Wednesday, September 9, 2026
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बहुत गहरे हैं अफ़ज़ल के चित्र – अशोक वाजपेयी

शकील अख़्तर, इंदौर स्टूडियो। दिल्ली में देवास, मध्यप्रदेश के प्रख्यात चित्रकार स्व. अफ़ज़ल पठान की चित्रकला प्रदर्शनी कला प्रेमियों पर अपना गहरा असर छोड़ गई। 30 जून से 10 जुलाई 2026 तक यह प्रदर्शनी दिल्ली के त्रिवेणी कला संगम (श्रीधरणी आर्ट गैलरी) में लगाई गई। प्रदर्शनी के शुभारंभ समारोह में प्रख्यात कवि और कला-मर्मज्ञ अशोक वाजपेयी ने कहा – “अफ़ज़ल के चित्र इतने गहरे हैं कि देखने वाले उनमें चाहे जितने अर्थ खोज सकते हैं।”चित्रकार अफज़ल की प्रदर्शनी के शुभारंभ समारोह में अशोक वाजपेयी सम्बोधित करते हुए। साथ में क्यूरेटर चित्रकार अखिलेश वर्मा। विस्मृत चित्रकार को शानदार श्रद्धांजलि:
इस प्रदर्शनी का शीर्षक “अफ़ज़ल पठान: एक बहता दरिया” रखा गया था। इसे प्रख्यात चित्रकार अखिलेश वर्मा ने क्यूरेट किया और इसका आयोजन ‘रज़ा फाउंडेशन’ द्वारा किया गया। इसमें चित्रकार अफ़ज़ल पठान द्वारा अपने जीवन के आखिरी दशक (मुख्यतः 1990 से 1999) में बनाए गए चित्रों को प्रदर्शित किया गया। इस चित्रकला प्रदर्शनी के माध्यम से न सिर्फ कला रसिकों ने, बल्कि मीडिया ने भी एक बेहद प्रतिभाशाली किंतु विस्मृत चित्रकार को याद किया। अखिलेश वर्मा ने अफ़ज़ल साहब के चित्रों के विषय में कहा – ‘अफ़ज़ल के चित्र बहते हुये दरिया की तरह दर्शक को भिगोते हैं। उनके उजले-धुले, आलोकित रूपाकार में प्रवाह है, बहने का, बहते रहने का स्वभाव है, ये चित्र स्थिर नहीं हैं। रूपाकार स्थिर नहीं हैं, इनके भीतर स्थिरता है। वे ठोस चट्टान की तरह बह रहे हैं।” अखिलेश वर्मा के साथ प्रसिद्ध चित्रकार अर्पिता सिंह और परमजीत सिंह के साथअफ़ज़ल के चित्रों की राजीव सेठी ने भी की प्रशंसा:
अखिलेश जी ने बताया- ‘जिस तरह से अफ़ज़ल साहब के चित्रों की आलोचकों ने प्रशंसा की और कला रसिकों ने इस गुमनाम चित्रकार को याद किया, वह इस कला प्रदर्शनी को सफलता को दर्शाता है’। अखिलेश वर्मा ने कहा- ‘ आप यह जानकर हैरान रह जायेंगे कि उनके सभी चित्रों की प्रसिद्ध डिज़ाइनर, दृश्य-सज्जाकार और कला संग्राहक राजीव सेठी ने भी जमकर सराहना की और उन्हें अपने संग्रह में जोड़ने की ख़्वाहिश जताई। यह अपने आप एक बड़ी बात है। ऐसा आमतौर पर होता नहीं है। अखिलेश वर्मा प्रसिद्ध कला समीक्षक और क्यूरेटर श्रीमती सुषमा बहल के साथ5 हज़ार पेंटिंग्स का संग्रह अभी सुरक्षित:
उन्होंने बताया- मेरी जानकारी के अनुसार, अफ़ज़ल जी की 5 हज़ार पेंटिंग्स का संग्रह अभी सुरक्षित है। ज़ाहिर है कि हम आगे भी उनकी कला को प्रदर्शित कर सकेंगे। उन्होंने अपने इस गुरु और उनसे मिले स्नेह को याद करते हुए कहा- ‘युवा दिनों में हम इंदौर से देवास अक्सर साइकिल से चले जाया करते थे- ‘अपने पिता की तरह हमने उनसे भी बहुत कुछ सीखा, जैसे ही हम उनके घर पहुंचते, वे आवाज़ लगाते, जल्दी से नाश्ता तैयार करो, इंदौर से बच्चे आये हैं’।  चित्रकार अफज़ल की प्रदर्शनी के शुभारंभ समारोह में अशोक वाजपेयी। गुमनाम कलाकारों को मिले सम्मान:
रज़ा फाउंडेशन के प्रबंध और आजीवन ट्रस्टी अशोक वाजपेयी ने अपने उदबोधन में इस चित्रकार को लेकर एक मार्मिक अपील भी की। इस विषय में अखिलेश वर्मा जी ने जानकारी दी। अशोक वाजपेयी जी ने कहा – “सरकार और लोगों- दोनों की सामूहिक जिम्मेदारी है कि वे हमारी कला और ऐसे सच्चे कलाकारों को समय के साथ धुंधला होकर खोने न दें। ऐसे गुमनाम कलाकारों को सामने लाना और उन्हें सम्मान दिलाना हमारा कर्तव्य है।”चित्रकार अफ़ज़ल पठान की प्रदर्शनी में पहुँचे कला रसिक। चित्रकार अफ़ज़ल पठान की प्रदर्शनी में पहुँचे कला रसिक। अमूर्त कला के एकांत साधक:
श्री वाजपेयी ने कहा, “अफ़ज़ल पठान ने मध्य प्रदेश में लगभग गुमनाम रहकर एक नए चलन (ट्रेंड) की शुरुआत की। ऐसे समय में जब मध्य प्रदेश का कला जगत नव-कथात्मक (neo-narrative) कला, आलंकारिक कला (figurative), परिदृश्य या व्यक्तिचित्र (portraits) बनाने में व्यस्त था, तब अफ़ज़ल एकांत में अमूर्त (abstract) कला रच रहे थे।”चित्रकार अफ़ज़ल पठान की कृति अफ़ज़ल जी कभी भी नाम या पैसे के पीछे नहीं भागे:
अशोक जी ने उनके व्यक्तिगत संघर्ष को रेखांकित करते हुए बताया कि “अफ़ज़ल का जन्म एक बेहद गरीब परिवार में हुआ था। उन्होंने अपने जीवन का एक बड़ा हिस्सा एक स्कूल के ड्राइंग टीचर की मामूली सी तनख्वाह पर अपने भाई-बहनों की देखभाल करते हुए बिता दिया।” अफ़ज़ल पठान की कला के प्रति सच्ची निष्ठा के बारे में बताते हुए वाजपेयी जी ने कहा, ” अफ़ज़ल जी कभी भी नाम या पैसे के पीछे नहीं भागे। उनके लिए कला, दिन भर की कड़ी मेहनत और थकावट के बाद मिलने वाले सुकून का एक क्षण भर थी।”चित्रकार अफ़ज़ल पठान की कृति प्रकाश, गति और पारदर्शिता का सम्मिश्रण:
अफ़ज़ल की प्रदर्शनी में उनके बनाए कुल 40 चित्रों को प्रदर्शित किया गया। ये सभी अमूर्त (Abstract) पेंटिंग्स हैं, जो बिना किसी शीर्षक (Untitled) की हैं और जिनमें अद्भुत प्रकाश, गति और पारदर्शिता का सम्मिश्रण देखने को मिला।उनके चित्रों के बारे में खैरागढ़ यूनिवर्सिटी में एमएफए के विद्यार्थी शादाब ख़ान ने कहा- ‘अफ़ज़ल साहब मेरे बड़े पापा हैं, उनके निधन को कोई 25 साल हो चुके हैं, तब से उनके चित्रों का अथक प्रयासों के साथ संरक्षण मेरे पिता श्री रईस ख़ान ने किया है। अगर ऐसा न होता तो दिल्ली के त्रिवेणी संगम में उनके 40 बेशक़ीमती चित्रों की प्रदर्शनी का आयोजन मुश्किल होता। शादाब ने कहा, मैं आज चित्रकला का अध्धयन कर रहा हूँ और इसकी वजह और प्रेरणा अफ़ज़ल साहब की चित्रकला और कृतियां ही हैं, जिन्होंने मुझे भी प्रभावित किया है’।चित्रकार अफ़ज़ल पठान की कला प्रदर्शनी में चित्रकार और आयोजक अखिलेश वर्मा सही मायनों में जीनियस थे अफ़ज़ल साहब:
उनके काम को लेकर इस लेखक ने प्रख्यात चित्रकार सफ़दर शामी से बातचीत की। चित्रकला के प्रारंभिक संस्कार, रंगों की जानकारी उन्हें अफ़ज़ल से ही मिली। वे भी अफ़ज़ल की तरह देवास (ग्राम भौंरासा) के रहने वाले हैं। सफ़दर शामी ने कहा – ‘अफ़ज़ल साहब सही मायनों में जीनियस थे। एक छोटे से क़स्बे में रहते हुए ऐसे दौर में असाधारण चित्र रच रहे थे जब न सुविधाएं थीं न संभावनाएं। दुनिया में अमूर्त कला में कहां क्या हो रहा है? किन माध्यमों में, किस शैली में काम किया जा रहा है? ये सब जानने का आज की तरह तब कोई ज़रिया नहीं था। पत्र-पत्रिका और किताबों के अलावा अधिकांश ख़ुद का किया हुआ काम ही देखते थे। लेकिन वो जानते थे कि उनका काम मौलिक और अपने नाम की तरह अफ़ज़ल है। उनका यही विश्वास दिखने और बिकने की इच्छा से परे उनसे मुसलसल रचनाकर्म करवाता रहा। चित्रकार स्व. अफज़ल पठानबौद्धिक व्याख्या की अपेक्षाकृत शुद्ध सौंदर्यानुभूति:
दरअसल ये कलाकार से अधिक कला जगत के लिए दुर्भाग्यपूर्ण रहा कि ऐसी असाधारण और विस्मित कर देने वाली कृतियां दशकों तक कला रसिकों की आँखों से दूर रहीं।  अफ़ज़ल साहब का काम अपने समय से इतना आगे का है कि दशकों बाद भी ये ताज़ा और आज का ही लगता है। ये अफ़ज़ल साहब की चमत्कृत कर देने वाली दक्षता और सौंदर्य का तिलिस्म है कि उनकी अमूर्त कृतियों को देख कर अर्थ और इंटरप्रिटेशन जैसे बेमानी सवाल अपनी हैसियत खो देते हैं। प्रभु जोशी ने कहा था कि “अफ़ज़ल का अंतिम प्रयत्न किसी बौद्धिक व्याख्या की अपेक्षाकृत शुद्ध सौंदर्यानुभूति देना है”। अफ़ज़ल साहब की शैली में ऐसी निजता औेर अफ़ज़लियत है कि उनका काम देख कर किसी अन्य कलाकार की कोई कृति स्मृति में नहीं आती। उनकी हर कृति उन्हीं की अन्य कृति की याद दिलाती है।चित्रकार स्व.अफ़ज़ल पठान। indorestudio.com साधारण जीवन और असाधारण कला साधना:
अफ़ज़ल पठान (1936-2000) का जन्म देवास के एक बेहद गरीब परिवार में हुआ था। किशोरावस्था में एक घुमंतू गुरु ‘खिलजी साहब’ से रंग बनाना और कैनवस तैयार करना सीखने के बाद, उन्होंने 1966 में इंदौर स्कूल ऑफ़ आर्ट से प्रथम श्रेणी में नेशनल डिप्लोमा (ND Arts) प्राप्त किया। यहाँ उन्होंने विष्णु चिंचालकर जैसे दिग्गजों से मार्गदर्शन लिया और बाद में उज्जैन के विक्रम विश्वविद्यालय से एम.ए. (ड्राइंग और पेंटिंग) में स्वर्ण पदक हासिल किया। शुरुआत में डालडा फैक्ट्री में मजदूरी करने वाले अफ़ज़ल बाद में एक प्राइमरी स्कूल में ड्राइंग टीचर बने और अपने संघर्षों के बीच भी देवास के के.पी. कॉलेज में चित्रकला विभाग की स्थापना करवाई, जहाँ से वे विभागाध्यक्ष के पद से सेवानिवृत्त हुए। अपनी कला के प्रति समर्पित अफ़ज़ल ने आजीवन अपने बड़े परिवार का भरण-पोषण किया और सादगीपूर्ण जीवन जिया।दिल्ली के त्रिवेणी कला संगम में देवास,मध्यप्रदेश के चित्रकार स्व. अफ़ज़ल पठान की चित्रकला प्रदर्शनी तकनीक के अनूठे प्रयोगकर्ता:
अफ़ज़ल पठान एक बेहतरीन कुश्ती खिलाड़ी भी थे, जिनका मानना था कि शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य एक-दूसरे से जुड़े हैं। वे अपनी कला को जन-जन तक पहुँचाने के लिए त्योहारों पर सड़कों पर विशाल रंगोलियां बनाते थे। अपनी अमूर्त कला में तेल के रंगों को पानी की तरह इस्तेमाल करने के लिए उन्होंने पेट्रोल, केरोसिन और तारपीन जैसे थिनर्स का प्रयोग किया, जिसने उनकी पेंटिंग्स को एक विशिष्ट पारदर्शिता और चमक दी। दुर्भाग्यवश, इन रासायनिक थिनर्स के धुएं के लगातार संपर्क में रहने के कारण उन्हें फेफड़ों की गंभीर बीमारी हो गई। डॉक्टरों की मनाही के बावजूद उन्होंने कला साधना नहीं छोड़ी और 1 अक्टूबर 2000 को इस महान लेकिन गुमनाम कलाकार ने अंतिम सांस ली। आगे पढ़िये- जबलपुर में बच्चों का नाटक खुल-खुल जा सिमसिम – https://indorestudio.com/rangmanch-ki-pathshala/

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