Tuesday, June 16, 2026
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तीस साल बाद मंच पर फिर लौटा ‘अक्स तमाशा’

शकील अख़्तर, इंदौर स्टूडियो। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, दिल्ली का ‘समर थियेटर फेस्टिवल’ इस बार 30 साल पहले मंचित हुए नाटक ‘अक्स-तमाशा’ के नये निर्माण के साथ मंच पर लौटा। इस नाटक ने फेस्टिवल के गुलदस्ते में मौजूद एनएसडी रेपर्टरी के चुनिंदा नाटकों के बीच अपने विशिष्ट ‘रंग’ की ख़ुशबू घोल दी। यह नाटक एक तरह से, एक इंसान के मनो-मस्तिष्क की ‘रंग-शाला’ है। भ्रम से उबरकर अपने ही सत्य की तलाश है। कह सकते हैं कि नाटक भीतर के ‘अक्स’ का बाहरी ‘तमाशा’ है। गहरे अर्थों में यह माया और सत्य का दर्शन है। 'Aks Tamasha'—a play directed by Bhanu Bharti. A special report by Shakeel Akhter. IndoreStudio.com.30 साल बाद पुनर्सृजन की चुनौती: ‘अक्स-तमाशा’ नाटक का मूल नाम ‘सिरी सम्पिगे’ (Siri Sampige) है। इसे ज्ञानपीठ अवॉर्ड से सम्मानित डॉ. चंद्रशेखर बी. कम्बार ने कन्नड़ में लिखा था। इसका निर्देशन दिग्गज रंग निर्देशक भानु भारती ने किया है। तीस साल पहले 1997 में एनएसडी रेपर्टरी के लिये उन्होंने ही इस नाटक को निर्देशित किया था। नाटक बनाना आसान नहीं था: इस नाटक के फिर से निर्माण के बारे में श्री भानु भारती ने कहा – ‘रंगमंच क्षण भंगुर होता है और हर प्रस्तुति के साथ नाटक समाप्त हो जाता है। इसलिये किसी नाटक को फिर से प्रस्तुत करना, वह भी 30 साल बाद, यह ज़रा कठिन है। मगर जब श्री चित्तरंजन त्रिपाठी ने वर्तमान रेपर्टरी के साथ इस नाटक के फिर से निर्माण की बात कही तो मुझे ज़रा संकोच था। विशेष रूप से इसलिये क्योंकि इसमें जीवंत संगीत है, जो सहभागिता के साथ नाटक की गहराई से जुड़ा है। इस नाटक का संगीत रवि नागर जी ने तैयार किया था, जो अब हमारे बीच नहीं रहे।’Director Chittaranjan Bharati with veteran theatre director Bhanu Bharati at the NSD Summer Theatre Festival '26.चित्तरंजन जी ने संभाली संगीत की कमान: श्री भारती ने आगे कहा- ‘चित्तरंजन त्रिपाठी जी इसकी पहली प्रस्तुति का हिस्सा रहे हैं, तब वे रेपर्टरी में ही थे। उन्होंने नाटक का सह-निर्देशन भी किया था। साथ ही इस नाटक के संगीत में भी योगदान दिया था। उन्होंने मुझे आश्वस्त किया कि वे खुद संगीत का काम संभालेंगे। इसके बाद मुझे इस नाटक को प्रस्तुत करने का विश्वास मिला। यह काम बढ़िया हुआ। इसके लिये मैं उनके साथ अनिल कुमार मिश्रा जी का आभारी हूँ।’ Key artistic figures behind the production of the play 'Aks Tamasha', directed by Bhanu Bharti. IndoreStudio.comकथ्य को गति देता जीवंत रंग-संगीत: भानु जी ने कहा, ‘संगीत नाटक के केंद्र में है’। उनकी यह बात नाटक देखते हुए महसूस होती है। आप इसके संगीत को गहराई से महसूस करते हैं। इसका संगीत नाटक के कथ्य, पार्श्व और इसकी भावना के साथ बहता है, साथ ही नाटक को एक नई गति देता है। नाटक के संगीत में आप सरोद, बांसुरी और पखावज को भी सुनते हैं। आलाप और समवेत की लय से बँधा गायन अपना गहरा असर तो पैदा करता ही है, कुछ दृश्यों में सरोद का संगीत, नायक के अभिनय और उसकी संवेदना के साथ जुगलबंदी सा करता महसूस होता है।'Aks Tamasha'—a play directed by Bhanu Bharti. A special report by Shakeel Akhter. IndoreStudio.com.रंग-संगीत के साज़कारों में 17 कलाकार: स्व. रवि नागर के मूल रंग-संगीत के इस सृजन में 17 कलाकार शामिल हैं। संगीत मंडली के ये कलाकार प्रारंभ से अंत तक अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, भागवत जैसे सूत्रधार वाले पात्र के साथ। स्व. रवि नागर की मूल धुनों और संगीत को तैयार करने में एनएसडी के निदेशक चित्तरंजन त्रिपाठी के मार्गदर्शन की अहम भूमिका रही। संगीत कलाकारों ने भी इसे तैयार करने में जमकर मेहनत की।A scene from the 'Summer Theatre Festival' in front of the Abhimanch at the National School of Drama, Delhi. IndoreStudio.com‘अक्स-तमाशा’ से समर फेस्टिवल का आगाज़: 8 मई से शुरू हुए एनएसडी के ‘समर थियेटर फेस्टिवल’ का शुभारंभ इसी नाटक से हुआ। पहले तीन दिन इस नाटक के नाम रहे। इसके कुल 5 शोज़ दिखाये गये। यानी नाटक के चाहने वालों को पूरा मौका मिला कि वे सुविधा से इस नाटक को देख सकें। अन्यथा एक या दो शो होने पर कई नाट्य प्रेमी शिकायत करते हैं कि ‘अरे हम तो देख ही नहीं पाए!’ वैसे ‘अंधा युग’ के बाद यह ऐसा नाटक तैयार हुआ है, जिसको लेकर उम्मीद की जा सकती है कि इसे दर्शकों को आगे भी देखने का मौका मिलता रहेगा।  'Aks Tamasha'—a play directed by Bhanu Bharti. A special report by Shakeel Akhter. IndoreStudio.com.लोक कथाओं और आधुनिक द्वंद्व का संगम: यह नाटक भारती जी के निर्देशन, डिज़ाइन और रूपांतरण का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। यह लोक कथाओं (Folk Tales), मिथकों और आधुनिक मनोवैज्ञानिक द्वंद्व का सम्मिश्रण है। भानु भारती जी लोक कलाओं और जनजातीय अनुष्ठानों (Ritualistic Elements) को आधुनिक रंगमंच में पिरोने के विशेषज्ञ माने जाते हैं। ‘अक्स तमाशा’ में भी उन्होंने पारंपरिक लोक-कथा शैली का इस्तेमाल करते हुए मनुष्य के आंतरिक द्वंद्व, सत्य और भ्रम (Illusion) के बीच के संघर्ष को बेहद दार्शनिक तरीके से मंच पर प्रस्तुत किया है।Rajesh Singh, In-charge of the National School of Drama, addressing the audience from the stage. IndoreStudio.comप्रभावशाली अभिनय और एनएसडी का सफ़र: बड़ी बात ये है कि एनएसडी रेपर्टरी के इस प्रॉडक्शन में कलाकारों का अभिनय भी उतना ही प्रभावशाली है। चाहे फिर वह राजकुमार का मुख्य पात्र हो या नागराज का या फिर राजमाता, राजकुमारी, कमला या फिर अबली और जबली जैसे विदूषकों का। नाटक के दो-तीन विशिष्ट दृश्यों में बुज़ुर्ग कलाकार भी याद रह जाते हैं। नाटक में मुखौटों का उपयोग हुआ है। बता दें कि एनएसडी रेपर्टरी का सफ़र एक प्रयोग के रूप में 1964 में इब्राहिम अल्काज़ी ने शुरू किया था। अब यह सफ़र अपने 60 साल पूरे कर चुका है। जे.एन. कौशल, प्रो. राम गोपाल बजाज और सुरेश शर्मा के बाद अब इसका प्रभार राजेश सिंह संभाल रहे हैं। निर्माण और कुशल प्रबंधन के साथ ही वे कुछ अहम नाटकों में अभिनय करते भी नज़र आते हैं।'Aks Tamasha'—a play directed by Bhanu Bharti. A special report by Shakeel Akhter. IndoreStudio.com.कन्नड़ नाटक ‘सिरी सम्पिगे’ का विस्तार: ज्ञानपीठ अवॉर्ड से सम्मानित डॉ. चंद्रशेखर बी. कम्बार ने इस नाटक को कर्नाटक की पारंपरिक ‘यक्षगान’ शैली में लिखा था। भानु भारती जी ने उत्तर भारत के दर्शकों के समक्ष इस नाटक को प्रस्तुत करने के मक़सद से इसे इसकी मूल शैली को बदला। इस विषय में वे कहते हैं – ‘मैंने कलाकारों के साथ मिलकर इसे एक नए रूप में तैयार किया, ताकि कर्नाटक के बाहर के नये दर्शकों के सामने नाटक को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया जा सके। यह सब करते हुए मैंने इसके मूल पाठ में कोई बदलाव नहीं किया। इस बार इसके नये निर्माण में मुझे टीकम जोशी (सह-निर्देशन) और समीप सिंह का महत्वपूर्ण सहयोग मिला।’ हम जानते ही हैं कि टीकम जोशी एक अनुभवी अभिनेता, निर्देशक और प्रशिक्षक हैं, वे एमपी स्कूल ऑफ़ ड्रामा के डायरेक्टर रहे। इन दिनों वे एनएसडी के निर्माणों और रंग प्रशिक्षण में अपनी विशिष्ट भूमिका निभा रहे हैं। 'Aks Tamasha'—a play directed by Bhanu Bharti. A special report by Shakeel Akhter. IndoreStudio.com.हिंदुस्तानी ज़बान की रवानगी: इस नाटक की एक और ख़ास बात इसका अनुवाद है। इसका हिंदी में अनुवाद एनएसडी के पूर्व निदेशक प्रो. राम गोपाल बजाज ने किया है। इसे सिर्फ हिंदी ना कहकर, हिंदुस्तानी कहना ज़्यादा उचित होगा। नाटक में आपको महज़ ‘अक्स तमाशा’ जैसे लफ़्ज़ ही नहीं, ‘हमल’ (गर्भवती) जैसे उर्दू के शब्द भी सुनाई पड़ते हैं। इसी तरह आपको इस रूपांतरण में एक लय और पारसी थियेटर शैली जैसी रवानगी भी नज़र आती है, जहां संवाद आसानी से बोले और दर्शकों द्वारा समझे जाते हैं।'Aks Tamasha'—a play directed by Bhanu Bharti. A special report by Shakeel Akhter. IndoreStudio.com.अक्स का सम्मोहन और दमित इच्छाएं: नाटक की कहानी शिवपुर राज्य और वहां के राजकुमार शिवनाथ के इर्द-गिर्द घूमती है। महारानी मायावती को पता चलता है कि उनके बेटे शिवनाथ पर मृत्यु या संन्यास का खतरा है। इससे बचने के लिए यह शर्त रखी जाती है कि राजकुमार को कभी अपना ‘अक्स’ (प्रतिबिम्ब) या परछाई नहीं देखनी चाहिए। हालांकि राजकुमार एक जादुई घटनाक्रम में अपना अक्स देख लेता है और उस ‘छवि’ (Image) के प्रति बुरी तरह सम्मोहित हो जाता है। यह सम्मोहन उसके व्यक्तित्व को दो हिस्सों में बांट देता है।'Aks Tamasha'—a play directed by Bhanu Bharti. A special report by Shakeel Akhter. IndoreStudio.com.ज़िद के बाद सच में चमत्कार: राजकुमार अपने शरीर के दो टुकड़े कर देने की ज़िद करता है। इसके बाद सच में चमत्कार होता है और राजकुमार का दूसरा या छिपा हुआ व्यक्तित्व एक ‘नाग’ के रूप में सामने आता है, जो असल में उसकी दमित इच्छाओं, कामुकता और दूसरे रूप का प्रतीक (A symbol of repressed desires, sexuality, and the alter ego) है। अंत में वह अपने इस विभाजित अस्तित्व (Divided Identity) को स्वीकार कर लेता है और मृत्यु को गले लगा लेता है।'Aks Tamasha'—a play directed by Bhanu Bharti. A special report by Shakeel Akhter. IndoreStudio.com.'Aks Tamasha'—a play directed by Bhanu Bharti. A special report by Shakeel Akhter. IndoreStudio.com.मंच पर चकाचौंध नहीं, प्रस्तुति का आकर्षण: यह नाटक ढाई घंटे की अवधि का है। आज के समय में जब नाटक की अवधि अधिकतम डेढ़ घंटे तक सिमट रही है, तब इस नाटक को देखना आसान नहीं है, मगर इसकी रोचकता, दृश्यता और प्रस्तुति का आकर्षण बाँधे रखता है। नाटक की मंच कल्पना में कोई चकाचौंध नहीं है, मंच के पार्श्व में ऊपर से नीचे तक रंगीन परदे हैं। यह मंच कल्पना भी भानु भारती की है और प्रकाश परिकल्पना पराग सरमा की है। कॉस्ट्यूम कृति वी. शर्मा ने डिज़ाइन किये हैं और मुखौटे बनाने में नवीश व मुकुल ने बेहतरीन कला क्षमता का परिचय दिया है।Bhanu Bharti, Theatre Director. indorestudio.com जब निर्मल वर्मा ने नाटक की प्रशंसा की: नाटक की लोकप्रियता के बारे में एक क़िस्सा सुनाते हुए भानु जी ने कहा- ‘एक बार एक कार्यक्रम में प्रसिद्ध साहित्यकार निर्मल वर्मा जी ने ‘अक्स तमाशा’ की प्रशंसा की। संयोग से उस कार्यक्रम में नाटक के लेखक कम्बार जी भी मौजूद थे, उन्होंने निर्मल जी को बताया कि यह नाटक मूल रूप से उनका ही लिखा हुआ है। उस वक्त कम्बार जी को इस बात का भी अंदाज़ा भी हुआ कि उनके मूल नाटक से कहीं अधिक हिन्दी रूपांतरण को लोकप्रियता मिली है- ‘भानु जी ने कहा, यह क़िस्सा ख़ुद कम्बार जी ने ही उन्हें सुनाया था’।   Artists of the Repertory Company of the National School of Drama. IndoreStudio.comकलाकारों की दमदार उपस्थिति: नाटक में कुछ कलाकारों के लिये डबल और ट्रिपल कास्ट का उपयोग किया गया है। भागवत की भूमिका प्रसून नारायण ने और राजकुमार की भूमिका आशुतोष सिंह केशव ने निभाई है। मायावती के किरदार में शिल्पा भारती और माधवी शर्मा हैं, जबकि अबली के रूप में अंकुर सिंह और जबली के रूप में सत्येन्द्र मंच पर उपस्थित हैं। नागराज की भूमिका ताबिश खान ने निभाई है।A scene from the 'Summer Theatre Festival' in front of the Abhimanch at the National School of Drama, Delhi. IndoreStudio.comशानदार गायन और वादन का पुनर्सृजन : चित्तरंजन त्रिपाठी के मार्गदर्शन में मनीष मिश्रा, पूजा गुप्ता, प्रतीक बढ़ेरा, नवीन सिंह, राजेश कुमार पाठक, अनुपमा कौशिक, नीलम रावत, खुशी बाजोत्रा और मिष्ठी श्रीवास्तव ने गायक के रूप में आवाज़ दी है। वाद्य कलाकारों के रूप में अनिल कुमार मिश्रा, नवीन सिंह और साथी कलाकारों ने शानदार संगत की है।Director Bhanu Bharti with Shakeel Akhter, author of the 'Aks Tamasha' review. IndoreStudio.com.

समकालीन नाट्य-कला का जटिल नाटक: नाटक के बारे में प्रख्यात रंग समीक्षक दीवान सिंह बजेली की टिप्पणी सटीक बैठती है: ‘समकालीन भारतीय नाट्य-कला का यह एक जटिल नाटक है। पौराणिक कथाओं का सहारा लेकर, यह आज के मानव समाज की वास्तविकताओं और मानवीय स्थिति में निहित दुविधाओं पर प्रकाश डालता है। इसका मिश्रण लोक-सौंदर्य और समकालीन नाट्य-कला का एक ऐसा संगम दिखाता है जो दर्शकों को बांधे रखता है।’ (इस रिपोर्ट के लेखक शकील अख़्तर थियेटर जर्नलिज़्म में अपनी विशिष्ट पहचान रखते हैं। उन्होंने 8 नाटकों का लेखन भी किया है। आप कला और कला गतिविधियों पर एकाग्र वेबसाइट और यू ट्यूब चैनल इंदौर स्टूडियो के संस्थापक संपादक है। पेशे से पत्रकार रहे शकील अख़्तर तीन दशकों से कलाकारों और कला गतिविधियों पर लिख रहे हैं।) आगे पढ़िये – मंच पर बिखर गई ‘एंडोरा’ की मार्मिक जटिलता https://indorestudio.com/andorra-play-review/

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