Wednesday, May 13, 2026
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नाटक ‘आनंद मठ’ के मंचन की जारी है तैयारी -आलोक चटर्जी

शकील अख़्तर,इंदौर स्टुडियो।
आनंद मठ..। आज़ादी के अमृत महोत्सव के अवसर पर भोपाल में हम बंकिमचंद्र चटर्जी के इस उपन्यास पर आधारित नाटक का मंचन करने जा रहे हैं। आजकल मैं इसी काम में व्यस्त हूँ। बांग्ला के इस ख्यात उपन्यास पर फ़िल्म तो बनी है परंतु रंगमंच पर पहली बार एक नाटक के रूप में यह काम दर्शकों के सामने आ सकेगा। इसका इस नाटक का पहला प्रदर्शन दिसंबर के पहले हफ़्ते में ही करने का इरादा है। तैयारी जारी है। मध्यप्रदेश नाट्य स्कूल के पूर्व निदेशक और ख्यात रंग-निर्देशक,अभिनेता आलोक चटर्जी ने ताज़ा चर्चा में यह बात कही।ऐतिहासिक उपन्यास का स्वतंत्रता संग्राम पर गहरा प्रभाव:
उन्होंने कहा, हम जानते ही हैं इस ऐतिहासिक उपन्यास का लेखन बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय 1882 में किया था। इस कृति का भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम और स्वतन्त्रता के क्रान्तिकारियों पर गहरा प्रभाव पड़ा था। भारत का राष्ट्रीय गीत ‘वन्दे मातरम्’ भी इसी उपन्यास से लिया गया है। चार खंडों के इस काम को मैंने ही स्क्रिप्ट में बदला है। यह नाटक कुल 1 घंटे और 40 मिनिट की अवधि का है। इसका महत्व इसलिये भी बहुत है क्योंकि इसका काल 1857 के ऐतिहासिक आंदोलन से भी पहले का है। इसमें 1742 में राज सत्ता के विरूद्द संन्यासियों का विद्रोह है। यह उस दौर की बात है जब सिराजुद्दौला लड़ाई हार चुका है और मीर जाफ़र के साथ बंगाल पर ईस्ट इंडिया कंपनी का राज है।नवाब बनने के लालच ने बनाया गद्दार:
आपको बता दें, मीर जाफ़र 1757 से 1760 तक बंगाल का नवाब था। नवाब बनने से पहले वह सिराजुद्दौला का सेनापति था। नवाब बनने की उत्कट इच्छा की वजह से ही उसने पहले अपने नवाब सिराजुद्दौला के साथ छल किया और वह वह प्लासी के युद्ध में रॉबर्ट क्लाइव के साथ मिल गया। रॉबर्ट क्लाइव ने मीर जाफ़र को बंगाल का नवाब बनाने का लालच दे दिया था। यह एक ऐसी ऐतिहासिक घटना है जिसके बाद भारत में ब्रिटिश राज की स्थापना का सिलसिला शुरू हो गया। आगे चलकर मीर जाफ़र का नाम भारतीय उपमहाद्वीप में देशद्रोही और गद्दार का पर्यायवाची बन गया। इसी बात को भारतीय इतिहास में भयंकर विश्वासघात् के नाम से चिन्हित किया गया।नाटक का निर्देशन और सैट भी:
आलोक चटर्जी ने बताया, ‘ऐतिहासिक महत्व के इस नाटक को लिखने के साथ ही इसका निर्देशन भी मैं कर रहा हूं। इसके सैट की कल्पना भी मेरी है। भोपाल के कई अच्छे कलाकार इस निर्माण में साथ होंगे। उन्होंने कहा, ‘नाटक की एक बड़ी विशेषता इसकी भाषा है। उस दौर में चूंकि संस्कृति निष्ठ हिन्दी, उर्दू और अंग्रेज़ी बोली जा रही थी। हमारे किरदार भी उसी तरह के हैं। इसलिये हमने उस काल को उसी तरह से दर्शाने के लिेये तीनों ही भाषाओं का ज़रूरत के हिसाब से प्रयोग किया है।’
कपाल कुन्डला में भी किया है अभिनय:
नाटकों को अपना जीवन दे देने वाले इस समर्पित कलाकार ने कहा, ‘मैं बंकिमचंद्र चटर्जी की एक और कृति ‘कपाल कुन्डला’ में भी काम कर चुका हूं। इस तरह से यह एक महान् लेखक की हिन्दी रंगमंच पर एक विशिष्ट प्रस्तुति भी होगी। उन्होंने एक और विशेष बात का उल्लेख किया – ‘मैंने अपनी टीम को उस ज़माने के बंगाल का अविभाजित नक्शा भी दिखाया है। तब बंगाल आज के बांग्लादेश से लेकर झारखंड, आज के प.बंगाल से उड़ीसा तक फैला हुआ था। विभाजन ने अब बंगाल को बहुत छोटा कर दिया है। उस दौर में बंगाल को कुदरत की भीषण मार भी झेलना पड़ा था। 1770 में आये उस अकाल में तब के बंगाल और बिहार के सरकारी अनुमान से तकरीबन 58 लाख लोग मारे गये थे। ऐसे विकट विपदा और राज सत्ता के संघर्ष और संकट की वजह से लोग बेहद परेशान थे। हालात ऐसे बने कि लोग, एकजुट होने लगे और फिर आवाज़ उठी- ‘वंदेमातरम्।’आज़ादी के अमृत उत्सव पर श्रद्धाजंलि:
उन्होंने कहा, मैं समझता हूँ कि यह प्रस्तुति आज़ादी के अमृत महोत्सव की पूर्व बेला में हम कलाकारों की तरफ से एक श्रद्धांजलि भी होगी। इस नाटक की प्रस्तुति के पीछे हमारा एक ही संदेश है। हम सभी भारतीयों को एकजुट रहना चाहिये। देश को अपने स्वार्थ,पद लिप्सा और परिस्थिति के अनुकूल लूटने और गद्दारी करने वालों से बचना चाहिये। हमारी एकता और हमारी स्वतंत्रता में ही हमारा जीवन है। हमारा गौरव है। हमें एक-दूसरे से लड़ने और अपनी स्वतंत्रता को क्षति पहुंचाने से बचना चाहिये। शांति,सहिष्णुता और प्रेम ही हमारा जीवन।’ अंत में इस रंग-दक्ष व्यक्तित्व और कलाकार ने अपील की-‘ मैं इंदौर स्टुडियो के माध्यम से अपने सभी परिचितों और उन सभी कलाकारों को भोपाल आमंत्रित करता हूं, जो यह नाटक देखना चाहते हैं।’
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