शकील अख़्तर, इंदौर स्टूडियो। ‘एक्टिंग एक्टिंग एक्टिंग…हर वक्त एक्टिंग। एक्टिंग के लिये मैं पागल हो गया था। क्यों नहीं होगी एक्टिंग? एक्टिंग के नाम पर नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा (एनएसडी) में जर्मनी से आये डायरेक्टर फ्रिट्ज़ बेनेविट्ज़ ने मेरी नींद उड़ा दी थी। उनके निर्देशन में एनएसडी में मुझे नाटक ‘हैमलेट’ (1985) में रोल मिला था। उस आदमी ने डिगलेयर कर दिया था कि पीयूष कभी एक्टर नहीं बन सकता। हालत ये हुई कि मैं दीवारों से अपना सिर टकराने लगा था’! 25 वें भारत रंग महोत्सव में यह बात चर्चित अभिनेता, शायर और संगीतकार पियूष मिश्रा ने कही। एनएसडी एलुमनी पीयूष मिश्रा का यह विशेष सत्र एनएसडी स्टूडेंट्स यूनियन ने आयोजित किया था। ‘अद्वितीय’ नाम से आयोजित इस सत्र का विषय था ‘एक्टर्स ऑन एक्टिंग’।
सीनियर पियूष मिश्रा एक प्रेरक एक्टर: प्रारंभ में एनएसडी के डायरेक्टर चितरंजन त्रिपाठी ने स्वागत भाषण दिया। उन्होंने अपने सीनियर पीयूष मिश्रा को एक प्रेरक एक्टर बताया। पुराने दिनों की याद की। स्टूडेंट यूनियन की तरफ से सुश्री प्रगति शिंदे ने पीयूष मिश्रा का परिचय दिया। यूनियन के अध्यक्ष शेखर कांवत ने अतिथियों का स्वागत किया। इस दौरान वरिष्ठ अभिनेता, निर्देशक और संगीतकार अजय कुमार ने भी कुछ ज़रूरी सवाल पूछे। कार्यक्रम का संचालन सैयद मोहम्मद इरफ़ान ने किया। अंत में स्टूडेंट यूनियन की तरफ से पियूष जी को ‘ऑल टाइम मोस्ट बिलव्ड सीनियर’ का अवार्ड दिया गया। इस मौके पर ख्यात कास्टिंग डायरेक्टर मुकेश छाबड़ा भी मौजूद थे। यहाँ प्रस्तुत है पीयूष मिश्रा के सम्बोधन से उभरी उनकी अभिनय यात्रा की कहानी। अनुभवी एक्टर की इस यात्रा के संघर्ष का यह पहला भाग है।
शाह साहब ने जगाई थी दिलचस्पी: इस सेशन में भाग लेने के लिये पीयूष मिश्रा अमेरिका से अपने बैंड ‘बल्ली मारान’ के 10 शोज़ के बाद सीधे एनएसडी पहुँचे थे। जेटलेग और भारी थकान के बावजूद उन्होंने दिल्ली में गुज़ारे दिनों से लेकर मुंबई के सफ़र की दास्तान सुनाई। ये कहकर कि ‘इंकिलाब ज़िंदाबाद’! बीते 40 साल के सफ़र की दास्तां सुनाते हुए सीनियर एक्टर ने कहा -‘थियेटर में मेरी दिलचस्पी की एक बड़ी वजह को मैं एनएसडी के स्व.निदेशक बीएम शाह को मानता हूँ। वे थियेटर करवाने के लिये ग्वालियर आया करते थे। ग्वालियर में वे नाटकों के निर्देशन के साथ ही रंगकर्मियों को प्रशिक्षित भी करते थे। वहां से एनएसडी को लेकर मेरी दिलचस्पी जागी।
अजीब डायरेक्टर थे फिट्स बेनेविट्ज़: पीयूष जी ने कहा, तब एनएसडी में हमें रामगोपाल बजाज, अनुराधा कपूर और रॉबीन दास जैसे दिग्गज रंग गुरू मिले। रॉबीन दास हमारे बहुत ही अच्छे टीचर रहे। वे स्टूडेंट्स के साथ हँसी-मज़ाक करते हुए थियेटर की कला को सिखाते थे। अनुराधा जी हमारी वर्ल्ड ड्रामा टीचर थीं। वे हमें अच्छे शोज़ को देखने के लिये छुट्टी दे दिया करती थीं। इसी तरह कीर्ति जैन भी हमारी ड्रामा टीचर हुआ करती थीं। एचबी शर्मा साहब थे। बहुत ही खूंखार टीचर, चांटा मार दिया करते थे’। मगर इनमें भी सबसे अजीब डायरेक्टर थे फिट्स बेनेविट्ज़। वो जर्मनी से एनएसडी में आया करते थे। उन्होंने सही मायनों में मुझे खोला। मुझे उनके निर्देशन में ‘हैमलेट’ में प्रमुख भूमिका निभाने का मौका मिला। उनकी वजह से ही मेरे अंदर का एक्टर बनने के गुण जन्मे, जिस दिन मैंने एक्टर बनना शुरू किया, वो दिन था 1 जनवरी 1985, उस दिन राजीव गाँधी की सरकार बनी थी। उसी दिन हमारा प्ले ‘हैमलेट’ ओपन हुआ था। (नीचे तस्वीर में पियूष मिश्रा की यादों के वो पुराने दिन। ऊपर बाईं तरफ़ रंग गुरू स्व. बीएम शाह और दाईं तरफ़ फ्रिट्ज़ बेनेविट्ज़। बाकी तस्वीरों में एनएसडी में स्नातक की पढ़ाई के दौरान पियूष मिश्रा अभिनीत नाट्य प्रस्तुतियां।)
‘हैमलेट’ ने पूरी तरह बदल डाला: ‘हैमलेट’ नाटक ने मुझे पूरी तौर पर बदलने का काम किया। ‘हैमलेट’ से मुझे पहली बार महसूस हुआ कि एक्टिंग में कितना ज़ोर लगता है। फ्रिट्ज़ साहब ने तो डिगलेयर कर दिया था – ‘पीयूष कोई एक्टर- वैक्टर नहीं है और ना ही ये बन सकता है। मतलब उस आदमी ने मेरी रातों की नींद उड़ा दी थी। मैं सोचने लगा यार क्या होगा? और क्यों नहीं होगा ? मैं बहुत परेशान हुआ। बहुत रोया। यहाँ पत्थरों पर अपना सिर दे मारता था। हर वक्त यही सवाल बेचैन करता था कि मैं क्यों एक्टर नहीं बन सकता?
फ्रिट्स ने मुझे बहुत कुछ दिया: मगर ये कहना पड़ेगा कि फ्रिट्स बेनेविट्ज जैसे बेहतरीन डायरेक्टर ने मुझे बहुत कुछ दिया। मुझे फिक्स कर दिया। बेशक वो एक दुर्दांत डायरेक्टर था। मगर भई कमाल था। उस आदमी में 70 की उम्र में 19 साल के नौजवान जैसी एनर्जी थी। उनका भोजन सिर्फ सेब था। वो हफ़्ते भर सेब खाते थे। हैरानी की बात ये भी है कि बंदे को हिन्दी नहीं आती थी। इसके बावजूद वो जानते थे कि ‘कौन है पहरे में और कौन है परदे में’ का फर्क क्या है। इस संवाद के बोलते वक्त, कोई उनको चीट नहीं कर सकता था। हैरत की बात है कि उन्होंने हिंदी में ही नहीं छत्तीसगढ़ी और कन्नड़ में भी नाटक किये। बिना भाषा जाने, उन्हें सब पता था। मुझे एक संवाद बोलना था – ‘मेरी प्यारी माँ !’…इस संवाद को बुलवाने में उन्होंने मेरा पूरा दम निकाल दिया था। ‘नहीं..पियूष ऐसे नहीं..एकदम अंदर से बोलो – ‘मेरी प्यारी माँ !’ डेढ़ महीने तक उनकी वर्कशॉप रही। डेढ़ महीने के अंदर उस आदमी ने मुझको खोलकर रख दिया था। मेरे जैसा बंदा रोमांस करना भूल गया था। मुझको उस डायरेक्टर निचोड़ कर रख दिया था।
एक्टिंग के लिये पागल हो गया था: इसके बाद पता नहीं मुझे क्या हो गया! फिर मैंने पीछे मुड़कर देखा ही नहीं। एकदम पागल हो गया। एक्टिंग,एक्टिंग,एक्टिंग…मतलब सिर्फ एक्टिंग…और एक्टिंग होगी क्यों नहीं ? क्लासिक कैरेक्टर क्यों नहीं हो सकता ! उसके बाद मैंने ‘मैकथॉम’ बनाया। उसमें मैं था, मनोज वाजपेयी, आशीष विद्यार्थी, गजराज राव और बहुत लोग थे। उस वक्त एक्टिंग की जो और जितनी पढ़ाई हो सकती थी, वो की। एनएसडी में उन दिनों मेरे बैच में दिनेश शुक्ल, रवि उपाध्याय , विजय दीपक छिब्बर, इरफान खान और आलोक चटर्जी थे। मीता वशिष्ठ, तिग्मांशू धूलिया, संजय मिश्रा, निर्मल पांडे भी थे। नीचे की तस्वीर में फ़िल्म ‘मकबूल’ में साथी एक्टर इरफ़ान के साथ पीयूष मिश्रा।
इरफ़ान, आलोक के साथ देखा जब नाटक: उन्हीं दिनों हमने नाटक ‘किंग ऑफ कॉमेडी’ देखा। मेरे साथ आलोक चटर्जी और इरफ़ान थे। नाटक देखकर लगा कि यार, ये लोग क्या ग़ज़ब कर रहे हैं! ये लोग जो कर रहे हैं, क्या ऐसा भी हो सकता है? नहीं ऐसा हो नहीं सकता !! लौटते वक्त हमने कहा – भई कहीं से बीयर के पैसे जुगाड़ो। तब किसी के पास पैसे होते नहीं थे। ख़ैर तब किसी से 5 रूपये, किसी से 6 रूपये और किसी से 10 रूपये मिल गये। बीयर तब सस्ती होती थी। ले देकर हमने तीन बीयर ख़रीद ली। फिर तीन घंटे तक सिप ले-लेकर पीते रहे। तीन घंटे तक…।
मक़सद था नाटक को डिस्कस करना: बीयर पीने का मक़सद था नाटक को डिस्कस करना। हम बीयर के घूंट लगाते वक्त सिर्फ नाटक को डिस्कस करते रहे। उसकी पूरी छिछालेदार, पूरी मीमांसा कर डाली। मतलब जबरदस्त एनालिसिस। तीन बोतलों का नशा तीन सौ बोतलों का हो गया। ऐसी चढ़ गई..हमें..। मतलब एक्टिंग का वो नशा था। उसी वक्त मैंने तय कर लिया था कि मैं एनएसडी अब कभी नहीं छोड़ूंगा। एक्टिंग और थियेटर को अब अपनी ज़िदंगी बना लूंगा।
एनएसडी में करता हूँ वैलकम पार्टी: एनएसडी में हर साल मैं फ्सर्ट ईयर के स्टूडेंट्स को एक वैलकम पार्टी देता हूं। इस इस शर्त पर कि तुम लोग जिस काम के लिये आये हो वो तुम्हें पूरी शिद्दत से करना है। तुम्हें एक्टिंग करनी पड़ेगी – जिस चीज़ के लिये आये वो कर डालना है। 1989 से ये दस्तूर चला आ रहा है। मैं हर साल नये स्टूडेंट्स से मिलकर उनके साथ उन्हीं की उम्र का हो जाता हूँ। उनसे जुड़कर उनकी बातों समझता हूँ। अपने पुराने दिनों को याद करता हूँ। फिर से जवान हो जाता हूँ। वैसे भी ये उम्र होती क्या है! आगे पढ़िये –
एनएसडी कमाल की चीज़ है: पीयूष मिश्रा की अभिनय यात्रा / भाग दो

