ग्वालियर,11 नवंबर, 2018 (शकील अख़्तर)। ‘आर्टिस्ट कंबाइन की रंग यात्रा 80 साल से जारी है। इसके मंच पर अब तक 350 से ज़्यादा नाटक खेले जा चुके हैं। सैकड़ों कलाकार इसके सफर का हिस्सा बने हैं। रंगकर्म का यह बेमिसाल सफ़र अब नई प्रतिबद्धताओं के साथ नई उड़ान पर है।‘ यह बात मध्य भारत की सबसे पुरानी नाट्य संस्था आर्टिस्ट कंबाइन के सचिव डॉ.संजय लघाटे ने कही। वे संस्था के दो दिवसीय नाट्य समारोह के संबंध में इंदौर स्टुडियो से चर्चा कर रहे थे।
नाट्य समारोह में दो विशिष्ट प्रयोग: डॉ.लघाटे ने कहा, आर्टिस्ट कंबाइन के 81 वें स्थापना दिवस पर हाल ही में नाट्य समारोह हुआ था जिसमें दो नाटकों का मंचन किया गया। समारोह के लिये एक नाटक आर्टिस्ट कंबाइन की ओर से तैयार किया गया जबकि एक नाटक बाहर की संस्था से आमंत्रित किया गया। इसके पीछे उद्देश्य था कि शहर में काम कर रहे नये कलाकारों और निर्देशकों को तो अपने काम को प्रस्तुत करने का अवसर तो मिले ही, साथ ही दर्शक किसी ऐसे नाट्य समूह की प्रस्तुति भी देख सकें जो अपनी तरह से अच्छा काम कर रहे हैं। इस तरह पहले दिन 30 अक्टूबर को नाटक ‘कमला’ का मंचन किया गया। नाटक के मूल लेखक विजय तेंदुलकर हैं, इसका हिंदी रूपांतर वसंत देव ने किया है। इस नाटक का निर्देशन गीतांजलि गिरवाल ने किया। जबकि 31 अक्टूबर को दूसरा नाटक ‘मैं बोझ नहीं भविष्य हूं’ का मंचन हुआ। यह नाटक बुंदेलखंड की लोक नाट्य शैली स्वांग पर आधारित है। इसका लेखन और निर्देशन डॉ. हिमांशु द्वेदी ने किया है। दोनों ही नाटकों को दर्शकों के साथ शहर के कलाकारों ने भी सराहा। (नाटक के कलाकारों के नाम इस लेख के अंत में दिये गये हैं।)
बाहरी नाट्य संस्थाओं को आमंत्रण : डॉ. लघाटे ने बताया, आर्टिस्ट कंबाइन में हम बाहर की संस्थाओं को लगातार आमंत्रित करते रहे हैं। 12 अगस्त से 16 अगस्त तक हमने चार दिवसीय नाट्य समारोह किया था। इसमें कानपुर के डॉ. उमेंद्र कुमार जी की संस्था के दो नाटकों – ‘पुरूष’ और ‘जांच पड़ताल’ प्रस्तुत किये गये थे। आर्टिस्ट कंबाइन का उद्देश्य है कि शहर के दर्शकों को हर तरह के नाटकों का आनंद मिल सके। कलाकारों को भी अलग-अलग तरह का काम देखने का मौका मिल सके। इसी तरह से संस्था ने 28 फरवरी 2917 ‘रंग कुटुम्ब’ के जयेश भार्गव को उनके नाट्य प्रस्तुति के लिए आमंत्रित किया था। उन्होंने आदि गुरू शंकराचार्य पर एक अच्छा नाटक प्रस्तुत किया था।
नये दौर में रंगकर्म के नये तेवर: डॉ.लघाटे ने कहा, आर्टिस्ट कंबाइन अब वक्त के हिसाब से खुद को बदलने की कोशिश कर रहा है। आज और पहले के रंगकर्म और सोच में काफी बदलाव आ गया है। हम भी अब ज़माने के हिसाब से खुद में काफी बदलाव ला रहे हैं। इसी नज़रिये से संस्था ने ‘आर्टिस्ट कंबाइन इंस्टीट्यूट ऑफ आर्ट’ की स्थापना की है। इसका उद्देश्य है स्कूली बच्चों में नाटकों के प्रति दिलचस्पी जगाना और उन्हें इस विधा के बारे में प्रारंभिक रूप से प्रशिक्षित करना है। यह इंस्टीट्यूट राजा मानसिंह तोमर यूनिवर्सिटी से सम्बद्ध है। इसके ज़रिये हम एक साल का एक कोर्स कराते हैं – ‘जूनियर सर्टिफिकेट इन ड्रामा एंड थिएटर।‘ इसमें 50 नंबर का थ्योरी का पेपर है, 50 प्रैक्टिकल और 15 नंबर क्राफ्ट के लिए हैं। इस तरह कुल 150 नंबर का पेपर है। दो साल से यह सर्टिफिकेट कोर्स जारी है। पांच दिसंबर को हम एक शो भी करेंगे, जिसमें इस कोर्स के लिए काम कर रहे बच्चे अपनी प्रस्तुतियाँ भी देंगे।
आर्टिस्ट कंबाइन’ की सुदीर्घ रंग परंपरा: डॉ.लघाटे ने कहा, आर्टिस्ट कंबाइन’ की सुदीर्घ रंग परंपरा रही है। संस्था की स्थापना 1937 में हुई थी। दूरनदेशी सोच के साथ स्व. वाय सदाशिव भागवत ने इस संस्था की आधारशिला रखी थी। तबसे अब तक यह नाट्य संस्था रंगकर्म के क्षेत्र में साधनारत है। संस्था के अध्यक्ष सदानंद भागवत वर्षों से इसका कुशल नेतृत्व करते आ रहे हैं। उपाध्यक्ष वरिष्ठ रंगकर्मी विजय मोडक हैं। डॉ. लघाटे बताते हैं, 1937 में आर्टिस्ट कंबाइन शौकिया कलाकारों की संस्था थी। उस समय संस्था ज़्यादातर मराठी भाषी कलाकार और संस्कृतिकर्मी जुड़े थे।
1954 में पंजीकरण हुआ,संविधान बना: 1954 में इस संस्था का रजिस्ट्रेशन किया गया। इसका नया संविधान बनाया गया और इसके साथ ही इसमें हिन्दी के कई अच्छे निर्देशक और कलाकार भी जुड़ने लगे। हिन्दी के रंग निर्देशकों और कलाकारों ने उत्कृष्ट काम कर संस्था को गौरवान्वित किया। रंगकर्म को नये आयाम और दिशा दी। इनमें डॉ. कमल वशिष्ठ, हरि गुरेजा, अशोक आनंद जैसे कुछ प्रमुख नाम शामिल हैं। बंसी कौल ने भी एक बार वर्कशॉप यहां पर की है।
80 साल में 350 से अधिक नाटकों का मंचन : डॉ.लघाटे ने बताया, आर्टिस्ट कंबाइन के मंच पर बीते अस्सी सालों में 350 से अधिक नाटकों का मंचन हो चुका है। इसमें मराठी, हिन्दी और संस्कृत के कई अहम नाटक शामिल हैं। आनंदी गोपाल,कुचलिया वृक्षनची, घासीराम कोतवाल, जाग उठा रायगढ़, अलीबाबा चालीस चोर,कन्यादान,आषाढ़ का एक दिन,एक और द्रोणाचार्य जैसे कई यादगार नाटकों को आज भी दर्शक याद करते हैं। विशेष बात यह भी है ग्वालियर के दाल बाज़ार में संस्था का अपना थिएटर हॉल है। संस्था की ओर से रियायती खर्च पर नाट्य संस्थाओं को हॉल भी उपलब्ध कराया जा रहा है। इसके लिये कुछ संस्थाओं ने आर्टिस्ट कंबाइन में खुद को पंजीकृत कराया है। यह सिलसिला जारी है।
नई पीढ़ी को भी सींचने का काम : संजय लघाटे बताते हैं, युवा कलाकारों को ही नहीं संस्था नये कलाकारों को तैयार करने के लिये भी बच्चों के साथ काम करती आई है। पिछले 18 सालों से संस्था बाल नाट्य शिविरों का आयोजन कर रही है। हर साल बाल रंग शिविर 15 अप्रैल से 15 मई के बीच आयोजित होता है। इनमें बड़ी संख्या में नये बाल कलाकार हिस्सा लेते रहे हैं। एक महीने के दौरान उन्हें थियेटर की एबीसीडी सिखाये जाने के साथ ही नाटक भी तैयार किये जाते हैं। इन शिविरों के माध्यम से करीब 16 नाटक खेले गये हैं। शिविर में आये कुछ बच्चे अब भी सक्रिय हैं और वो अपनी-अपनी तरह से रंगकर्म को आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं।
नाटक ‘कमला’ और ‘मैं बोझ नहीं..’ के कलाकार : गीतांजलि गिरवाल निर्देशित नाटक ‘कमला’ में गीताजंलि के साथ ही गोपाल देशपांडे, अनिरूद्ध शर्मा,वसीम कुरैशी,रेणु झंवर और कल्पना पाल ने अभिनय किया। जबकि पार्श्व में मंच परिकल्पना (प्रमोद पत्की), मंच निमार्ण (राजू कजौलिया), रंगभूषा (प्रमोद पत्की,शशिकांत गेवराईकर,वेष भूषा (दिवा चौहान), पार्श्व संगीत संकलन और संचालन ( योगेंद्र धाकड़, संजय गोयल ),सूचक (सुमित),प्रकाश व्यवस्था ( संजय अरोरा),मंच व्यवस्था( संजय गोयल) की थी। सहयोग श्री रामचंद्र,पैठणे,जान्हवी,अनेरी,कृष्ण कुमार का रहा। नाटक ‘मैं बोझ नहीं भविष्य हूं’ में निशांत कुमार आर्य,गौरव मथुरिया,शुभम शर्मा,संतोष माहौर,अवतार वार्ष्णेय,विशाल कर्ण,प्रशांत मिश्रा,अभिषेक मंडोरिया,रमन रावत,उपेंद्र सिंह ने अभिनय किया। अभिनय करने वाले कुछ कलाकारों ने मंच,प्रकाश,संगीत,कॉस्ट्यूम और प्रॉपर्टीज़ में भी अपना योगदान दिया। उनके साथ ही दीपक शर्मा,रवि अहिरवार,पूनम राणा,विकास रावत, क्रीतेंद्र सिंह और विशाल कुमार का भी सहयोग रहा।


