इंदौर स्टूडियो, शकील अख़्तर। ‘दीपा-तनवीर’….हम इंदौर के बहुत से दोस्तों से जुड़ी हँसती-मुस्कुराती,जीवन के गीत सुनाती एक और ख़ूबसूरत जोड़ी टूट गई। प्रोफेसर दीपा तनवीर जी का जाना, बहुत से साथियों के दिलों को एक अजीब खालीपन से भर गया। हालांकि हम सभी चाहे दूर हों या पास, ….देख रहे थे कि किस तरह दीपा जी, एक बेहतरीन फाइटर की तरह कैंसर से जंग लड़ रही हैं। अस्पताल के चक्कर काटते, उपचार और उससे होने वाले प्रभावों से लड़ते हुये वे एक विजेता की तरह बार-बार घर लौट रहीं थीं। उतने ही धैर्य से तनवीर अपना फर्ज़ निभा रहे थे। दोनों के हँसते-मुस्कुराते चेहरे फेसबुक पर जब भी नज़र आते, दर्शक-दोस्तों के चेहरों पर एक ख़ुशी सी तैर जाती थी। ठीक उसी समय दोनों के पति-पत्नी से ज़्यादा एक दोस्त होने का अहसास भी होता था।
यक़ीन झूठ साबित हुआ: हम सभी को यक़ीन था कि दीपा जी एक बार फिर, अपनी पुरानी ऊर्जा और आभा के साथ हम सभी के बीच होंगी। मगर यह यक़ीन झूठ साबित हुआ। यह ठीक वैसा ही है, जैसा शहर के रंगमंच और हास्य कलाकार योगेंद्र जोशी और अभिनेत्री उन्नति शर्मा के समय हुआ था। अभी 5 नवंबर को ही दीपा जी की फेसबुक वॉल पर लोग ‘हैप्पी बर्थ डे’ का संदेश लिख रहे थे कि यकायक 24-25 नवंबर की रात उनके, हमारे बीच से चले जाने का संदेश स्तब्ध कर गया। लगा जैसे अपने साथ कोई हमारी भी रोशनी ले गया। जैसा कि उनके लिये एक साथी ने लिखा भी है – धरा से एक सितारा दूर हुआ
आसमान में एक और तारा नूर हुआ
(ख्यात चित्रकार स्व. एमएफ हुसैन के साथ पत्रकार स्व. शाहिद मिर्ज़ा के साथ दीपा तनवीर)
नब्बे के दशक का वो दौर: दीपा जी को याद करने पर मुझे नब्बे के दशक वाला इंदौर के रंगकर्म का दौर याद आता है। उन दिनों शहर की सांस्कृतिक फ़िज़ां पर स्व.बाबा डिके,बाबा गोरे,स्व.प्रकाश देवरा,स्व. विनोद डेविड, स्व.महेश तिवारी, सतीश मेहता, ज्योत्सना मेहता, नरहरि पटेल, प्रो.सरोज कुमार, सुशील जौहरी, तपन मुखर्जी, अंजू मुखर्जी, राकेश जोशी, तरल मुंशी, चेतन पंडित, सुभाष शर्मा, श्रीराम जोग, राजेंद्र देशमुख, प्रमोद व्यास, अनिमेश चतुर्वेदी, राजेश दुबे ‘रोमी’, रवि वर्मा, गोपाल दुबे, शरद शबल, सुशील गोयल, संजय पटेल, शैलेन्द्र शर्मा, अरूण नीमा, पृथ्वी साँखला, शेखर पाठक,राकेश साहू, प्रांजल श्रोत्रिय जैसे नाम छाये हुये थे। उस दौर में स्व. पत्रकार शाहिद मिर्ज़ा और स्व. आदिल कुरैशी के साथ ही संस्कृतिकर्मी अतुल पटेल जैसे नाम भी, शहर की कला गतिविधियों को अपनी तरह से आगे बढ़ा रहे थे। यही वही दौर था जब शहर में स्व.हबीब तनवीर,एमएफ हुसैन,बव कारंत या एनएसडी के दिग्गज निर्देशकों का आना-जाना शुरू हुआ। उस दौर में दीपा जी अक्सर कला आयोजनों से जुड़े कार्यक्रमों और आयोजनों में विविध भूमिकाएं निभाया करती थीं। कभी वे संचालन करतीं, कभी गेस्ट कोऑर्डिनेटर बनतीं। कभी ख़ुद मंच पर नज़र आतीं।
(दीपा और तनवीर जी इंदौर के अभिनेता रवि महाशब्दे और गीतकार साथी स्वानंद किरकिरे के साथ)
दंभ से परे विदूषी कलाकार: प्रो.दीपा बंसोड़ ख़ुद एक कुशल नर्तकी (ओडिसी,कथक) थीं। परिवार से उन्हें कला और संस्कृति की समझ मिली थी। वे अंग्रेज़ी साहित्य में पीएचडी थीं। इसके बावजूद उनमें कोई दंभ न था, इसीलिये भी हम कलाकारों में उन जैसी विदूषी महिला का बड़ा आदर और सम्मान रहा। अंग्रेज़ी की प्रोफेसर बनने और चोइथराम जैसे अस्पताल में जनसंपर्क अधिकारी के रूप में सेवाओं से पहले, वे एक नृत्य कलाकार बनने का ही सपना देखा करती थीं। हम जैसे साथियों के लिये उनके व्यक्तित्व के प्रति आकर्षण के कुछ और कारण भी थे। वे हमेशा हँसती रहतीं। बड़ी आत्मीयता से मिलतीं। बड़े सलीके से रहती और बात करतीं। सीखने, सिखाने के काम में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेतीं। 
नृत्य के कई कार्यक्रमों का हिस्सा रहीं:
इंदौर में रंगमंच के विभिन्न आयोजनों के साथ ही उन्होंने नृत्य के बहुत से कार्यक्रम भी प्रस्तुत किये। कलाकारों को प्रशिक्षण दिया। कथक के अलावा ओडिसी के लिये शहर में जगह बनाई। इंदौर में बंगाली क्लब के दुर्गोत्सव से भी वे निरंतर जुड़ी रहीं। वहां भी उन्होंने अपने नृत्य कार्यक्रम पेश किये। तपन दा के अनुसार, एक बार उन्होंने रविंद्र नाथ ठाकुर रचित कविताओं पर आधारित एत ‘नृत्य नाटिका’ में ओडिसी नृत्य रचनाओं का ही समावेश किया था। कोरियोग्राफी के अलावा उन्होंने ख़ुद भी नृत्य में हिस्सा लिया था। वे स्व. महेश तिवारी नाट्य समारोह के रंग आयोजनों में भी बतौर रंगमंच अभिनेत्री काम करती रहीं। आज इंदौर के सुशील जौहरी,पृथ्वी सांखला,रवि महाशब्दे और स्वानंद किरकिरे जैसे कलाकार उन्हें नाटकों से जुड़े ऐसे ही कार्यक्रमों और आयोजनों के लिये भावुक मन से याद करते हैं।
(विदा माँ : इंदौर के बंगाली क्लब में पूजा के दौरान दीपा तनवीर)
तनवीर फारुक़ी से मुलाक़ात की याद: तनवीर फारूकी से मेरी मुलाक़ात शायद 1982-83 में हुई में थी। तब तनवीर रंगमंच पर काम करने के साथ ही फोटोग्राफ्री के क्षेत्र में कदम रख रहे थे। मैं भी रंगकर्म से अलग पत्रकारिता से जुड़ा। वे एक प्रोफेशनल फोटोग्राफ़र बन गये। मुझे ध्यान पड़ता है, मैं पहली बार दीपा बंसोड़ जी के पागनिस पागा में मौजूद घर पर तनवीर भाई के साथ ही गया था। याद आता है, किसी कार्यक्रम में जाने के लिये हमें उन्हें लेने जाना था। तब इस काम में तनवीर अक्सर दीपा जी की मदद किया करते थे हालांकि तब नहीं पता था, दोनों आगे जीवन साथी भी बन जायेंगे। दोनों का साथ ऐसा जुड़ा कि दोनों आजीवन कला सम्बधी आयोजनों से जुड़े रहे। दोनों पेटिंग,नृत्य,संगीत और फोटोग्राफी से जुड़े बहुत से समारोहों और कार्यक्रमों का हिस्सा बनते रहे।
(दीपा जी अपने ससुर श्री फारूक़ी के 75 वें जन्मदिन पर पूरे परिवार के साथ।)
कला अभिरुचियों ने दोनों को बाँधकर रखा: भगोरिया से लेकर खजुराहो फेस्टिवल तक दोनों एक-दूसरे की कला अभिरुचियों को साथ जीते रहे। दिल्ली में एक ऐसी पेटिंग एक्जीबिशन में मेरा उनसे सपरिवार मिलना हुआ था, उस समय उज्जैन के कलाविद् अक्षय अमेरिया और चित्रकार सिरज सक्सेना का साथ रहा। दोनों की अभिरूचियां एक रहीं, इसीलिये उनकी गैर पारंपरिक शादी भी सुरूचिपूर्ण रही। दोनों के धर्म अलग रहे, मगर कला का बंधन और इंसानी भावनाओं ने उनके घर-परिवार को ईंट-गारे की तरह जोड़कर रखा। आज यह सोचकर अच्छा नहीं लग रहा कि अब तनवीर के साथ उनकी दोस्त और हमराह दीपा जी शारीरिक रूप से नहीं हैं।(दीपा जी शायर स्व. राहत इंदौरी के साथ) 
पुराने दौर की वो प्यारी बातें:
दिल्ली में होने की वजह से दीपा जी से बीते कुछ वर्षों में फोन पर ही संपर्क बना रहा। जब भी उनसे बातें हुईं, वे पुरानी रौ में बहती नज़र आईं। वे अपने युवा दिनों को अक्सर याद किया करती थीं। शिक्षा और कला के साथ ही सामाजिक बदलावों और आज के माहौल के प्रति बड़ी सजग और सटीक राय रखती थीं। कुछ वर्षों से उनके स्वास्थ में निरंतर गड़बड़ियां चल रही थीं। मगर कैंसर के बाद उन्हें खासी मुश्किल और तकलीफ़ भरे हालात से गुज़रना पड़ा। इस सिलसिले में उन्हें टी चोइथराम के उसी अस्पताल में भी भर्ती होना पड़ा, जहाँ की वे कभी पीआर अधिकारी थीं, वहाँ रहते हुये उन्होंने बहुत से मरीज़ों की दिल खोलकर मदद की थी। यहाँ तक कि अपने वेतन के पैसे देकर भी उनकी आर्थिक सहायता की थी। ऐसी सशक्त महिला और विदूषी कलाकार का जाना इंदौर के कला और शिक्षा दोनों ही क्षेत्रों की एक बड़ी क्षति है। मगर वे जहाँ भी रहें, ख़ुश और सुकून से रहें। हम सभी की यही दुआ है।
अंत में दीपा जी के लिये हइफ़ा फारुक़ी की लिखी कविता –
A BIRD flew away…
Today, I have something special to say
A small tribute to pay.
It’s about my bird, who flew away 😢
Her hair was curled
And her ideas were furled
She thought us to spread our wings wide
So that we could gleam like a sunshine
Why I am left halfway
Oh! Today my bird flew away 😢
Her smile in hardships made us realize
That no matter what you just can’t compromise
She lived her life king size
And made a mark in our eyes
Why I am left halfway
Oh! Today my bird flew away 😢
She was an art in herself
Or, an institute of oneself
My eyes are searching for you in tears
Without your presence, our hearts fears
Why I am left halfway
Oh! Today my bird flew away 😢
-Haifa Farooqui
(ध्यानार्थ: “बर्ड” मेरी दीपा भाभी को संदर्भित करता है। उनकी मग़फ़िरत के लिए दुआ कीजिये।)
अब यादों में इंदौर की शिक्षाविद् और विदूषी कलाकार प्रो. दीपा तनवीर
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