मोनालिसा दास, इंदौर स्टूडियो। रंग संस्कार थियेटर ग्रुप द्वारा आयोजित 75 दिवसीय ‘अलवरंगम’ में आलोक चटर्जी अभिनीत एकल नाटक ‘ऐसा ही होता है’ का मंचन हुआ। कविताओं और संवादों से सजी यह उनकी बेहद सशक्त प्रस्तुति थी। इसे देखकर दर्शक सम्मोहित हुये बिना नहीं रह सके।
बिना तामझाम के हो सकता है नाटक: इस प्रस्तुति से यह फिर ज़ाहिर हुआ कि नाटक का मंचन बिना मंच सज्जा, मेकअप या तामझाम के भी हो सकता है। नाटक असल में दर्शक और अभिनेता के बीच सीधे संवाद का माध्यम है। इस नाटक का लेखन और निर्देशन भी खुद आलोक चटर्जी ने किया है। इस एकल नाटक में दिखाया गया है कि एक अभिनेता के जीवन में आने वाली घटनाओं और जो भूमिकाएं वह अदा करता है, उनमें क्या समानता और क्या असमानता होती है। कैसे जीवन का असर नाटकों पर और नाटकों का असर जीवन में होता है।
नाटक और जीवन की भूमिकाओं का संघर्ष: हमारे नाटक की यात्रा की तरह, जीवन की यात्रा भी चलती रहती है। नाटकों में एक चरित्र अपनी भूमिका को निश्चित रूप से निभाता है, वैसे ही जीवन में हम एक चरित्र बनकर अपनी भूमिका स्पष्ट रूप से निभाते है। नाटक की यह 51 वीं प्रस्तुति थी। एनएसडी स्नातक आलोक चटर्जी एमपीएसडी के निदेशक रहे हैं। वे अपने सशक्त अभिनय के साथ ही निर्देशन और रंग संबंधी विषयों पर व्याख्यानों के लिये भी विख्यात हैं।
‘अलवर रंगम’ में आलोक के अभिनय ने दर्शकों को किया अभिभूत
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