रायपुर में डारियो-फो के लिखे मोनोलॉग पर आधारित एकल नाटक “ए वुमेन एलोन” का शो हुआ । इस ड्राइंग रूम प्ले के प्रयोग को दर्शकों ने बेहद पसंद किया। नाटक देखते वक्त दर्शकों को लगता है जैसे वो खुद घटना के गवाह हैं। नाटक का निर्देशन और अभिनय सिग्मा उपाध्याय ने किया है। सिग्मा छत्तीसगढ़ की जानी पहचानी थिएटर आर्टिस्ट हैं। उनके पिता विभाष उपाध्याय पेशे से इंजीनियर हैं लेकिन वो पपेट और नुक्कड़ नाटकों की वजह से रायपुर में बड़ी पहचान रखते हैं। पिता की तरह ही सिग्मा भी बचपने से रंगकर्म के क्षेत्र में बड़ी लगन से काम कर रही हैं।

नाटक में एक अकेली महिला को उसके पति ने अपने यौन कुंठित भाई और छोटे बच्चे के साथ ताले में बंद कर रखा है। अपने पति द्वारा भावनात्मक, और शारीरिक शोषण के साथ-साथ स्त्री को अपने बच्चे के रोने के बीच पति के भाई से यौन उत्पीड़न भी सहन करना पड़ता है। वह अपनी उम्र से आधे उम्र के प्रेमी के जबरन रिश्ता बनाने की शिकार है। एक दिन पति उन दोनों को हमबिस्तर होते देख लेता है। उसके बाद पति अपनी स्त्री को ताले में बंद कर रखने लगता है। उस बंद मकान में उस स्त्री के साथ देवर की हवस है। पड़ोसी की ताक-झाँक है। अवांछित टेलिफोन काल्स हैं, जिसमें यौन कुंठित आदमी बार-बार स्त्री को फोन करता रहता है। स्त्री को अपनी यौन सुरक्षा के लिए हर हमेशा सतर्क रहना पड़ रहा है। इसी स्थिति में धीरे-धीरे स्त्री का बेकाबू क्रोध दर्शकों के सामने प्रगट होता है। नाटक पितृ सत्तात्मक समाज की दमनकारी प्रकृति को उजागर करता है। नाटक में हास्य की कुछ भावनाओं को ब्लेक कॉमेडी की तरह अभिव्यक्त किया गया है। 1977 के आस पास डारियो-फो ने इस मोनोलॉग को लिखा था। नाटक आज भी प्रासंगिक है। बहुत ही बोल्ड विषय को सिग्मा उपाध्याय की सहज और बेझिझक अभिव्यक्ति नाटक को सफल बनाती है। सिग्मा के सहयोगियों ने नेपथ्य की व्यवस्था जैसी मुस्तैद रखी थी, उससे इन रंगकर्मियों की पेशेवराना प्रतिबद्धता साफ दिखाई देती है। ड्राइंगरूम प्ले विक्टोरियन काल में मेहमानों के मनोरंजन के लिए किया जाता था। यह अब फिर धीरे-धीरे महानगरों में कुछ लोगों ने करना आरम्भ किया है। सिग्मा का ये दूसरा शो था। रायपुर से पहले भिलाई में भी उनका ये प्ले हो चुका है। (रायपुर से योगमिश्र की रिपोर्ट)

