Tuesday, June 16, 2026
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आत्म निर्भर होने के लिये ‘टिकट ऑडियंस’ बनाने की ज़रुरत: ओम कटारे

‘संस्कृति मंत्रालय द्वारा अचानक अनुदान रोके जाने से कलाकारों पर बड़ा प्रहार हुआ है, अगर इसकी पूर्व सूचना दी जाती तो कलाकारों को अपने स्तर पर तैयारी करने का मौका मिल जाता!.. लेकिन मेरा मानना है कि कला संस्थाओं को ‘टिकट ऑडियंस’ बनाने की ज़रूरत है, ताकि आत्म निर्भरता बढ़ सके। हमने भी यही कोशिश की है’।…प्रख्यात नाट्य निर्देशक, अभिनेता और ‘यात्री’ रंगमंच, मुंबई के प्रमुख ओम कटारे ने यह बात कही। उनसे इस विषय के साथ उनके थियेटर ग्रुप को लेकर हाल ही में शकील अख़्तर ने बातचीत की। प्रस्तुत है उसी बातचीत के संपादित अंश-The Traveler: Mumbai-based Actor and Director Om Katareआपको याद दिला दें कि हाल ही में संस्कृति मंत्रालय ने कला संस्थाओं को दिया जाने वाला अनुदान (Grant) को फिलहाल रोक दिया है। ‘कूल्ड ऑफ़’ की वजह से कई कला संस्थाएं प्रभावित हुई हैं। इस विषय में कलाकारों ने संस्कृति मंत्रालय के अधिकारियों के समक्ष अपनी चिंताएं भी ज़ाहिर की, परंतु अभी तक इसका कोई समाधान सामने नहीं आ सका है। इसी संदर्भ पर ओम कटारे जी से चर्चा शुरू हुई।Om Katare with the theater artists of 'Yatri'. A report by Shakeel Akhter. indorestudio.comशकील अख़्तर: आपको क्या लगता है, अचानक ग्रांट बंद कर देने का रंगकर्म पर कितना असर पड़ेगा?
ओम कटारे
: इसका रंगकर्म पर गंभीर असर हुआ है। बहुत सी नाट्य संस्थाओं का काम रुक गया है। नाट्य संस्थाओं के प्रमुख दिल्ली के चक्कर काट रहे हैं। हम पर भी इसका स्वाभाविक असर हुआ है। दो साल तक जो काम किया गया, उसका भुगतान अब सभी के लिये एक चुनौती बन गया है। इस नज़रिये से रंगकर्म का एक यह बड़ा नुकसान है। संभल पाने में वक्त लगेगा। यह बात हम जानते हैं कि आज किसी भी संस्था के लिये कलाकारों को संभालना आसान नहीं है। लेकिन यह हो गया है, ऐसे में आपका अनुभव क्या कहता है?
– मेरा यही कहना है कि मुंबई की तरह, हर शहर की कला संस्थाओं को अपनी ‘टिकट ऑडियंस’ बनाने की ज़रूरत है। हिन्दी रंगमंच होने के नाते हमने भी यही किया। अगर लोगों की पास लेकर या मुफ़्त में नाटक देखने की आदत बनी रही तो संस्थाओं का संभल पाना मुश्किल होगा। बिना खर्च के कला कर्म संभव नहीं। चाहें नई संस्थाएं हों या पुरानी, सभी को आत्मनिर्भर होने की ज़रूरत है। हालांकि फिलहाल सरकार को भी उदारता से विचार करने ज़रूरत है।Om Katare with the theater artists of 'Yatri'. A report by Shakeel Akhter. indorestudio.com मुंबई में टिकट लेकर नाटक को देखने का जो कल्चर है, वो दूसरे हिन्दी राज्यों में क्यों नज़र क्यों नहीं आता ? बेशक कुछेक अपवादों को छोड़कर।
मेरी समझ से ऐसा होना एक लंबी प्रक्रिया का हिस्सा है। ‘यात्री’ ने इसके लिये शुरू से काम किया। हमने मंच पर अपना बेस्ट ‘परफॉर्म’ किया और ‘टिकट ऑडियंस’ तो डेवलप की। उसने हमें आगे बढ़ने में मदद की। मुंबई NCPA और पृथ्वी थियेटर में हमारे शोज़ लगातार चलते रहते हैं। हिन्दी भाषी राज्यों की संस्थाओं को भी यही करना होगा। Om Katare with the theater artists of 'Yatri'. A report by Shakeel Akhter. indorestudio.comआप मुंबई से बाहर हिन्दी प्रदेशों में  परफॉर्म करने जाते हैं, तब क्या महसूस करते हैं ?
हमें नाट्य प्रदर्शन के प्रस्ताव तो मिलते ही रहते हैं, परंतु आमंत्रित करने वाली संस्थाएं अक्सर प्रस्तुति के लिये कोई मान देय नहीं देना चाहती। संस्थाएं आने-जाने और एक दो दिन के प्रवास का खर्च देकर ही आयोजन करना चाहती हैं। यह भी ठीक नहीं। इसी वजह से हमने बहुत से शो नहीं किये।A scene from the play *Aaya Re Aaya AI Aaya*शकील अख़्तर: आप कई प्रसिद्ध नाटकों के निर्माता रहे हैं, आपके नये नाटक का नाम है- ‘आया रे एआई आया’….क्या है इस नाटक में…
कॉमेडी तो मेरा सिग्नेचर है ही, लेकिन यह नाटक बहुत गंभीर विषय को हल्के-फुल्के अंदाज़ में पेश करेगा। एआई (AI) आज हमारी ज़िंदगी के हर हिस्से में दखल दे रहा है। हम यह महसूस ही नहीं कर पा रहे हैं कि यह कितनी तेज़ी से हमारे रिश्तों, काम और सोच पर हावी हो रहा है। यह बच्चों के लिए तैयार किया गया नाटक है, जिसमें हम AI के दौर में मानवीय संवेदनाओं की बात कर रहे हैं। हम इसका पहला शो NCPA , मुंबई में कर चुके हैं। पहला शो हाऊस फुल रहा और बहुत ही अच्छा रेस्पांस मिला।  असल में, जब आप थिएटर में कोई नया विषय लाते हैं, तो वह समाज को आईना दिखाने का काम करता है। ‘फोन पे’ के बाद ‘एआई’ पर यह हमारा एक ऐसा ही दिलचस्प प्रयोग है। Om Katare's theatre group, 'Yatri', has completed 47 years of its existence.यात्री थियेटर के 47 साल पूरे हो चुके हैं, कैसे शुरू हुआ था इसका सफ़र?
वह 1978 का दौर था। मैं ‘फिल्मालय’ में ट्रेनिंग कर रहा था। तब हमने एक छोटा सा समूह बनाया। किसी ने ‘यात्री’ नाम सजेस्ट किया और हमने बिना किसी बड़ी योजना के बस काम शुरू कर दिया। उन दिनों मुंबई में ‘पृथ्वी थिएटर’ का एक नया आंदोलन शुरू हुआ था। पहला नाटक शरद जोशी जी का ‘एक था गधा उर्फ अलादाद खां’ था। वो हमारे संघर्ष के दिन थे। मुझे याद है, शुरुआती दिनों में जब हम पृथ्वी थिएटर पर नाटक करते थे, तो टिकट बेचने की अनुमति नहीं थी। हम लोग मेकअप में ही, नवाबों की ड्रेस पहने हुए थिएटर के बाहर झोली फैलाकर खड़े हो जाते थे। पहली बार 240 रुपये का कलेक्शन हुआ था। यह शुरुआती बात मुझे आज भी याद है। उस वक्त न ऑडियंस थी, न पैसा, बस एक जुनून था। Prithvi Theatre Mumbai आप दर्शकों की ताकत की हमेशा बात करते हैं, ‘पृथ्वी थिएटर’ का इसमें क्या योगदान रहा?
‘यात्री’ रंगमंच पर थोड़ी बहुत पहचान बना पाया है उसकी वजह पृथ्वी थियेटर है, यात्री पृथ्वी थियेटर पर ही जन्मा था 16 जनवरी 1979 को। इससे जुड़ी हमारी हज़ारों यादें हैं। एक बार ‘सखाराम बाइंडर’ के शो के दौरान AC ख़राब हो गया। दर्शकों में कोई चिल्लाया- ‘AC चालू करो’ और उधर मंच से मेरा संवाद आया- ‘उससे कोई फायदा नहीं होगा’.. दोनों बातें एक साथ जुड़ गई। इसके बाद पूरा हाल ठहाकों से गूंज उठा। ऐसे ही अनेक क़िस्से है जिन्हें सोचकर आज भी हंसी आती है। पृथ्वी थिएटर के मैनेजर ने मुझे सिखाया कि पैसे कैसे बचाते हैं। उन्होंने मेरा किराया बढ़ाकर मुझे बचत करना सिखाया। यह संघर्ष ही है जिसने मुझे सिखाया कि अगर आप अच्छा नाटक बनाएंगे, तो 200 लोग 2000 में कब बदल जाएंगे, आपको पता भी नहीं चलेगा। Prithvi Theater Space, Mumbaiआप नाटकों में नए प्रयोगों और नवाचार की बात करते हैं, खासकर ‘पृथ्वी हाउस’ जैसे स्पेस का इस्तेमाल। इसके पीछे क्या सोच है?
इनोवेशन के लिए आपको ‘छोटा’ शुरुआत करनी पड़ती है। ‘पृथ्वी हाउस’ एक इनक्यूबेशन स्पेस की तरह है, जहाँ हम नए विचारों का टेस्ट करते हैं। ‘फोन पे’ नाटक पहले वहां 40 लोगों के बीच किया, फिर उसे डेवलप करके एक हज़ार सीट वाले ऑडिटोरियम तक ले गए। थिएटर में हम हर शो के साथ इम्प्रोवाइज करते हैं, लेकिन मैं शो के दौरान कलाकारों को इम्प्रोवाइजेशन की अनुमति नहीं देता, क्योंकि स्क्रिप्ट की पवित्रता बनी रहनी चाहिए।Om Katare with children at a summer theatre workshop. नवाचार का कोई अनोखा प्रयोग, जो आपको अच्छा लगा ?
हमने डॉ. मुकेश बत्रा की बायोपिक बनाई, जो एक अनोखा प्रयोग था। जीवित व्यक्ति पर नाटक बनाना जोखिम से भरा है, लेकिन यह प्रेरणा का बहुत बड़ा ज़रिया है। मुझे संतोष है कि मैंने यह काम किया।A scene from the play *Kaalchakra*, directed by and starring Om Katare.‘कालचक्र’ जैसे नाटकों के जरिए आप सामाजिक संदेश भी दे रहे हैं, यह यात्रा कैसे जारी है?
‘कालचक्र’ हमारा सबसे प्रिय नाटक है। यह बुज़ुर्गों (old aged) की समस्याओं पर आधारित है। इसे पिछले 30 सालों से कर रहे हैं। आज भी हमारे सीनियर सिटी जन दर्शकों के लिए इसके टिकट नि:शुल्क होते हैं। हम चाहते हैं कि लोग यह समझें कि वृद्ध अवस्था कोई श्राप नहीं। हमारा मक़सद सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि एक बेहतर समाज का निर्माण है।Om Katare with his team at Prithvi Theatre, Mumbai on completion of 46 yearsनए कलाकारों के लिए आपका क्या संदेश होगा जो थिएटर में करियर देख रहे हैं?
देखिए, थिएटर एक मंदिर है। यहाँ लोग आ रहे हैं, आप ख़ुद नहीं। यहाँ आप पूरी तैयारी के साथ आइए। पूरी तैयारी कीजिये, अच्छे नाटकों को पढ़ते रहिये, अपनी भाषा और उच्चारण पर काम कीजिये। बहुत से एक्टर फिल्मों की चकाचौंध के पीछे भागते हैं और अपना क्राफ्ट भूल जाते हैं। कम से कम इस विधा को समझने के लिए आपको रगड़कर काम करना होगा। अगर आप थिएटर में अनुशासन रखेंगे, तो सफलता ख़ुद आपके पास आएगी।A scene from the play *Chandu Ki Chachi*, directed by Om Katare.चलते-चलते आपको बता दें, 1978 में स्थापित यात्री थियेटर समूह अब तक 100 से अधिक नाटकों का निर्माण कर चुका है। इनके 6,700 से अधिक शोज़ हुए हैं। मुंबई सहित देश और विदेश में उनके नाटकों के मंचन होते रहते हैं। उनके दर्जनों सफल नाटक रहे हैं। इनमें से काल चक्र एक ऐसा नाटक है, जो बीते तीन दशकों से चल रहा है।A scene from the play *Kaalchakra*, directed by and starring Om Katare.इसके अलावा जंगली कबूतर, हद कर दी आपने, फ़ोन पे, रावण लीला, चिंता छोड़ चिंतामणि संस्था के सबसे चर्चित और पसंदीदा नाटक रहे हैं। यात्री की एक और बड़ी बात ये भी है कि इस थियेटर ग्रुप ने कोई 3 हज़ार से अधिक ऐसे कलाकार तैयार किये, जिन्होंने पहली बार रंगकर्म में अपना कदम रखा। आगे शकील अख़्तर की एक और रिपोर्ट – पुणे में ‘वामा’ के मंच पर रवींद्रनाथ ठाकुर, श्वेता सेन की अनूठी प्रस्तुति, श्वेता सेन प्रसिद्ध संगीतकार, अभिनेता, गायक शेखर सेन की जीवन संगिनी हैं। https://indorestudio.com/vama-pune-shruti-natak-rabindranath-tagore-shweta-sen/

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