जय नागड़ा, इंदौर स्टूडियो। फलों से लदा पेड़ बिना किसी आंधी तूफ़ान के अचानक से जमींदोज़ हो जाये तो कैसा महसूस होगा ? 25 जून की रात जब अचानक शहर के प्रतिष्ठित कलाकार भाई आरिफ़ हमीद कुरैशी के आकस्मिक निधन की ख़बर आई तो वह स्तब्ध करने वाली थी। हृदयाघात से अचानक उनका निधन हो गया। जानकारी के अनुसार, दिल का दौरा पड़ते ही आरिफ़ भाई की सांस चली गई। अंतिम वक्त तक वे अपनी एक नई फ़िल्म की शूटिंग की तैयारी में व्यस्त थे। जुलाई के पहले हफ़्ते से शूटिंग शुरू होना था। सच तो यह है कि लम्बे संघर्ष के बाद बॉलीवुड में आरिफ़ भाई के पैर जमे थे। खंडवा में आरिफ़ भाई एक ऐसे पेड़ की तरह थे जिस पर उपलब्धियों की बहार आई हुई थी। कितने सीरियल, फिल्म्स, रियलिटी शो, वृत्तचित्र, वेब सीरीज़ पर उनका काम जल्द दर्शकों के सामने आने वाला था, मगर इसके पहले ही वे ख़ुद विदा हो लिए। रह गईं तो बस ज़मीन से जुड़े इस नेकदिल और बेहद प्रतिभाशाली कलाकार की यादें।
हरफ़नमौला थे आरिफ़ हमीद: फिल्म निर्देशक, स्टोरी – स्क्रिप्ट राइटर, एक्टर यानी हरफनमौला आरिफ हमीद वो शख़्सियत थी जो दादा मुनि, किशोर दा, आर एन मंडलोई की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए खंडवा को फिल्म जगत में अपना महत्वपूर्ण स्थान बनाए रखने में अपनी सक्रिय भूमिका निभा रहे थे।
हरफ़नमौला थे आरिफ़ हमीद: फिल्म निर्देशक, स्टोरी – स्क्रिप्ट राइटर, एक्टर यानी हरफनमौला आरिफ हमीद वो शख़्सियत थी जो दादा मुनि, किशोर दा, आर एन मंडलोई की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए खंडवा को फिल्म जगत में अपना महत्वपूर्ण स्थान बनाए रखने में अपनी सक्रिय भूमिका निभा रहे थे।
कला का 35 साल पुराना सफ़र: इस प्रतिभावान कलाकार की रंग यात्रा लगभग 35 वर्ष पूर्व शुरू हुई जब उन्होंने रंगमंच पर पहला नाटक ‘गज फुट इंच’ किया। उसके बाद यवनिका कला समूह के तत्वावधान में बहुत से नाटक उनके निर्देशन में हुए जैसे एक और द्रोणाचार्य, कफ़न, जिस लाहौर नहीं देख्या, अंधा युग, आषाढ़ का एक दिन, संस्मृतियां, महाभोज, सैंया भए कोतवाल आदि नाटक बहुत सराहे गए। बहुत सीमित संसाधनों में उन्होंने इन नाटकों को बहुत प्रभावी रूप से प्रस्तुत किया।
बॉलीवुड में अपनी पहचान बनाई: इसके बाद उन्होने बॉलीवुड की राह पकड़ी और फिर लंबे संघर्ष के बाद बॉलीवुड में एक संजीदा कलाकार, फिल्म निर्देशक के रूप में अपनी पहचान बनाई। मुंबई की चकाचौंध के बावजूद वे अपनी जड़ों से जुड़े रहे। खंडवा से उनका गहरा जुड़ाव ही था जो व्यावसायिक तौर पर स्पष्टतः जोख़िम होने के बावजूद उन्होंने निमाड़ की सांस्कृतिक पृष्टभूमि में एक फिल्म बनाने का न केवल निर्णय लिया बल्कि उसे सिनेमा के पर्दे तक भी पहुंचाया। फिल्म “मेरे देश में” निमाड़ के दो सौ से ज्यादा कलाकारों को अभिनय का अवसर मिला। महत्वपूर्ण बात यह थी कि इस फिल्म का लेखन, निर्देशन भी आरिफ़ ने किया। इस फिल्म ने निमाड़ के गणगौर की खूबसूरत झलक थी और इसका गीत – संगीत बहुत कर्णप्रिय था। कमर्शियल फिल्म होने के बावज़ूद उन्होंने इसे बाजार में बेचने के लिए इसमें कहीं फूहड़ता ,अश्लीलता या सस्तापन नहीं आने दिया। आइटम सॉन्ग के बजाय निमाड़ की सांस्कृतिक सुगन्ध से यह महक रही थी।
बहुत-सी डाक्यूमेंट्रीज़ का निर्माण किया: आरिफ़ भाई ने अनेक डॉक्यूमेंट्री भी बनाई जिसमें खण्डवा के स्वतंत्रता संग्राम की संग्रहणीय धरोहर भी है, लोकनायक ‘टंट्या भील’ पर भी उन्होंने डॉक्यूमेंट्री बनायीं। उन्होंने अपने प्रोडक्शन हाउस सांज़ी फिल्म्स के बैनर में मध्य प्रदेश दूरदर्शन और जनसंपर्क विभाग के लिए धरोहर और विभिन्न डॉक्युमेंट्री का भी निर्माण और निर्देशन किया। हिन्दी फिल्म जगत में निमाड़ का योगदान विषय पर केन्द्रित मेरे एक आलेख के संदर्भ में उनसे लम्बी चर्चा हुई थी तब लगा कि खण्डवा की मजबूत उपस्थिति उन्होंने न केवल दर्ज़ कर रखी है बल्कि खण्डवा की प्रतिभाओं को वहां तक ले जाने का मार्ग भी प्रशस्त करने में शिद्दत से लगे हुए थे। खण्डवा को बॉलीवुड से जोड़ने वाली मज़बूत कड़ी टूट गई जिससे बहुत सी स्थानीय प्रतिभाओं को अवसर मिलने की उम्मीदें अंकुरित हुई थी। उन्हें भावपूर्ण नमन। आगे पढ़िये –
बॉलीवुड में अपनी पहचान बनाई: इसके बाद उन्होने बॉलीवुड की राह पकड़ी और फिर लंबे संघर्ष के बाद बॉलीवुड में एक संजीदा कलाकार, फिल्म निर्देशक के रूप में अपनी पहचान बनाई। मुंबई की चकाचौंध के बावजूद वे अपनी जड़ों से जुड़े रहे। खंडवा से उनका गहरा जुड़ाव ही था जो व्यावसायिक तौर पर स्पष्टतः जोख़िम होने के बावजूद उन्होंने निमाड़ की सांस्कृतिक पृष्टभूमि में एक फिल्म बनाने का न केवल निर्णय लिया बल्कि उसे सिनेमा के पर्दे तक भी पहुंचाया। फिल्म “मेरे देश में” निमाड़ के दो सौ से ज्यादा कलाकारों को अभिनय का अवसर मिला। महत्वपूर्ण बात यह थी कि इस फिल्म का लेखन, निर्देशन भी आरिफ़ ने किया। इस फिल्म ने निमाड़ के गणगौर की खूबसूरत झलक थी और इसका गीत – संगीत बहुत कर्णप्रिय था। कमर्शियल फिल्म होने के बावज़ूद उन्होंने इसे बाजार में बेचने के लिए इसमें कहीं फूहड़ता ,अश्लीलता या सस्तापन नहीं आने दिया। आइटम सॉन्ग के बजाय निमाड़ की सांस्कृतिक सुगन्ध से यह महक रही थी।
बहुत-सी डाक्यूमेंट्रीज़ का निर्माण किया: आरिफ़ भाई ने अनेक डॉक्यूमेंट्री भी बनाई जिसमें खण्डवा के स्वतंत्रता संग्राम की संग्रहणीय धरोहर भी है, लोकनायक ‘टंट्या भील’ पर भी उन्होंने डॉक्यूमेंट्री बनायीं। उन्होंने अपने प्रोडक्शन हाउस सांज़ी फिल्म्स के बैनर में मध्य प्रदेश दूरदर्शन और जनसंपर्क विभाग के लिए धरोहर और विभिन्न डॉक्युमेंट्री का भी निर्माण और निर्देशन किया। हिन्दी फिल्म जगत में निमाड़ का योगदान विषय पर केन्द्रित मेरे एक आलेख के संदर्भ में उनसे लम्बी चर्चा हुई थी तब लगा कि खण्डवा की मजबूत उपस्थिति उन्होंने न केवल दर्ज़ कर रखी है बल्कि खण्डवा की प्रतिभाओं को वहां तक ले जाने का मार्ग भी प्रशस्त करने में शिद्दत से लगे हुए थे। खण्डवा को बॉलीवुड से जोड़ने वाली मज़बूत कड़ी टूट गई जिससे बहुत सी स्थानीय प्रतिभाओं को अवसर मिलने की उम्मीदें अंकुरित हुई थी। उन्हें भावपूर्ण नमन। आगे पढ़िये –

