शकील अख़्तर, इंदौर स्टूडियो। ‘आशा करूँ कि आप लोग हमारी सरकारों को, स्थानीय प्रशासन को मजबूर करें, अपनी माँग के द्वारा। यह माँग कि हर बड़े नगर में, बड़ी नाट्य मंडलियां हों। सिर्फ ड्रामा स्कूल ना हुआ करें, मंडलियां भी हों। ताकि अभिनेताओं को आवश्यक न रहे कि वे टेलिविज़न और सिनेमा में ही जा सकें और समाज में काम करें तो माँग-माँगकर। ऐसा ना होने दें’।
प्रिव्यू शो में दर्शकों से आग्रह: 83 बरस के रंग-साधक, प्रो. रामगोपाल बजाज ने, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में ‘अंधा युग’ नाटक के प्रिव्यू या ग्रैंड शो के बाद, ये बात कही। जब वे यह निवेदन कर रहे थे, तब रंगमंच के कलाकारों के प्रति, उनके दर्द को समझा जा सकता था। सीखने की बात ये भी है कि उन्होंने यह शो, दर्शकों की प्रतिक्रियाओं को जानने और नाटक में आवश्यक सुधार के नज़रिये से रखा था। दर्शकों की प्रतिक्रियाओं को समझने के लिये बकायदा परचियां रखी गईं थीं।
नाटक का पहले भी कर चुके निर्देशन: एनएसडी के पूर्व निदेशक श्री बजाज 20 साल पहले भी ‘अंधा युग’ नाटक का निर्देशन कर चुके हैं। मगर शो के बाद, एक सामान्य सृजनकर्मी की तरह उन्होंने कहा -‘इस समय नाटक को लेकर मेरे मन में, बहुत सी बातें चल रही हैं,आप सब अपने यह प्रस्तुति देखने आये, किस-किस का नाम लूँ, सभी को धन्यवाद,आभार।’ (प्रिव्यू शो से पहले कला समीक्षक श्री रवींद्र त्रिपाठी के साथ प्रो.रामगोपाल बजाज।)
घोषणा होते ही बिक गये टिकट: 25 मार्च 2023 को एनएसडी, दिल्ली के अभिरंग सभागार में नाटक का प्रिव्यू हुआ। इसके बाद 26 मार्च से 28 मार्च तक शोज़ रखे गये। नये प्रदर्शन की घोषणा होते ही ‘बुक माय शो’ पर सारे टिकट बिक चुके थे। इसलिये एनएसडी को एक अतिरिक्त शो भी रखना पड़ा। शो को मिली सफलता से लगता है अब इस नाटक के जल्द ही और भी मंचन होंगे। नाटक में काम करने वाले एनएसडी, रंगमंडल के कलाकारों के बारे में भी रामगोपाल बजाज जी ने टिप्पणी की। कहा – ‘ये बहुत अच्छे कलाकारों की रंगमंडली है’। यह कलाकारों की प्रस्तुति से ज़ाहिर भी हुआ।
नई प्रस्तुति, उत्कृष्ट प्रदर्शन: इसमें शक नहीं कि ‘अंधा युग’ की नई प्रस्तुति प्रभावशाली रही। रामगोपाल बजाज के अनुभवी निर्देशन का कलाकारों को लाभ मिला। उन्होंने अपनी तरफ़ से उत्कृष्ट कर दिखाया। कहना ना होगा, इस कालजयी नाटक के बहुत से विविध प्रयोग होते रहे हैं। कई शैलियों में यह खेला गया है। सत्यदेव दुबे, इब्राहिम अलकाज़ी जी के निर्देशन से लेकर भानु भारती तक के ‘अंधा युग’ की प्रस्तुतियाँ, उनके कलाकार के साथ आँखों में घूम जाती हैं। इस कारण तुलना भी पीछा नहीं छोड़ती। नये कलाकारों के सामने पुराने कलाकारों के अभिनय की छवियाँ मन में उभरने लगती हैं।
सशक्त और सम्मोहक नाटक: परंतु जब नाटक की 2 घंटे 20 मिनट की अवधि के दौरान आप हिलते नहीं, कोई दूसरा ख़याल नहीं आता। तब जाकर आपको अहसास होता है कि यह नाटक कितना दमदार है, प्रस्तुति कितनी सशक्त और सम्मोहक है। यह नाटक निर्देशक की क्षमता और कल्पना को तो चुनौती देता ही है, एक अभिनेता के लिये भी संभावना के द्वार खोलता है। इस नाटक में कोई किरदार ऐसा नहीं है जिसके पास संवाद और अभिनय का मौका ना हो। चाहे वह अश्वत्थामा हो, गांधारी या युयुत्सु हो या फिर संजय या प्रहरी। गूँगे भिखारी का अभिनय तक याद रह जाता है। यही इस प्रस्तुति में हुआ।
गीत-संगीत और ध्वनि: इस नाटक में काव्यमय संवाद, गीत-संगीत और ध्वनि का ज़बरदस्त तालमेल है। नाटक देखते समय एक बार फिर अश्वत्थामा और गांधारी के संवाद और अभिव्यक्ति ने दर्शकों को बाँधकर रखा, शेष कलाकारों ने भी अपने पात्रों की भूमिकाओं में बेहतरीन प्रदर्शन किया। नाटक के काव्यमय गीतों और उनकी धुनों ने भी इस क्लासिक प्रस्तुति में नया आकर्षण पैदा किया। नाटक की प्रकाश योजना, वेशभूषा आदि सभी ने नाटक में अपनी तरह से योगदान दिया।
ओम शिवपुरी का पार्श्व स्वर: सूत्रधार और कृष्ण के संवादों में ख़ुद रामगोपाल बजाज और ओमपुरी की पार्श्व आवाज़ों का सदुपयोग हुआ। याद दिला दें कि ओमपुरी, एनएसडी में 1961 बैच के छात्र रहे हैं। उन्होंने एक समय ‘अंधा युग’ में कृष्ण और ‘आषाढ़ का एक दिन’ में कालीदास की आवाज़ से ख्याति प्राप्त की थी। रामगोपाल बजाज ने इसी बात के सम्मान में कहा भी – ‘एक संस्कार था, आभार था। इसलिये हमने नाटक में 1963 में की गई रिकॉर्डिंग का सदुपयोग किया। यह रिकॉर्डिंग एक बंद कमरे में की गई थी। इसीलिये इसकी रिकॉर्डिंग की गुणवत्ता बहुत अच्छी नहीं है’। परंतु पूरी प्रस्तुति के दौरान यह बात महसूस नहीं हुई। पता नहीं चला कि नाटक में 50 साल पहले की रिकॉर्डिंग उपयोग की गई है। इस प्रस्तुति की यह एक अनमोल और प्रशंसनीय बात रही।
अंधा युग और उसकी पृष्ठभूमि: धर्मवीर भारती ने आज़ादी के बाद ‘अंधा युग’ की रचना की थी। मगर आज भी यह नाटक प्रासंगिक बना हुआ है। नाटक महाभारत के अंतिम दिन (18 वें दिन) के युद्ध और युद्ध के बाद की घटनाओं और उसके परिणामों को सामने रखता है। यानी यह युद्द के बाद वह अंधा युग है जिसमें स्थितियां, मनोवृतियां, आत्माएं, सब विकृत हैं। सभी अपने अंतर की, अंध गुफ़ाओं के वासी हैं। नाटक का प्रारंभिक गीत –‘ अंधियारों का अंधापन जीत गया / जो सुंदर था, शुभ था, कोमलतम था, वह हार गया, द्वापर युग बीत गया’….अपने आप में बहुत कुछ कह देता है।
धर्म और अर्थ का क्षय होगा: इसी तरह नाटक के पूर्व उदबोधित कथन में ‘विष्णु पुराण’ से उदघृत सार है, जिसमें कहा गया है – ‘उस भविष्य में धर्म,अर्थ का क्षय होगा। धीरे-धीरे सारी धरती का। सत्ता उसकी होगी, जिनकी पूँजी होगी, जिनके मलिन चेहरे होंगे, केवल उन्हें महत्व मिलेगा। राज शक्तियाँ, लोलुप होंगी। जनता पीड़ित होकर, गहन गुफ़ाओं में छिप-छिपकर दिन काटेंगी। गहन गुफाएं सचमुच की या अपने कुंठित अंतर की’।

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सिर्फ़ ड्रामा स्कूल ना हों, मंडलियां भी रहें, ‘अंधा युग’ के शो में प्रो.बजाज
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