Saturday, May 9, 2026
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अनोखी परम्परा : गेड़ी महोत्सव

नरसिंहपुर, द टेलीप्रिंटर। यह नज़ारा देख कर आप चोंक जायेंगे कि ज़मीन से 12 फ़ीट ऊपर एक बाँस पर हवा में खड़े लड़ाके जब एक दूसरे से भिड़ते है तो राजा – महाराजाओं का दौर याद आ जाता है। ऐसा ही नज़ारा नरसिंहपुर के सहावन में में हर साल होता है। जहां परम्परा को पुनर्जीवित करने के इरादे से गेड़ी महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है। कभी यह कला यहाँ के युद्ध कौशल की ख़ास पहचान मानी जाती रही है। वक़्त के साथ यह अब विलुप्त होती जा रही है।

हमारी अन्य प्राचीन संस्कृति और सभ्यताओं की तरह ही गेड़ी की परम्परा भी अब धीरे-धीरे लुप्त होती जा रही है। ऐसे समय में गेड़ी महोत्सव परंपरा को जीवित रखने की कोशिश साबित हो रही है। इन दिनों इस महोत्सव में प्राचीन काल के युद्ध कौशल की झलक देखने को मिल रही है।
नरसिंहपुर के सहावन गांव में चल रहे इस महोत्सव को हर साल कजलिया तीज के बाद समारोहपूर्वक हर साल मनाया जाता है। इसे देखने के लिए आसपास के ग्रामीण इलाकों से हजारों लोग जुटते है।

गेड़ी लोक कला की इस अनूठी और पारम्परिक प्रतियोगिता में शामिल होने वाले प्रतियोगी ऊँचे -ऊँचे बाँस से बने गेड़ी पर सवार होकर अपने प्रतिद्वंद्वी से युद्ध करते हैं। इसमें योद्धा 8 से 12 फीट की गेड़ी पर सवार होकर चलते हुए अपने प्रतिद्वंदी को आकर जोर की टक्कर मारता है। दोनों प्रतिद्वंदी में जो गिर जाता है, उसे हारा हुआ मान लिया जाता है।

खिलाड़ी मनोज और परशुराम ने बताया कि प्राचीनकाल में जंगली इलाकों और कीचड़भरे मैदानों में इसी कला से ही युद्ध किया जाता था। इसे छापामार या गोरिल्ला युद्ध पद्धति भी कहते है। प्राचीन काल में जंगली जानवरों से बचने और अपने शत्रु के निपटने के लिए यह सबसे कारगर युद्ध शैली थी।

ग्रामीण भोजल कहार बताते हैं कि गेड़ी बनाने के लिए बाँस की लकड़ी में पाया बनाया जाता है। गेड़ी से चलने वाला व्यक्ति जमीन से आठ से बारह फीट ऊपर हवा में रहता है। इस कारण जंगली जीवो के बचने, जंगली जानवरों से फसल को बचाने और पहाड़ी इलाको में शत्रुओ से संघर्ष करने में यह शैली बेहद उपयोगी साबित होती थी।

इस युद्ध शैली में छापामार तरीके से अपने दुश्मन और शिकार पर हमला करते है। अचानक ऊँचाई से होने वाले हमले में प्रतिद्वंदी को बचने का मौका भी नहीं मिलता।

आयोजन समिति के उमेश पाली ने बताया कि आज के दौर में आधुनिकता के चलते इस कौशल को लोग भूलने लगे है। ऐसे में नरसिंहपुर के सहावन में इस कौशल को देश और दुनिया के सामने लाने का प्रयास शुरू किया है। इसे अब बदलते हुए स्वरुप में खेल और मनोरंजन के साधन के रूप में फिर से जीवंत स्वरुप में लाने की बीड़ा उठाया है।

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