इंदौर स्टूडियो डॉट कॉम। 21 दिन तक चले भारत रंग महोत्सव का समापन समारोह कमानी ऑडिटोरियम में आयोजित हुआ जिसमें मुख्य अतिथि के तौर पर प्रसिद्ध दिग्गज थियेटर निर्देशक और अभिनेता श्री रूद्रप्रसाद सेनगुप्ता उपस्थित हुए। समापन समारोह के बाद लाईरेम्बीगी एशी का मंचन हुआ। इस मणिपुरी नाटक का मंचन कोरस रिपर्टरी थिएटर ग्रुप ने किया। इस नाटक को श्री रतन थियाम ने लिखा और निर्देशित किया है। एनएसडी सोसाइटी के कार्यवाहक अध्यक्ष डॉ. अर्जुन देव चारण ने समारोह की अध्यक्षता की और नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा के प्रभारी निदेशक श्री सुरेश शर्मा ने मुख्य अतिथि का स्वागत किया और इस आयोजन कोसफल बनाने के लिए काम करने वालों तथा इसमें शामिल होने वालों के प्रति आभार व्यक्त किया।
इस 21-दिवसीय आयोजन में थिएटर प्रेमियों ने जबरदस्त उत्साह दिखाया और नीलकंठ पक्षी की खोज में, रिचर्ड 3, अशांति निवास, तुगलक, रिउन्स इन रिवर्स, बैलीगंज 1990, बिहाइंड द बॉर्डर, आई एम नॉट हेयर और ए केस ऑफ़ क्लैरवोयांस जैसे ज्यादातर नाटकों के मंचन के दौरान सभागार दर्शकों से खचाखच भरे रहे। भारत रंग महोत्सव के दौरान थिएटर के प्रख्यात दिग्गजों ने भी अपनी उपस्थिति दर्ज की जिनमें अमोल पालेकर, नाना पाटेकर, गोविंद नामदेव, मनोज जोशी, एम.के. रैना, हिमानी शिवपुरी, इला अरुण, केके. रैना, अशोक लोखंडे, पीयूष मिश्रा, अनूप सोनी, आदिल हुसैन, राजेश तैलंग, अलका अमीन जैसे एनएसडी के पूर्व छात्र एवं अन्य प्रमुख रंगकर्मी शामिल हैं। उत्सव के दौरान, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय ने पहले संस्थापक-निदेशक श्री सतू सेन और प्रथम रेपर्टरी प्रमुख श्री ओम शिवपुरी को श्रद्धांजलि अर्पित की तथा उनके जीवन पर आधारित मोनोग्राफ का विमोचन किया गया। इस कार्यक्रम में सूफी गीतों (रिहान सुल्तानी), छोलिया नृत्य (लोक झलक सांस्कृतिक कला मंच), मणिपुरी रास (मणिपुरी सांस्कृतिक मंडली), ढोल चोलम (थियम दिलीप सिंह), रासलीला (उत्तर प्रदेष), कालबेलिया (अविश्कलोक कला मंडली), बिहू (श्याम आर्ट्स) जैसे कई रंगारंग लोक कार्यक्रमों का आयोजन किया गया।
21 वें भारत रंग महोत्सव के दौरान, युवा मंच (अद्वितीय) का आयोजन किया गया जहां दर्शकों ने विभिन्न विश्वविद्यालयों के उभरते हुए कलाकारों की ओर से नुक्कड़ नाटक के रूप में प्रदर्शनों को देखा। एनएसडी कैंपस में थिएटर बाजार भी सजाया गया जहां थिएटर प्रेमियों और कला उत्साही लोगों को तरह-तरह की पुस्तकें इकट्ठा करने का मौका मिला जो उनके लिए उपयोगी साबित हो सकती हैं। इसके अलावा यहां लजीज व्यंजनों के भी स्टॉल लगाए गए जिनका यहां आने वाले दर्शकों एवं अतिथियों ने जमकर लुत्फ उठाया।
आयोजन स्थल पर मौजूद मुख्य अतिथि वयोवृद्ध रंगमंच निर्देशक और अभिनेता श्री रुद्रप्रसाद सेनगुप्ता ने कहा, ‘‘मैं दिल्ली और 4 अन्य शहरों में इस 21 दिवसीय उत्सव के बहुत सफल ढंग से आयोजित करने के लिए राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की सराहना करता हूं। मैं यह भली-भांति कह सकता हूं कि दर्शकों ने इस दौरान प्रदर्शित नाटकों का आनंद उठाया, उन नाटकों की सराहना की और उन नाटकों के बारे में बाद में विचार किया। यह महोत्सव नई पीढ़ी को रंगमंच के प्रति उनके विचारों को समृद्ध करने में मददगार साबित होगा। मुझे उम्मीद है कि एनएसडी, देश भर के कलाकारों को यूँही मंच प्रदान करता रहेगा।’’
समापन समारोह के दौरान नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा के कार्यवाहक अध्यक्ष डॉ अर्जुन देव चारण ने कहा, ’’मैं श्री रुद्रप्रसाद सेनगुप्ता और श्री रतन थियाम को धन्यवाद देना चाहता हूं जिन्होंने इसके लिए समय निकाला और इस महोत्सव को ऊंचाई प्रदान की। भारंगम में हुए नाट्यों ने हम सब के मन में अपनी गहरी छाप छोड़ी है। आज इस साल का महोत्सव सम्पन्न हो रहा है और इस मौके पर मैं सभी छात्रों, इसमें हिस्सा लेने वाले लोगों एवं एनएसडी परिवार को धन्यवाद देता हूं जिन्होंने इस आयोजन को सफल बनाने के लिए मिलकर काम किया।’’
एनएसडी के प्रभारी निदेशक प्रो. सुरेश शर्मा ने कहा, ’’इस वर्ष परम्परागत एकल स्क्रीनिंग चयन समिति की प्रणाली को बदलते हुए दोहरी स्क्रीनिंग को लागू किया गया इससे हम यह सुनिश्चित करने की कोशिश कर रहे है कि युवाओं को प्रदर्शन के लिए सबसे अच्छा मंच मिलना चाहिए ताकि उनकी प्रतिभा सामने आए। यह काफी उत्साहजनक है कि आज युवा रंगमंच में रुचि ले रहे हैं। थिएटर का भविष्य अब युवाओं के हाथों में है और वह ही इस विरासत को आगे ले जाने वाले हैं। यह महोत्सव इस दिशा में अगला कदम है और हमें यकीन है कि दर्षक भविष्य में हमें संरक्षण देते रहेंगे।”
समापन समारोह के बाद प्रसिद्ध लेखक और निर्देशक, श्री रतन थियाम के मणिपुरी नाटक लाईरेम्बीगी ऐशो (सांग आफ द निम्फ्स) का मंचन किया गया। नाटक हमें 21 वीं सदी में रहने के बारे में कहानी बताता है, जो वैश्वीकरण, दुनिया भर में गतिशीलता, संचार और सूचना का युग है। हमारी संस्कृति और परंपरा भोजन एकत्र करने, जादुई प्रजनन संस्कारों की किस्मों, पूर्वजों, पृथ्वी, सूर्य, चंद्रमा, आकाश, जंगल, जल और जीवों के साथ जुड़ने से प्राप्त होती है।
जीवन के अनुभवों की गतिशीलता को गति ध्वनि और लय में याद किया जाता है। कभी-कभी इसे दैनिक प्रथाओं या वार्षिक घटनाओं में बुना जाता है, और कभी-कभी बुवाई, कटाई और पैदावार के साथ। इसके अलावा, यह हमारे समुदाय की सुरक्षा से भी संबंधित है। स्थानीय और स्वदेशी मिथक और किंवदंतियां अभिव्यक्ति और व्याख्या दोनों के मौखिक और गैर-मौखिक वाहनों के लिए प्रेरणा का सबसे प्रभावी स्रोत बनी हुई हैं।
यह नाटक आधुनिक समय में पहचान, परंपरा और संस्कृति के संरक्षण के महत्व के इर्द-गिर्द बुना गया है। नाटक हमारे संस्कारों और परंपराओं के सामने आने वाली कई चुनौतियों को समझने की कोशिश करता है, जो हमारी संस्कृति की पहचान है, जो हमारे पूर्वजों से विरासत में मिली है। इस नाटक की विषयवस्तु आधुनिकता, अतीत, वर्तमान और भविष्य के संगम के रूप में कार्य करती है जहाँ बहुत महत्वपूर्ण मुद्दे, जटिल सौंदर्यशास्त्र और दार्शनिक चुनौतियों के बारे में संवाद किया जाता है।

