Wednesday, May 13, 2026
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अखिलेन्द्र मिश्र की नई किताब : अभिनय, अभिनेता और अध्यात्म

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योग मिश्र, इंदौर स्टूडियो। अभिनय सीखने की वस्तु नहीं’। अपनी नई किताब में जब ख्यात रंगकर्मी और सिने अभिनेता अखिलेन्द्र मिश्र यह कहते हैं तो लगता है कि जब अभिनय सीखने की वस्तु नहीं तो फिर नाट्य विद्यालयों या रंग-शालाओं का औचित्य क्या है? लेकिन जैसे-जैसे आप इस किताब की गहराई में उतरते हैं, आपके मन में उठने वाले सवालों का जवाब मिलने लगता है। हाल ही में उन्होंने रायपुर आकर मुझे अपनी यह पुस्तक भेंट की। साथ ही प्रियंक जी के सौजन्य से उनके ‘नुक्कड़ कैफे’ में स्थानीय कलाकारों से मुलाक़ात की। अपने अनुभव साझा किये। समझकर बोल देना अभिनय नहीं: इस पुस्तक में अखिलेन्द्र कहते हैं – पढ़ना-समझना, बोल देना अभिनय नहीं है’। ज़ाहिर है ऐसे में मन में यह सवाल भी उठता है कि फिर अभिनय क्या है? ऐसे बहुत से सवालों का जवाब अखिलेन्द्र की यह नई किताब देती है। यह बताती है कि अभिनय दरअसल चीज क्या है? अभिनेता का मार्गदर्शन करते हुए अखिलेन्द्र कहते हैं कि जैसे कुम्हार पहले अच्छी तरह से मिट्टी तैयार करता है। बहुत अच्छी तरह से चिकनी ताकि उससे जो भी आकार बनाया जाए वह खराब न हो। दरअसल सब कुछ उस मिट्टी की तैयारी में है। इसी तैयारी से आगे चलकर निपूर्णता प्रगट होती है। मिट्टी तैयार होने के बाद कुम्हार का जैसा विचार होगा वैसी सुन्दर आकृतियां मिट्टी से वह गढ़ने लगता है। अभिनेता को कुम्हार होना चाहिये: अखिलेन्द्र कहते हैं – ‘एक अभिनेता की तैयारी कुम्हार की तरह होनी चाहिए। तभी अभिनेता जो भी चरित्र निभाएगा, उस चरित्र के विचार के अनुसार उसे जीवंत कर पायेगा। अभिनेता एक ऐसा पत्थर है जो स्वयं अपनी छेनी-हथौड़ी से खुद अपना आकार तराशता है। अपने चरित्र की वह स्वयं प्रतिमा गढ़ता है। उसे जैसा चाहे वह मूर्तरूप दे सकता है। सफल अभिनेता के लिए अपने लक्ष्य के प्रति दृढ़ संकल्पित होना ही सफलता की कुंजी है। सही दिशा में लगाएं अपनी ऊर्जा: सफलता हासिल करने के लिए अभिनेता को अपनी उर्जा सही दिशा में खर्च करनी आना चाहिए। अभिनेता अधिकांशतः अपनी उर्जा फालतू बातों में नष्ट कर देते हैं। जब अभिनेता को उर्जा की जरूरत होती है- जैसे कुछ सृजन करना हो, अभिनय करना हो, कई घंटे तक काम करना हो या संवाद बोलना और रिहर्सल करना हो तो फिर आप थके-थके से रहते हैं। अभिनेता को अपनी उर्जा. सदैव रचनात्मक कार्यों में ही लगाना चाहिए। विषम परिस्थितियों से जूझना ज़रूरी: सफल अभिनेता के बनने की प्रक्रिय के बारे में अखिलेन्द्र अपनी किताब में काफी विस्तार से बात करते हैं। कहते हैं कि एक अभिनेता को दृढ़ता, पागलपन (जुनून), अनुशासन, समय प्रबंध, एकाग्रता, धैर्य, आत्मविश्वास विषम परिस्थितियों से जूझने से निश्चित सफलता हासिल हो सकती है। अखिलेन्द्र कहते हैं “अप्रत्यक्ष रूप, जो प्रत्यक्ष रूप में समाया हुआ है वहीं है: अभिनेता, अभिनय और अभिनेता की प्रतिभा।” अभिनेता का अध्यात्म से रिश्ता: किताब में अखिलेन्द्र जी अभिनेता की अध्यात्मिक परिभाषा को भी स्पष्ट करते हैं। वे कहते हैं – “इस सृष्टि में ब्रह्मा के बाद कोई है तो वह है अभिनेता। ब्रह्मा एक पल में 84 लाख योनि जीते हैं। जबकि एक अभिनेता, एक पल में दो रूप जीता है एक जो वह है। एक वह जो वो भूमिका निभा रहा है। नीचे तस्वीर में समीक्षक और नाट्यकर्मी योग मिश्र के साथ अखिलेन्द्र जी। किताब में बहुचर्चित घटना का उल्लेख: अभिनय, अभिनेता और अध्यात्म को समझाने के लिये अखिलेन्द्र मिश्र अपनी किताब में  एक बहुचर्चित घटना का उल्लेख करते हैं। इसमें बंगाल में 1884 में मंचित एक नाटक में चैतन्य महाप्रभु की भूमिका निभा रही अभिनेत्री विनोदनी की बात करते हैं, जिनकी पृष्ठभूमि एक वेश्या परिवार से थी। नाटक देखने खुद रामकृष्ण परमहंस आये थे। उन्होंने नाटक की समाप्ति पर विनोदनी के पैर छू लिए। लोगों ने कहा, आपने वेश्या के पैर छू लिये हैं। रामकृष्णजी ने कहा, मैंने इस अभिनेत्री में साक्षात् चैतन्य महाप्रभु के दर्शन किये हैं, इसलिए मैं पैर छू रहा हूँ। चरित्र से एकाकार होने की कला: एक अभिनेता अपने चरित्र से गहराई से इतना एकाकार तभी कर पाता है, जब वह अभिनय अभिनेता और अध्यात्म से अपना तारतम्य बनाने का प्रयास करता है। अखिलेन्द्र की यह किताब अभिनेता के उपकरण पर भी विस्तार से बात करती है। यह नव अभिनेता का सटीक मार्गदर्शन करने वाली एक महत्वपूर्ण पुस्तक है। अखिलेन्द्र ने अपने लंबे अभिनय कैरियर का निचोड़ इस किताब के माध्यम से दिया है। यह नये अभिनेताओं को काफी कुछ सिखाती है, ख़ासकर उन्हें जो सिर्फ महीने, पंद्रह दिन में अभिनेता बनने की चाह रखते हैं। यह किताब अमेजान पर उपलब्ध है। पढ़ते रहिये – indorestudio.com 

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