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अजय बोकिल, इंदौर स्टूडियो। आवाज़ की दुनिया का एक सुपर स्टार चला गया। वो सुपर स्टार, जिसे हिंदुस्तान में रेडियो प्रोग्रामिंग का Paternal father या ‘पितृ पुरूष’ कहा गया। रेडियो की वो शिखर हस्ती जिसने 54 हज़ार से ज़्यादा प्रोग्राम्स और 19 हज़ार से अधिक रेडियो स्पॉट्स और जिन्गल्स रिकॉर्ड करने का प्रतिमान रचा। इसके अलावा कई स्टेज शोज़, संगीत के कार्यक्रम और फिल्मों से जुड़ी रिकॉर्डिंग्स हैं। जवां दिनों से उम्र के आख़िरी पड़ाव तक रेडियो के इस ‘ग्रैंड ओल्ड मैन’ ने अपनी तरह से आवाज़ की दुनिया का इतिहास रचा। अपनी अद्वितीय प्रतिभा से लाखों श्रोताओं के दिलों का सरताज बन गया। इस लेख में पढ़िये, रेडियो सीलोन से शुरू हुए कार्यक्रम- ‘बिनाका गीतमाला’ से लोकप्रियता की पायदान चढ़ने वाले हम सभी के प्रिय अमीन सयानी के यादगार रेडियो सफ़र की कहानी।
दूसरी दुनिया से आती हुई आवाज़ : बचपन में अमीन सयानी के कार्यक्रम ‘बिनाका गीतमाला’ को सुनते हुए लगता था कि ये आवाज़ किसी दूसरी दुनिया से आती है। नई जनरेशन के युवा, अमीन सयानी के लिये लोगों की दीवानगी को शायद ही कभी समझ पायें। मगर सयानी साहब का एक वो दौर था जब बड़े-बड़े फिल्मी स्टार उनसे मिलने और उनके साथ अपने प्रोग्राम्स को रिकॉर्ड करने के लिये बेताब हुआ करते थे। दरअसल अमीन सयानी ने रेडियो का एक नया और सुुमधुर व्याकरण रचा। शुष्क खबरों और शास्त्रीय संगीत से परे जाकर उन्होंने आम आदमी की ज़बान में बात कहने की बुनियाद रखी। उसी नींव पर आज टीवी चैनल्स और एफएम रेडियो की दुनिया खड़ी है।
रेडियो की सहज भाषा रची: अमीन सयानी को सिर्फ इसलिए याद नहीं किया जाएगा कि उन्होंने ‘बिनाका गीतमाला’ जैसा माइल स्टोन प्रोग्राम 42 साल तक होस्ट किया, बल्कि इसलिए भी याद किया जाएगा कि उन्होंने रेडियो की सहज सम्प्रेषणीय भाषा भी रची। अमीन सयानी जिस दिलचस्प अंदाज़ में अपनी बातें रेडियो पर किया करते थे, वह हिंदी और उर्दू की मिली-जुली आम हिंदुस्तानी ज़बान हुआ करती थी। ये बात और है कि अमीन सयानी ने अंग्रेजी एनाउंसर के रूप में अपने कैरियर की शुरूआत की थी। बाद में वो हिंदी रेडियो प्रोग्राम की मील का पत्थर शख़्सियत बन गये।
सब करने लगे सयानी साहब की नकल: साठ और सत्तर के दशक में हर युवा उद्घोषक, अमीन सयानी की नकल करने की कोशिश करता था और वैसा ही बनना चाहता था। आज भी विविध भारती के नामी उद्घोषक युनूस खान की उद्घोषण शैली में इस अंदाज़ की झलक देखी जा सकती है। उन दिनों हिंदी उद्घोषणा जगत में तीन आवाज़ें मानक समझी जाती थीं। समाचार वाचन में आकाशवाणी के देवकी नंदन पांडे, हॉकी कमेंट्री में जसदेव सिंह और मनोरंजन के क्षेत्र में अमीन सयानी। इन सभी ने जनसंचार के क्षेत्र में रेडियो माध्यम के महत्व और चुनौतियों को बखूबी समझा। अपने फ़न से उसे एक नई परिभाषा दे डाली। इन तीनों में अमीन सयानी का नाम तो हर घर में पहुंच चुका था।
बहनों और भाइयों में स्त्री शक्ति: अमीन सयानी ने सार्वजनिक सम्बोधन में भी एक बुनियादी बदलाव किया। तब किसी भी कार्यक्रम में वक्ता ‘भाइयों और बहनों’ कहा करते थे। अमीन सयानी ने अपने कार्यक्रम में ‘बहनों और भाइयों’ कहना शुरू किया, जो बेहद लोकप्रिय हुआ। इसमें नारी शक्ति का सम्मान था। यह सुखद संयोग ही है कि 20 साल की उम्र में अमीन सयानी ने फिल्मी संगीत को घर-घर पहुँचाने का सफल प्रयास किया। तब फिल्मी संगीत सुनहरे दौर में कदम रख रहा था। यही वो दौर था, जब देश की पुरानी पीढ़ी हिंदी फिल्मों के संगीत को बाजारू मानकर उसे खारिज या अनदेखा कर रही थी। देश के तत्कालीन सूचना प्रसारण मंत्री बीवी. केसकर ने तो आकाशवाणी से हिंदी फिल्म संगीत का प्रसारण ही बंद करवा दिया था। उनका कहना था कि इससे देश की युवा पीढ़ी बिगड़ रही है। हालांकि बंद में विविध भारती ने बदलाव को समझा। (नीचे तस्वीर में फिल्म ‘बॉबी’ के रेडियो कार्यक्रम की रिकॉर्डिंग का दृश्य। शीशे के पीछे अमीन सयानी, आशिमा सिंह, गायक शैलेन्द्र सिंह और कॉपी राइटर सिराज सैयद दिखाई दे रहे हैं। बाहर मुख्य रिकॉर्डिस्ट एमएस राणे और बृज मित्तल हैं। फोटो सौजन्य – राजिल सयानी।)
रेडियो सीलोन पर बिनाका गीतमाला: एक बार फिर बात सुनहरे संगीत के दौर की। उस दौर में लता मंगेशकर, मोहम्मद रफी, मन्ना डे, गीता दत्त, आशा भोसले, तलत महमूद, मुकेश, किशोर कुमार जैसे गायक अपनी कला से नए प्रतिमान रच रहे थे। इन गायकों को महान बनाने का काम कई प्रतिभाशाली संगीतकार कर रहे थे। युवा पीढ़ी इन गायकों की दीवानी थी। हालांकि तब सरकार की निगाह में फ़िल्मी संगीत ग़ैर ज़रूरी था। इसी बीच श्रीलंका की कंपनी ने रेडियो सीलोन की स्थापन की और आज़ादी के बाद बदलती पसंद को रखकर ‘बिनाका गीतमाला’ का प्रोग्राम शुरू किया। इसके उद्घोषक बने अमीन सयानी। देखते-देखते ‘बिनाका गीतमाला’ को सुनने के लिए लोग रेडियो ख़रीदने लगे। रेडियो के प्रसार के साथ ही यह प्रोग्राम भी लोकप्रिय होता चला गया। यादगर पल-तस्वीर में गायिका नूरजहाँ के साथ अमीन सयानी।
रजत जयंती तक रही लोकप्रियता: ‘बिनाका गीतमाला’ की लोकप्रियता उसकी रजत जयंती तक रही। हालांकि बाद में भी यह कार्यक्रम प्रसारित होता रहा, लेकिन टीवी के आने के बाद दृश्य की दुनिया का महत्व बढ़ने लगा। गाना संगीत के सागर में तैरने की जगह परफार्म करने की वजह बन गया। ये अमीन सयानी ही थे, जो रेडियो के उत्तर काल में भी अपनी आवाज़ के दम पर अपनी पहचान कायम रख सके। इस कार्यक्रम के एक जमाने में 20 लाख से ज्यादा श्रोता हुआ करते थे। नीचे तस्वीर में गीतमाला के एक लाइव शो के दौरान अमीन सयानी बीते दौर को याद नज़र आ रहे हैं।
54 हजार प्रोग्राम का रिकॉर्ड: अमीन साहब ने रेडियो पर लगभग 54 हजार प्रोग्राम प्रोड्यूस और कम्पेयर किए थे। 19 हजार स्पॉट / जिंगल में भी उनका आवाज सुनाई दी। अमीन सयानी कई फिल्मों में भी रेडियो अनाउंसर के तौर पर नजर आए। 2009 में उन्हें रेडियो के क्षेत्र में उन्हें असाधारण योगदान के लिए भारत सरकार ने पद्मश्री से नवाज़ा। अमीन सयानी कहते थे कि हर रेडियो जॉकी को अपने आप में अलग होना चाहिए। वरना सभी की आवाज और अदायगी एक सी होगी तो कौन सुनेगा? प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपनी श्रद्धांजलि में कहा कि अमीन सयानी अपने काम के ज़रिये भारतीय ब्रॉडकास्टिंग की दुनिया में क्रांति लेकर आये और अपने श्रोताओं के साथ खास ‘बॉन्ड’ बनाया। कुछ लोग अमीन सयानी को भारतीय रेडियो का ‘ग्रैंड ओल्ड मैन’ भी कहते हैं। अमीन साहब सशरीर भले जुदा हुए हों, लेकिन उनकी आवाज़ हमेशा हमारे साथ रहेगी। उन्हें नमन, सलाम। (अजय बोकिल वरिष्ठ संपादक और स्तंभकार हैं। ‘सुबह सवेरे’ के साथ अन्य समाचार पत्रों के लिये निरंतर लेखन करते हैं।)

