Sunday, September 6, 2026
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कला सिर्फ़ सजावटी बनकर नहीं रह सकती- अमोल पालेकर

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“कला आज सिर्फ़ सजावटी (सजाने की वस्तु मात्र) बनकर नहीं रह सकती। इसे जुड़ना चाहिए, सवाल करने चाहिए, और जब जरूरी हो, तो विरोध करना चाहिए।” अमोल पालेकर ने यह बात मेटा लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड से सम्मानित किये जाने के अवसर पर कही। उन्हें यह सम्मान महिंद्रा ग्रुप के वाइस प्रेसिडेंट और कल्चरल आउटरीच के हेड जय शाह के साथ टीमवर्क आर्ट्स के मैनेजिंग डायरेक्टर संजॉय के. रॉय ने प्रदान किया। Amol Palekar was presented with the Meta Lifetime Achievement Award. A photograph from the occasion. A presentation by IndoStudio. 25 मार्च की शाम दिल्ली के कमानी सभागृह में यह कार्यक्रम हुआ। इसमें कई कला हस्तियां और देश भर से आमंत्रित कलाकार दल शामिल हुए। कार्यक्रम में अमोल पालेकर के कला सफ़र से जुड़ी शॉर्ट फिल्में भी दिखाई गईं। अमोल पालेकर ने अपने लिखित भाषण में जो कुछ कहा, उसे हम यहां ‘जैसा कहा गया, वैसा ही प्रस्तुत कर रहे हैं’। अस्वस्थ होने के बावजूद वे समारोह में पहुँचे और 21 वें मेटा थियेटर अवॉर्ड के समारोह का हिस्सा बने। कला से जुड़ी अपनी भावनाओं और गहरे अनुभवों को पूरे मन से साझा किया।Amol Palekar was presented with the Meta Lifetime Achievement Award. A photograph from the occasion. A presentation by IndoStudio.अमोल पालेकर ने कहा – “आज रात, मैं इस सम्मान को कृतज्ञता और कुछ हद तक चिंतन के साथ स्वीकार करता हूँ। मेरा मानना है कि पुरस्कारों का अपना एक समय होता है। जब वे सही समय पर मिलते हैं, तो वे स्वीकृति देने से कहीं अधिक का काम करते हैं। वे आपके काम को पुष्टि (प्रमाणित) करते हैं, वो आपकी यात्रा को नई गति प्रदान करते हैं।Amol Palekar was presented with the Meta Lifetime Achievement Award. A photograph from the occasion. A presentation by IndoStudio. मेरी अपनी यात्रा छह दशकों से अधिक की रही है। और सम्मान अकेले नहीं आए हैं। अपनी बात रखने की, फैसलों पर सवाल उठाने की, सुविधानुसार ख़ुद को न ढालने की, राजनीतिक संरक्षण से दूरी बनाए रखने की एक कीमत चुकानी पड़ती है। समय के साथ इंसान यह सीख जाता है कि पहचान केवल योग्यता के बारे में नहीं है। यह इस बारे में भी है कि कोई सत्ता के ढांचे में कितनी आसानी से फिट बैठता है। और मैंने कभी वह आराम (सुविधा) नहीं चुना है। Amol palekar, film - Golmal एक फिल्म स्टार के रूप में मेरी फ़िल्मों ने एक ऐसी छवि बनाई जिसने विजुअल आर्ट्स, थिएटर और निर्देशन में मेरे काम को पीछे छोड़ दिया। व्यक्ति और संस्थाएं- पूर्वाग्रह, प्राथमिकता, या असहमति से होने वाली असुविधा से अछूते नहीं हैं। मुझे यह भी स्वीकार करना चाहिए कि मैं अपने काम को उस हद तक बढ़ावा देने में विफल रहा, जिसका वह हक़दार था। शायद इसी वजह से मैंने अपनी आत्मकथा व्यूफाइंडर‘ (Viewfinder) लिखने की ज़रूरत महसूस की, ताकि मैं ख़ुद को अधिक पूर्ण अर्थों में फिर से पेश कर सकूँ।Amol Palekar was presented with the Meta Lifetime Achievement Award. A photograph from the occasion. A presentation by IndoStudio. मैं सिनेमा में अपने काम के प्रति कृतघ्न नहीं हो सकता। इसने मुझे अपनी शर्तों पर थिएटर को आगे बढ़ाने के लिए धन संबंधी आज़ादी दी। मेरे फिल्मी करियर की उस स्थिर आय ने मुझे 30 से अधिक नाटकों का निर्माण, निर्देशन और अभिनय करने में सक्षम बनाया। इससे मुझे अपनी एक अलग रचनात्मक आवाज़ को आकार देने का मौका मिला। इसी समझ से वे विकल्प उभरे हैं जो मैंने जीवन में या अपने काम में चुने हैं। मेरी 60 साल की यात्रा के दौरान, ये विकल्प विचारों और दृढ़ विश्वास की एक तय नज़रिये से प्रेरित थे।Amol Palekar was presented with the Meta Lifetime Achievement Award. A photograph from the occasion. A presentation by IndoStudio. जब भारतीय भाषाओं में पश्चिमी नाटककारों को पेश करने का प्रमुख चलन था, तब मैंने इसके बजाय हमारी अपनी क्षेत्रीय भाषाओं के नाटकों का हिंदी और मराठी में अनुवाद करने और मंचन करने का विकल्प चुना। मेरा हमेशा से मानना है कि थिएटर सांस्कृतिक समन्वय (synthesis) के एक पुल के रूप में काम कर सकता है। ऐसे आदान-प्रदान के माध्यम से, हमने एक ऐसा स्थान बनाया जहाँ विभिन्न भारतीय भाषाई और सांस्कृतिक परंपराएँ एक-दूसरे के साथ उभर सकें। वे समझ को गहरा कर सकें और नाटकीय कल्पना को समृद्ध कर सकें।Ratan Thiayam

दूसरी बात, मैंने यह सुनिश्चित करने की गहरी ज़रूरत महसूस की है कि हमारे अपने दिग्गजों के काम हम सभी की स्मृति से मिट न जाएं। अगर हम उन्हें सक्रिय रूप से पुनर्जीवित नहीं करते हैं, तो युवा पीढ़ियां महज़ शेक्सपियर, इब्सन, चेखव और बेकेट को जानकर ही बड़ी होंगी। और हमारी अपनी नाटकीय परंपरा की समृद्धि से अपरिचित रहेंगी। इसी को ध्यान में रखते हुए, मैंने बादल सरकार, विजय तेंदुलकर और रतन थियाम के उनके किये गये कामों पर आधारित कार्यक्रमों (retrospectives) का आयोजन किया था। समृद्ध कन्नड़ और मराठी ‘संगीत नाट्य’ परंपराओं का जश्न मनाने के साथ-साथ। मेरा मानना है कि ऐसी कोशिशें केवल पुरानी यादों का काम नहीं हैं, बल्कि अतीत को वर्तमान के साथ एक सार्थक संवाद में लाने का काम है।Amol Palekar in a drama show, pune.इस प्रक्रिया में, मैं वरिष्ठ रंगकर्मियों को एक मौन समर्थन देने के मौके पैदा कर सका। ‘अपरिग्रह’ के गांधीवादी विचार में मेरे विश्वास ने मेरे इस दृढ़ विश्वास को भी आकार दिया है कि जिन लोगों ने हमारे थिएटर का निर्माण किया है, उन्हें अपने बाद के वर्षों में वित्तीय असुरक्षा (Financial Insecurity) का सामना नहीं करना चाहिए। इसी भावना के साथ, मैंने नए काम का समर्थन करके युवा रंगकर्मियों के लिए भी दरवाज़े खोलने की कोशिश की है।badal sarkar तीसरी बात, थिएटर के साथ मेरे जुड़ाव ने प्रतिरोध का रूप ले लिया है। मैंने आपातकाल (Emergency) के दौरान बादल दा के नाटक ‘जुलूस’ के 150 से अधिक प्रदर्शन किए। हाल ही में, 80 वर्ष पूरे होने पर मंचित ‘कुसूर’ के माध्यम से, मैंने अल्पसंख्यकों के प्रति हमारे पूर्वाग्रहों का पता लगाया। जो आज के सामाजिक-राजनीतिक माहौल में स्पष्ट है। मेरा हमेशा कोशिश नाइंसाफ़ी और सत्तावादी प्रवृत्तियों के ख़िलाफ़ एक असहमति की आवाज़ को स्पष्ट करना रहा है।Amol Palekar was presented with the META Lifetime Achievement Award. A clip from his film was screened on this occasion.Amol Palekar was presented with the META Lifetime Achievement Award. A clip from his film was screened on this occasion.1974 में, मैंने नाटक ‘वासना कांड’ पर पाबंदी को सफलता से चुनौती दी। प्री-सेंसरशिप के ख़िलाफ़ अपनी जनहित याचिका के माध्यम से, मैंने एक बुनियादी सवाल उठाया है: क्यों केवल महाराष्ट्र और गुजरात में थिएटर करने वालों को प्रदर्शन से पहले प्रमाणीकरण (certification) लेने की आवश्यकता होनी चाहिए, जब देश में कहीं और ऐसा कोई नियम नहीं है? यह भेदभावपूर्ण प्रथा असंवैधानिक है और मैंने बॉम्बे हाई कोर्ट से इसे हटाने की मांग की है। मैं सिर्फ़ यही आशा करता हूँ कि मेरे जीवनकाल में इस मामले की सुनवाई हो और इसे सुलझा लिया जाए। A 2010 production of the play at The Doon School, Dehradun Andha Yug . play written in Hindi, by renowned playwright Dharamvir Bharati . ऐसी बाधाओं का विरोध करने पर ही इंसान आज़ादी के सही मूल्य को समझना शुरू करता है। सत्य ने हमेशा हमें स्वतंत्र होने के साहस की याद दिलाई है। ‘अंधा युग’ में, डॉ. धर्मवीर भारती, गांधारी को सर्वशक्तिमान कृष्ण का सामना करने और यहां तक कि उन्हें श्राप देने का नैतिक साहस देते हैं:
यदि तुम चाहते तो रुक सकता था युद्ध यह!
इंगित पर तुम्हारे ही किया भीम ने अधर्म!
क्यों नहीं तुमने वो शाप दिया भीम को जो तुमने दिया अश्वत्थामा को?
तुमने किया है प्रभुता का दुरुपयोग!
किया है तुमने ये सब कृष्ण! तुमने ही किया है!
सुनो, आज तुम भी सुनो!
प्रभु हो या परात्पर हो, कुछ भी हो!
मारे जाओगे पशुओं की तरह!
ऐसे क्षणों में, थिएटर हमें याद दिलाता है कि कोई भी शक्ति पूछताछ (सवालों के घेरे) से परे नहीं है। आज़ादी का अर्थ केवल बंधनों का अभाव नहीं है। अपने सत्य को जीने का साहस है। ये यही सच्ची आज़ादी है जिसने मुझे कायम रखा है, जिसने मुझे बिना पछतावे के काम करना, बिना हिसाब-किताब के जोख़िम उठाना, और बिना समझौते की भावना के पीछे मुड़कर देखना सिखाया है।Habib Tanveer in a Play,कलाकार अपने समय से अलग मौजूद नहीं होता है। उसका वक्त बहुत ध्यान माँगता है—जब डेमोक्रेसी सिमट रही है, जनता की बातचीत कमज़ोर हो रही है और युद्ध हमारे आज के वक्त को परिभाषित कर रहे हैं। ऐसे दौर में कला सिर्फ़ सजावट बनकर नहीं रह सकती, उसे समाज की सच्चाई और दर्द को सामने लाना होगा। इसे जुड़ना चाहिये, सवाल करना चाहिये, और जब ज़रूरी हो, तो विरोध भी करना चाहिये।Safdar Hashmi Street Play. भारत में थिएटर ने लंबे समय से इस ज़िम्मेदारी को उठाया है। सफ़दर हाशमीने दिखाया कि सार्वजनिक चौक पर प्रदर्शन साहस का एक काम हो सकता है। हबीब तनवीर ने इसकी भाषा का विस्तार करते हुए थिएटर को हालात की सचाई के अनुरूप स्थापित किया। Girish Karnad बादल सरकार भी सड़कों पर उतरे, रूप और दर्शकों दोनों को फिर से परिभाषित किया। गिरीश कर्नाड ने सत्ता और इतिहास से सवाल किए। रतन थियाम ने एक दृश्य भाषा बनाई जो जड़ से जुड़ी और सार्वभौमिक दोनों थी। दुनिया भर में, ब्रेख़्त से लेकर बोआल तक, कला अपने सबसे महत्वपूर्ण रूप में कभी भी तटस्थ नहीं होती है।Natya Guru Satyadev Dubey. मैं इस सम्मान को कृतज्ञता के साथ स्वीकार करता हूं और इसे अपने गुरु सत्यदेव दुबे, थिएटर यूनिट और अनिकेत के अपने सहयोगियों, उन कई महान बंगालियों को जिन्होंने मुझ पर विश्वास किया और मेरी कलात्मक संवेदनशीलता को गहरा किया, और अपने प्यारे परिवार को समर्पित करता हूं जिनके अटूट समर्थन ने इस यात्रा को बनाए रखा है। मैं इसे बर्टोल्ट ब्रेख्त की प्रसिद्ध पंक्तियों के साथ समाप्त करना चाहूंगा:
“In the dark times
Will there also be singing?
Yes, there will also be singing.
About the dark times.” (Svendborg Poems)
(अंधेरे समय में, क्या तब भी गायन होगा? हाँ, तब भी गायन होगा। अंधेरे समय के बारे में। ) तो आइए हम बिना किसी डर के उस समय के बारे में गाते रहें जिसमें हम रहते हैं। बहुत-बहुत धन्यवाद।” प्रस्तुति: indorestudio.com  

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