मुम्बई। ‘आज की पत्रकारिता को आत्मा की ज़रूरत है। कलम का महत्त्व खत्म होता जा रहा है। संपादक की सत्ता खत्म हो रही है। ईमानदारी का अभाव दिख रहा है। आज के दौर में जन सरोकार की पत्रकारिता ही जिंदा रहेगी। मुम्बई की आरे कॉलोनी में पेड़ कटते है पर मुम्बई के किसी अखबार में सम्पादकीय नहीँ होती। सम्पादकीय लिखता है ‘देशबन्धु’ जो मुम्बई से नहीं, रायपुर से निकलता है।‘
यह बात ‘नवनीत’ के संपादक विश्वनाथ सचदेव ने पत्रकार हरीश पाठक की राजेन्द्र माथुर फेलोशिप के अंतर्गत लिखी पुस्तक ‘आंचलिक अखबारों की राष्ट्रीय पत्रकारिता’ पर प्रेस क्लब में आयोजित विमर्श में अध्यक्षीय उदबोधन में कही। वरिष्ठ पत्रकार व गांधी शान्ति प्रतिष्ठान, दिल्ली के अध्यक्ष कुमार प्रशान्त ने कहा, ‘आज हम कठिन समय से गुजर रहे हैं। यह शब्दों पर संकट का दौर है। आज की पत्रकारिता में न तो प्राण बचे हैं, न कोई यशोगान।‘
वरिष्ठ पत्रकार नीलकंठ पारटकर ने कहा, ‘यह किताब एक ऐतिहासिक दस्तावेज है जिसमें दर्ज है वह कालखण्ड जब आंचलिक अखबारों की चमचमाती शहतीर ने तख्त तोड़ने की हिम्मत दिखायी थी।’ हरीश पाठक ने कहा, ‘आंचलिक हुए बिना राष्ट्रीय नहीँ हुआ जा सकता’। कार्यक्रम का संयोजन व संचालन ओमप्रकाश तिवारी ने किया।
इस मौके पर मनहर चौहान, ओमा शर्मा, प्रकाश भातम्बेकर, शिल्पा शर्मा, सुदर्शना द्विवेदी, वंदना शर्मा, प्रमिला शर्मा, अलका पांडेय, ज्योति गजभिये, आनन्द सिंह, शीतलाप्रसाद दुवे, सीमा सहगल, अनिल सहगल, प्रताप संसारी, हूबनाथ पांडेय, अभिमन्यु शितोले, कुमार पार्थसारथी, अनन्त श्रीमाली, विमल मिश्र, संजय मासूम, अजय ब्रह्मात्मज, जगदीश पुरोहित, आनन्द भारती, कमलेश पाठक, मृगेंद्र राय, प्रीतम सिंह त्यागी, अनिरुद्ध पाण्डेय, पवन तिवारी, एम जे पांडेय, इंदर जैन, एलिक डिसूजा, आभा दवे, यार मोहम्मद, राजेश झा सहित कई रचनाकार उपस्थित थे।

