हम दोनों का प्यार ख़ुदा की नेमत था, ईश्वर का दिया उपहार। आज भी मैं वही महसूस करती हूँ। और इस प्यार की वजह थी- आलोक की ऐसी कई ख़ूबियां जिनसे मैं बंध कर रह गई।… वो एक करिश्माई अभिनेता थे। कमाल की संवाद शैली थी। उनकी आँखें बोलती थीं, वो सीधे दिल में उतर जाती थीं। वो कविताएं लिखतें और मुझे सुनाते। मैं एक एथलीट थी- आज़ाद पंछी। और उन्होंने मुझे पूरी आज़ादी दी, ऐसी आज़ादी कि मैं उनकी होकर रह गई!…आज मैं उन्हें अपनी यादों में ढूंढ रही हूँ…इन तस्वीरों में.. उस आलोक चटर्जी को जो अब मेरी बेशक़ीमती यादों का हिस्सा है।
वो सात तारीख़ थी। सात जनवरी दो हज़ार पच्चीस। और आज फिर वही तारीख़ है। आज आलोक की याद का दिन है, आज उनकी बरसी है। सात तारीख़ हम दोनों की पसंदीदा और यादगार तारीख़ रही लेकिन आलोक ने इसी दिन हम सभी को अलविदा कहा, हमारा साथ छूट गया। भाई शकील अख़्तर जी ने जब उनके बारे में पूछा तो यही सब ध्यान में आने लगा….
मैंने कहा न, मैं महसूस करती हूँ हमारा प्यार, मुहब्बत ख़ुदा की नेमत था। और हमने अपने प्रेम को दीवानगी की हद तक जीया। जीवन के हर थपेड़े, संघर्ष और समस्याओं के बीच, खट्टे-मीठे और तल्ख़ अनुभवों के साथ हर सुख-दुःख को हमने 39 वर्षों तक साथ-साथ जिया। अगर मैं आलोक से अपनी जान-पहचान के सालों को भी जोड़ लूँ तो यह साथ 44 बरस का हो जाता है। आज के दिन मैं आलोक को केवल जीवन साथी के रूप में ही नहीं, बल्कि एक सह ‘रंग-यात्री’ एक कलाकार के रूप में भी उन्हें याद करना चाहती हूँ । एक ऐसा कलाकार जो हमेशा हमारे साथ रहेगा और जिससे हमें कुछ न कुछ सीखने को मिलता रहेगा।
मैंने आलोक के साथ एक नायिका और सह-अभिनेत्री के रूप में चतुर्भाणी, विशाख, घासीराम कोतवाल, आधे-अधूरे, स्कंद गुप्त, दो कश्तियों का सवार, ध्रुव स्वामिनी, रूस्तम सोहराब, फादर, संध्या नाद जैसे लगभग चालीस नाटकों में काम किया। और मैं जानती हूँ कि उनके साथ काम करते हुए मुझे कभी नहीं लगा कि वे अभिनय कर रहे हैं। आलोक पात्र की आत्मा को आत्मसात कर लेते थे, उस किरदार में ही डूब जाते थे। वे जिस तरह से महसूस करते थे, संवाद करते थे—उसका कोई सानी नहीं।
उनके साथ अभिनय करना रूहानी ख़ुशी देता था। चरित्र को आत्मसात करने का तरीका मेरा भी आलोक जैसा ही था, इसलिए हमारी केमिस्ट्री हमेशा अच्छी रही। अगर कहीं डॉयलॉग भूल जाते, तो हम एक-दूसरे को आँखों से समझ जाते। मंच हो, टेलीविज़न हो या फ़िल्म—उनका चुंबकीय अभिनय दर्शकों को झकझोर देता था, चाहे नाटक सुखांत हो या दुःखांत। एक सह-अभिनेत्री के रूप में मैं गहराई से महसूस करती हूँ कि उनके जैसा चमत्कारिक और चुंबकीय अभिनय अब शायद कभी देखने को न मिले।
आलोक ने नाटकों के निर्देशन के साथ-साथ कहानी, कविता और उपन्यासों को भी नाट्य रूप दिया। हर प्रस्तुति को उन्होंने कम से कम साज-सज्जा, तामझाम, सेट, प्रॉपर्टी और वेशभूषा के साथ प्रभावशाली बनाया। हमारा विश्वास यही था कि जितना नाटक के काल और समय के लिए ज़रूरी हो, बस उतना ही होना चाहिए। यथार्थवादी और सात्विक अभिनय ही प्रधान होता है—बाकी चीजें गौण। अगर हैं तो ठीक, नहीं हैं तो प्रतीकात्मक/सजेस्टिव ही पर्याप्त है। रियलिस्टिक नाटकों के प्रति मेरा और उनका रुझान रहा।
अनुशासन उनके लिए सर्वोपरि था। कोई भी कलाकार रिहर्सल में एक मिनट भी देर से आता तो वे नाराज़ हो जाते और कई बार बेहिचक उसे कास्ट से बाहर कर देते। स्क्रिप्ट की रीडिंग, कास्टिंग, ब्लॉकिंग, संवाद याद करके आना—सबके लिए अनिवार्य। रिहर्सल ठीक दो घंटे की—न एक मिनट कम, न ज़्यादा। एक हफ़्ते में नाटक का ढांचा तैयार हो जाता, दूसरे हफ़्ते में पॉलिशिंग और स्पीच पर काम, फिर चार-पांच दिन बैक स्टेज के सारे कामों के साथ बीस-बाइस दिन में बड़े से बड़ा नाटक बेहतरीन प्रदर्शन के लिए तैयार। इस तैयारी में वे कड़े अनुशासन का पालन करते थे।
आलोक चटर्जी ने एक सौ पचास से करीब नाटकों में अभिनय किया, उसके सैकड़ों प्रदर्शनों में हिस्सा लिया। तीन सौ से भी ज़्यादा नाटकों का निर्देशन किया, ना जाने कितनी कार्यशालाएँ कीं। हिंदुस्तान के कई शहरों और गाँवों में गए। हर जगह काम करने का तरीका एक ही—अनुशासन के साथ तैयारी और निर्माण–प्रदर्शन। स्क्रिप्ट का एक-एक शब्द उनके दिमाग में कंप्यूटर की तरह फीड रहता था। उन्हें हर चीज़—पेज नंबर, तारीख़, किताबों के नाम, किस लाइन में क्या लिखा है, चरित्रों के नाम—सब याद रहता था। एक निर्देशक के रूप में आलोक विस्मयकारी रहे; हम सब उनके निर्देशन से आज भी अभिभूत हैं।
उन्नीस सौ अस्सी, इक्यासी में हमारी मुलाक़ात भोपाल भारत भवन के रंगमंडल में हुई थी । तब अक्सर रंगमंडल के सफ़र के दौरान बस और ट्रेन में अंताक्षरी होती। आलोक उन दिनों किशोर कुमार के गीत बहुत अच्छी तरह गाया करते थे। दोस्ती हुई और फिर यह दोस्ती प्यार में बदल गई। आलोक मुझे अपनी लिखी कविताएँ सुनाते—अद्भुत सौंदर्य और संवेदनाओं से ओतप्रोत। उनकी कविताओं की सहज लिपि मुझे बहुत प्रभावित करती थी। वे चार पंक्तियों से लेकर दो पेज तक की लंबी कविताएँ भी सुनाते।
अपनी लिखी कविताओं के साथ ही अक्सर रात को सोने से पहले या दिन में मुक्तिबोध, श्रीकांत वर्मा, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जी की कविताएँ सुनाया करते। बहुत बार वे कोई आलेख लिखते तो उस विषय पर हमारी बातें होतीं। जीवन की तमाम आपाधापी के बीच उनका लेखन सिलसिला रह-रहकर जारी रहा। आज भी उनके लिखे कई पन्ने, कागज़, डायरियाँ हमारे पास हैं।
अस्पताल में तबीयत बहुत ज़्यादा बिगड़ने से दो–तीन दिन पहले तक वे चेखव के प्रसंग पढ़ते रहे। मुझसे अस्पताल में घर से दो–तीन किताबें लाने को कहा। वे किताबें अब भी उनके पलंग पर मैंने संभालकर रखी हैं। उनकी यादें ही मेरी ज़िंदगी का बेशकीमती ख़ज़ाना हैं—बाकी तो हम सभी को खाली हाथ ही जाना है।
आलोक को आख़िरी वक़्त तक याद था कि किस किताब पर कौन-से महत्वपूर्ण पॉइंट्स लिख रखे हैं। मैंने नवंबर–दिसंबर दो हज़ार पच्चीस में आलोक के साथ मिलकर एक मुलाक़ात शकुंतला से लिखा था। उसके बारे में मैंने अस्पताल में जब उनसे पूछा, तो उस दशा में भी उन्हें उसके संवाद का पेज नंबर और लाइन पूरी तरह याद थी। एनएसडी दिल्ली में अपने तीन साल के अध्ययन के दौरान वे कई बार चार–चार दिनों तक कमरे से बाहर नहीं निकलते थे। उन्हें इस बात से फर्क नहीं पड़ता था कि पास में कौन ढोल पीट रहा है या कौन कूद–फांद रहा है—वे ध्यानमग्न रहते, जब तक उनका पढ़ना पूरा नहीं हो जाता। उनसे मिलने वाले यह बात कभी नहीं भूलते कि वे एक अच्छे लेखक होने के साथ ही उन्होंने बहुत सारा अध्ययन भी किया है।
आलोक में नए कलाकारों के अंदर छिपी प्रतिभा, जिज्ञासा और क्षमताओं को तुरंत पहचान लेने का गुण था। वे कलाकारों को सही दिशा और दशा देने में हर संभव मदद करते थे। परंतु जिनमें रंगकर्म सीखने में लापरवाही, अनुशासनहीनता, कामचोरी दिखाई देती—उन्हें वे तुरंत बाहर का रास्ता दिखा देते। एक कला गुरु के रूप में यह उनका स्वभाव था, जो उनकी वर्कशॉप्स या नाटक के निर्माण के समय स्पष्ट रूप से नज़र आता था। आज उनके अनगिनत स्टूडेंट्स देशभर में अपना रंगकर्म और अभिनय कर रहे हैं—टेलीविज़न, थिएटर, फ़िल्म—कुमुद मिश्रा, मानव कौल, पद्म, इश्तियाक़ खान आदि उनके अनेक अभिनेता–अभिनेत्री आज बहुत अच्छा काम कर रहे हैं।
आलोक में किसी भी विषय पर बोलने, व्याख्यान देने की अद्भुत प्रतिभा थी। हमारे रंग गुरु बाबा कारंत जी इस गुण को भली-भाँति जानते थे। वे आलोक के किसी व्याख्यान, वर्कशॉप, टीचिंग को चुपके से देखना–सुनना चाहते थे और एक बार एनएसडी में उन्होंने आलोक को किसी विषय पर बोलते हुए चुपचाप पीछे दर्शकों में बैठकर सुना भी—यह बात ख़ुद कारंत जी ने हमें बताई थी। शिक्षक के रूप में भी आलोक, आलोक ही थे।
आलोक बहुत अच्छे कवि भी थे। कविताएँ लिखने के साथ ही आलोक को पवन जैन जी के साथ लाल किले पर छब्बीस जनवरी को बड़े-बड़े कवियों के साथ कविता पढ़ने का आमंत्रण मिला था—सन और रचनाकार मुझे याद नहीं। किसी भी समय, किसी भी प्रतिष्ठित मूर्धन्य रचनाकार की कविताओं का पाठ उनके लिए उतना ही सहज–स्वाभाविक रहा है जितना हवा में सांस लेना। मंत्रमुग्ध हो जाता था हर सुनने–देखने वाला—नाटक हो या कविता—अर्थ हो, भावार्थ हो—इतनी संवेदनशीलता और भावाविभोर होकर आलोक कविता पाठ करते कि उन्हें सुनते ही रहने का मन करता हर किसी का। आलोक की जिह्वा पर सरस्वती विराजमान रहीं सदैव—यह कोई भी दर्शक–श्रोता नकार नहीं सकता।
आलोक का जीवन साथी बनने से पहले सिर्फ छह–सात दिनों की ही हमारी दोस्ती रही। आठवें दिन से ही हम एक-दूसरे के बिना दो मिनट भी एक-दूसरे को देखे बिना रह नहीं पाए—ना ही जी पाए। शायद इसी को मुहब्बत या प्यार कहते हैं, जो हम दोनों को हो गया था। शुरुआत में ही हमने तय कर लिया था कि हम शादी करेंगे। उसके बाद पाँच साल तक जमकर अफेयर चला—जिसे शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता।
आलोक की आँखें बोलती थीं, उनकी आँखें दिल को, अंदर तक बेध देती थीं। उनका दिल अंदर से रूई की मानिंद था—हालाँकि ऊपर से देखने में कठोर। पहले दिन से ही मैंने यह बात महसूस की। आलोक को मैं मन्ना कहती थी और वे मुझे मन्नी । उस मन्ना ने मुझे हमेशा हर बात, हर सोच, हर विचार में मानसिक स्वतंत्रता दी—जो कि एक लड़की के जीवन के लिए बहुत ज़रूरी है, ख़ासकर मेरे जैसी एथलीट के लिए। मैंने शुरू में ही आलोक से कहा था कि मैं किसी भी तरह का बंधन स्वीकार नहीं करती—बचपन से आज तक, न कभी आगे करूँगी। आज़ाद पक्षी की तरह स्वतंत्रता से जीना चाहती हूँ, इसलिए कभी शादी करने का नहीं सोच सकती—पर आलोक बोले, “मेरी सोच तुम्हारी जैसी ही है।” बस फिर क्या था!
आलोक का बेजोड़ करिश्माई अभिनय मुझे बेहद पसंद था। जब आलोक मंच पर अश्वथामा करते, तो मेरी आँखें उनसे हटती नहीं थीं। मैंने बाबा कारंत जी की बहुत डांट खाई। आलोक के नाट्य अभिनय के सामने दूसरा कोई नहीं—यह बात शायद सब जानते–मानते हैं, भले ही स्वीकार न करें। आलोक की आँखों का आकर्षण, मन को मंत्र मुग्ध कर देने वाला जादुई अभिनय, और मुझे दी गई मानसिक स्वतंत्रता—यही वे चीजें हैं जिन्होंने मुझ जैसी आज़ाद पंछी को आज तक उनके लिए बाँधकर रखा, उनका बना दिया। रामेश्वर शर्मा जी हमेशा कहते थे—“अगर मैं लड़की होता तो आलोक की आँखों के कारण आलोक से शादी करता।” वे मज़ाक में मुझे छेड़ते—“शोभा, तुम उससे कभी शादी नहीं कर पाती!”
आलोक बहुआयामी प्रतिभा के धनी कलाकार व्यक्तित्व थे। वे एक सशक्त अभिनेता थे। किसी भी चरित्र, किसी भी भूमिका को वे एक नए रंग से भर देते थे। उनकी संवाद शैली एक ही किरदार में कई शेड्स पैदा कर देती थी। मंच पर उनकी अभिव्यक्ति मंत्रमुग्ध कर देने वाली रही—स्वरूप चाहे जो हो: नाट्य पाठ, कविता पाठ, उपन्यास पाठ, लेख–समीक्षा। वे जब पढ़कर सुनाते, तो किसी का ध्यान भंग नहीं होता।
आज हमें उन जैसे कलाकार से ईमानदारी और सच्चाई सीखने की ज़रूरत है। वे आज भी हमारी प्रेरणा हैं। कला को लेकर उनके विचार नए कलाकारों के लिए मील का पत्थर हैं। उनके बारे में क्या और कितना कहा जाए—आलोक को जानना और समझना भी शायद एक अकेले के बस की बात नहीं। उनसे जो मिला, वह उनका मुरीद ही हो गया। …बस इतना ही।
आलोक के स्मरण दिवस पर मुझे उन साथियों और आत्मीय परिजनों की भी याद आ रही है, जिन्होंने हमारे संघर्ष और विपरीत परिस्थितियों में हर संभव सहयोग दिया और कठिन हालात में हमारे साथ खड़े रहे। इनमें सर्वश्री शरद शर्मा, राकेश दीक्षित, प्रदीप बड़गूजर, प्रकाश हतवलने और बेटा सनी (प्रत्यूष) बार-बार याद आते हैं। मैं अपनी इस जीवन-यात्रा में हर वक्त मेरे सिर पर अपना हाथ रखने वाले, मेरे दुःख को समझने वाले ईश्वर तुल्य माता-पिता श्रीमती तारा और श्री पी.एस. मोदी को नहीं भूल सकती। इसी तरह मेरे अनेक मित्र और करीबी भी हैं जिन्होंने समय-समय पर हमारा साथ दिया और कठिन परिस्थितियों में हमें संभाला। आज आलोक के बिना उन सभी की भी याद और आभार। …इंदौर स्टूडियो की रिपोर्ट। आगे पढ़िये आलोक चटर्जी अभिनीत आख़िरी नाट्य प्रस्तुति रेड फ्रॉक की समीक्षा।











