उज्जैन से वकार फारुकी और राजेन्द्र अवस्थी। बिलासपुर से मांगीलाल शर्मा। ललितपुर से राकेश साहू, बैतूल से अनीता दुबे । शाढौर से महेंद्र सिंह ठाकुर .. दिल्ली से राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से प्रशिक्षित वरिष्ठ आभिनेत्री के पद पर विभा मिश्रा, तकनीकी निर्देशक अलोपी वर्मा और सुरेश भारद्वाज, विशेष कर्तव्यस्त अधिकारी नीलम मानसिंग चौधरी .. और सबसे ऊपर थे सुपर बॉस बी.वी. कारंत ..। बाबा को भी मैंने दोस्तों की लिस्ट में शामिल इसलिए किया क्योंकि रंग मंडल के निर्देशक होते हुए भी हम सबके साथ उनका व्यवहार बहुत ही मित्रवत था, हम लोग कभी भी उनसे व्यक्तिगत चर्चा कर सकते थे।(नाटक ‘महानिर्वाण’ के एक दृश्य में बाबा यानी बी.वी.कारंत )
बाद में समय-समय पर इसमें नये-नये साथी जुड़ते गये, भोपाल के ग़ज़ल गायक जुल्फिकार अली, सागर के गणेश चौरसिया, दिल्ली से सत्यव्रत राउत और गायिका रूबी राउत, उज्जैन से संजय मेहता, ग्वालियर से प्रदीप गोस्वामी, मोदी नगर से अलका याग्निक, रायपुर के हबीब तनवीर की नाट्य संस्था नया थियेटर और छत्तीसगढ़ की लोक कला नाचा से जुड़े लोक कलाकार द्वारका और अमर .. राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से प्रशिक्षित, उज्जैन के जितेन्द्र शास्त्री .. कर्नाटक से आया इकबाल, भोपाल के संगीतकार राजीव सिंह और अनूप जोशी “बंटी” ..। फेहरिस्त लम्बी हैं साथियों की और देश-विदेश के प्रसिद्द निर्देशकों के साथ खेले गए नाटकों की और नाटक करते हुए प्राप्त अभिनय और रंगकर्म के प्रशिक्षण की ..(नाटक ‘हयवदन’ में रंगमंडल के कलाकारों का कमाल )
शुरुआत हुई नीलम जी के निर्देशन में ज्यां पाल सार्त्र के नाटक रिस्पेक्टेबल प्रोस्टीट्यूट के हिंदी अनुवाद ‘बेनाम जिंदगी’ से , फिर एक के बाद एक नाटक .. अलखजी के साथ .. जज, आधे अधूरे, महानिर्वाण। बाबा के साथ मिट्टी की गाड़ी, हयवदन, मटिया बुर्ज। फ्रिट्ज बेनेविट्ज के साथ खड़िया का घेरा, किंग लियर, और बगरो बसंत हैं । जॉन मार्टिन के साथ तीन ग्रीक ट्रेजेडीज । राजेन्द्र गुप्त के साथ ब्लड वेडिंग ..। हर नाटक के साथ अभिनय और रंगकर्म सीखने का नया अनुभव था। (नाटक ‘हयवदन’ का एक प्रभावपूर्ण दृश्य में आलोक चटर्जी के साथ विभा मिश्र )
और जो नहीं हो सका .. बाबा चाहते थे कि उन दिनों राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में पढ़ने वाले ग्वालियर के पियूष मिश्रा को भी रंग मंडल में लाया जाए, लेकिन जिद्दी पियूष दिल्ली में ही रंगकर्म करना चाहता था, सो वे नहीं आये। रंग मंडल, बरसों बाद पियूष मुंबई चला गया और गीतकार, पटकथा लेखक और अभिनेता के तौर पर ख्याति पायी। बाबा डिक्टेटर नाटक के लिए पंकज कपूर को बुलाना चाहते थे, उनका तर्क था .. एक प्रशिक्षित अभिनेता किस तरह से अपने किरदार पर काम करता है ये पंकज कपूर से सीखने मिलेगा, पंकज भाई भोपाल भी आये, लेकिन कुछ ही दिनों बाद वो मुम्बई चले गए और फिर कभी रंग मंडल मतलब हम लोगों के साथ नाटक करने नहीं आ पाए ।यह सिलसिला चार साल तक चला…चार साल लगातार साथ काम करने के बाद बिछड़ने का सिलसिला शुरू हुआ .. पहले अरुण वर्मा मुंबई में फिल्मों में अभिनय करने चले गये, फिर राकेश बिदुआ और प्रभा माथुर गए, आभा मिश्रा गईं, पीछे पीछे गंगा यानी आनंद मिश्रा भी मुंबई पहुंच गये ,1987 में मैं भी मुंबई गया। गया तो मराठी थिएटर करने था, लेकिन किस्मत ने मराठी फिल्म में हीरो बना दिया।इस बीच कई साथी इस दुनिया के रंगमंच को हमेशा के लिये छोड़ गये .. कुलभूषण दिल्लौरी, मीना सिद्धू, द्वारका पुस्वल, वकार फारुकी, आशुतोष पंडया, श्रद्धेय अलखजी, आदरणीय बाबा ..। ….गंगा के फोन ने पुरानी यादें सामने ला दी। अब इंतजार है 12 फरवरी का, जब हम सब रंग मंडल के पुराने साथी एक बार फिर मिलेंगे ..और याद करेंगे कमाल के वो दिन..।
बेहतरीन कदम, यह दुर्भाग्य है कि 1992 में मैं रंगमंडल में शामिल होने से वंचित रह गया, रीवा मध्य प्रदेश में रंगमंच करते हुए बुलावा आया था लेकिन फिर शेखर वैष्णवी जी का तार आया कि अयोध्या की घटना के कारण सब रद्द कर दिया गया है, इसके बाद न कोई सूचना मिली और न मैंने कोई प्रयास किया
बेहतरीन कदम, यह दुर्भाग्य है कि 1992 में मैं रंगमंडल में शामिल होने से वंचित रह गया, रीवा मध्य प्रदेश में रंगमंच करते हुए बुलावा आया था लेकिन फिर शेखर वैष्णवी जी का तार आया कि अयोध्या की घटना के कारण सब रद्द कर दिया गया है, इसके बाद न कोई सूचना मिली और न मैंने कोई प्रयास किया
जी,बहुत धन्यवाद आलोक जी।
धन्यवाद।