शकील अख़्तर, इंदौर स्टूडियो। एक क्लासिक नाटक अपनी जटिल प्रस्तुति और अतिरेक की वजह से कई बार मंच पर वैसा प्रभाव नहीं छोड़ पाता जिसकी हम उम्मीद रखते हैं। श्रीराम सेंटर में 7 मई की शाम मंचित नाटक ‘एंडोरा’ (Andorra) के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ।
स्विस नाटककार मैक्स फ्रिस्च (Max Frisch) द्वारा लिखित यह एक मार्मिक और विचारोत्तेजक नाटक है। यह नाटक इंसान की पहचान को लेकर बनाई गई धारणाओं और उससे जुड़े सवालों को बड़ी तीव्रता से उठाता है। इसका मूल संदेश है कि ‘इंसान को बस इंसान ही रहने दो, उसे पहचान के खांचों में मत बांटो’। दुर्भाग्य से यह नाटक, विचार और प्रस्तुति, दोनों ही स्तरों पर बिखर गया। इसके बावजूद कि इस नाटक की प्रस्तुति के लिये जमकर तैयारी की गई।
इस नाटक का निर्देशन युवा रंग-ऊर्जा से भरी सुश्री मुस्कान गोस्वामी ने किया। श्रीराम सेंटर के इस ‘स्टूडेंट प्रॉडक्शन’ के लिए उन्होंने 45 दिन की थिएटर वर्कशॉप की और इस मुश्किल कृति को मंच पर उतारने का जोखिम उठाया। अपनी परिकल्पना के अनुरूप उन्होंने नाटक में कुछ बदलाव किए। साथ ही मंच सज्जा, प्रकाश योजना, वेशभूषा आदि पर सहयोगी कलाकारों के साथ बेहतर काम किया, इन सभी बातों के बावजूद नए कलाकारों के साथ उनका यह प्रयास कामयाब नहीं हो सका।
इस नज़रिये से कहना होगा कि सुश्री मुस्कान ने अपने स्तर पर नाटक को बढ़िया तरह से डिज़ाइन किया, उसे अपने अनुभव और कल्पना के अनुरूप निर्देशित किया, नये कलाकारों के प्रशिक्षण में घंटों की मेहनत की। कठिन प्रयोग का साहसिक क़दम भी उठाया।
यह नाटक एक काल्पनिक देश ‘एंडोरा’ (Andorra) की कहानी है, जो खुद को बेहद शांति प्रिय बताता है। मुख्य पात्र एंड्री (Andri) को उसका शिक्षक पिता कैन, ये कहकर पालता है कि वह एक अनाथ यहूदी बच्चा है, जिसे उसने पड़ोसी क्रूर देश ‘ब्लैक्स’ के अत्याचारों से बचाया है। समाज में एंड्री की पहचान एक यहूदी के रूप में रूढ़ हो जाती है। धीरे-धीरे एंड्री खुद भी इन पूर्वाग्रहों को आत्मसात कर लेता है। लेकिन सच्चाई ये है कि एंड्री यहूदी नहीं, बल्कि कैन और सेनोरा नाम की महिला की अवैध संतान है।
कहानी में मोड़ तब आता है जब एंड्री को अपनी सौतेली बहन बार्बलिन से प्यार हो जाता है और सच सामने आता है। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होती है; एंड्री अपनी ‘यहूदी’ पहचान छोड़ने से इनकार कर देता है। अंततः, एक झूठे आरोप में पाइडर नाम का एक कामुक सैनिक (जिसने एंड्री की प्रेमिका का यौन शोषण किया) उसकी हत्या कर देता है।
इस कहानी का एक और दु:खद पक्ष समाज के ‘मूक दर्शकों’ की ख़तरनाक चुप्पी है। नाटक में बढ़ई, डॉक्टर और पादरी जैसे किरदार कायर और स्वार्थी हैं। उनकी यह चुप्पी एंड्री की हत्या का कारण बनती है, फिर भी वे खुद को बेगुनाह साबित करने की कोशिश करते हैं। नाटक यह स्थापित करता है कि ज़ुल्म करने वाला ही एकमात्र अपराधी नहीं होता; कायरता से भरी चुप्पी ओढ़ने वाला ‘आम आदमी’ भी उस अपराध में बराबर का भागीदार होता है।
इस वैचारिक दृष्टिकोण से ‘एंडोरा’ एक सार्वभौमिक और सार्वकालिक नाटक है। आज भी झूठ और गढ़ी हुई धारणाओं के आधार पर एक इंसान या पूरे समुदाय की पहचान को नफ़रत में बदलने का सिलसिला जारी है। इतनी गंभीर थीम होने के बावजूद, यह मंच पर यह नाटक कई दृश्यों में कमज़ोर साबित हुआ। कई दृश्यों में कलाकार, अपने पात्र को गहराई से समझे बिना महज़ संवाद बोलते नज़र आये। आख़िर के दृश्यों में ध्वनि प्रभाव एक शोर बन गया। परेड के लिये ड्रम लगातार इतना बजाया गया कि मंच पर एंड्री के महत्वपूर्ण संवाद दर्शकों को सुनाई नहीं दे सके। एंड्री की भूमिका निभाने वाले दूसरे कलाकार ने अभिनय के अतिरेक में चरित्र की वास्तविक पीड़ा को खो दिया।
इसी तरह, चुप्पी बरतने वाले किरदारों की अदालत नुमा गवाही (कन्फेशन) को दर्शकों के बीच अभिनीत करने का प्रयोग भी बेअसर रहा। बीच में रखे कैमरे ने इस दृश्य में और बाधा उत्पन्न की। यदि यह दृश्य मंच पर ही होता, तो शायद इसका प्रभाव अधिक गहरा होता।
नाटक में भारत के सुरक्षित और सदभाव भरे वातावरण को दिखाने और दूसरे देशों की तुलना में देश की बेहतर स्थिति को दिखाने के लिये नाटक के शुरू और अंत में दो दृश्य भी जोड़े गये। हालांकि नाटक में इसकी ज़रूरत नहीं थी। मगर यह निर्देशक का अपना दृष्टिकोण और मत है। उन्होंने नाटक में इसे दिखाना और जोड़ना उचित समझा। नाटक में निर्देशक के साथ ही कलाकारों की मेहनत से भी इनकार नहीं किया जा सकता, लेकिन इस कठिन रंग प्रयोग में कलाकारों का तालमेल और तकनीकी समन्वयन मंच पर बिखर गया। दर्शक नाटक की गहराई और भावना से नहीं जुड़ सके।
इस नाट्य प्रस्तुति में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के रजिस्ट्रार श्री प्रदीप कुमार मोहंती, वरिष्ठ कला समीक्षक रवींद्र त्रिपाठी और प्रख्यात नाटककार राजेश कुमार बतौर विशिष्ट अतिथि शामिल हुए। सभी ने नवोदित कलाकारों को प्रोत्साहित किया। श्री मोहंती ने कुछ कलाकारों के अभिनय की सराहना की। उन्होंने कहा कि जिन कलाकारों ने इस नाटक में अच्छा अभिनय किया, लगता है वे बहुत देर से आये, उन्हें तो थिएटर से बहुत पहले ही जुड़ जाना चाहिए था। श्री रवींद्र त्रिपाठी ने निर्देशिका मुस्कान के साहसिक प्रयास की सराहना की। उन्होंने कहा, वे उनके काम को पहले से देखते रहे हैं।
वहीं राजेश कुमार ने नाटक के समकालीन संदर्भ पर गहरी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि नाटक में एक यहूदी (एंड्री) ज़ुल्म का शिकार होता है, लेकिन आज स्थिति विपरीत है; मासूमों पर बम बरसाने वाला इज़रायल आज दुनिया के लिए चिंता का विषय बन गया है। उन्होंने मुस्कान गोस्वामी की इस बात के लिये प्रशंसा की कि उन्होंने एक गंभीर और ज़रूरी नाटक उठाया। आजकल ऐसे विषय कम ही उठाये जाते हैं। उन्होंने नाटक के सैट डिज़ाइन की भी प्रशंसा की।
मैक्स फ्रिस्च (Max Frisch) ने 1961 में यह नाटक लिखा था, जिसका वर्ल्ड प्रीमियर ज्यूरिख में उसी साल हुआ था। भारत में भी अक्सर इसे सांप्रदायिकता और अल्पसंख्यक उत्पीड़न के स्थानीय संदर्भों में ढालकर मंचित किया गया है। नाटक की आलोचना इस बात पर होती रही है कि ‘एंड्री वास्तव में यहूदी नहीं था’, जिससे असली यहूदी-विरोध (Anti-Semitism) का मुद्दा कमज़ोर पड़ता है। इसके बावजूद, यह नाटक केवल यहूदियों के बारे में नहीं है, बल्कि ‘छवि गढ़ने’ और ‘दूसरे’ को दुश्मन साबित करने की मानवीय प्रवृत्ति पर प्रहार करता है। आज जब दुनिया के विभिन्न हिस्सों में शक्ति पाकर पीड़ित ही शोषक की भूमिका में नजर आते हैं, तब यह नाटक और अधिक प्रासंगिक हो जाता है।
नाटक के कलाकार और उनके पात्र: इस प्रस्तुति में शुभम चौधरी ने ‘सूत्रधार’ की भूमिका निभाई है। उन्होंने अभिनय के साथ अपनी संगीत प्रतिभा का भी परिचय दिया। जबकि यशवर्धन शर्मा ‘नकारात्मक विदूषक (शैतान)’ के रूप में नज़र आए हैं। पलक गुप्ता ने ‘बारबलीन’ का किरदार अदा किया है, और रजत शर्मा, प्रीतीश बसाक ने क्रमशः ‘एंड्री #1’ और ‘एंड्री #2’ का पात्र निभाया।
आदित्य सिंह सेंगर ‘फौजी पायदार’ के रूप में और शैलेश कुमार गुप्ता ‘पादरी’ की भूमिका में शामिल हुए। इनके साथ ही, आयुष सेठ ‘अध्यापक’, चीना मग्गो ‘माँ’, और कृष्ण कुशवाहा ‘सराय के मालिक’ के किरदार में प्रस्तुत हुए। अन्य भूमिकाओं में धर्मेन्द्र कुमार ने ‘बधाई (बढ़ई)’, दीपांशु भट्ट ने ‘डॉक्टर’, आयुष राज ने ‘कारीगर’ और ज़हरा अली ने ‘सेन्योरा’ का पात्र निभाया है। अनिकेत श्रीवास्तव ने ‘फौजी #2’ की भूमिका अदा की।
नेपथ्य के कलाकार और नाट्य सहयोगी: नाटक में संगीत का जिम्मा अंश पायन सिन्हा और शुभम चौधरी ने संभाला। निर्देशन सहयोगी दल में प्रीतीश बसाक, शुभम चौधरी और ज़ेहरा अली शामिल रहे। वर्चुअल क्रेडिट के अंतर्गत, वीडियो संपादन का काम कृष्ण कुशवाहा ने किया, पोस्टर संपादन पलक गुप्ता और यशवर्धन शर्मा द्वारा किया गया, तथा ब्रोशर संपादन की जिम्मेदारी पलक गुप्ता और ज़ेहरा अली ने निभाई है। सेट डिज़ाइन का काम पलक गुप्ता, आदित्य सिंह सेंगर, रजत शर्मा और दीपांशु भट्ट द्वारा किया गया। वेशभूषा – आयुष राज और आयुष सेठ ने की; प्रॉप्स का प्रबंधन धर्मेंद्र कुमार और शैलेश कुमार गुप्ता ने किया।
बता दें कि निर्देशक मुस्कान गोस्वामी पिछले दो दशकों से रंगमंच और समाज सेवा में एक बहुमुखी थिएटर डायरेक्टर, एक्टर और मेंटर के रूप में सक्रिय हैं। मुंबई स्थित ‘मुस्कान थिएटर लैब’ की संस्थापक के तौर पर उन्होंने भारत से लेकर नेपाल तक उत्कृष्ट नाटकों का सफल निर्देशन किया है। उन्होंने हाशिए पर पड़े समुदायों, पीड़ितों और भारतीय सशस्त्र बलों के साथ उल्लेखनीय कार्य किया है। उन्हें ‘भारतेंदु हरिश्चंद्र राष्ट्रीय पुरस्कार’ (2026) सहित अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाज़ा जा चुका है। इसके साथ ही, “विलुप्त विदूषक की आधुनिक रंगमंच में खोज” विषय पर शोध के लिए प्राप्त जूनियर रिसर्च फेलोशिप भी उन्हें मिली है। आगे पढ़िये – तीन महीने के बेसिक ड्रामा कोर्स की उपलब्धि ‘येरमा’ – https://indorestudio.com/yerma-play-review-nsd-basic-drama-course/
मंच पर क्लासिक ‘एंडोरा’ और इसकी मार्मिक जटिलता
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