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“और, आप जानती हैं, यह बात दिल्ली में बहुत दुर्लभ है।‘त्रिवेणी कला संगम’ जैसा कोई दूसरा संस्थान नहीं है। ‘त्रिवेणी’ ने अपनी अहम भूमिका निभाई है। यदि आप पिछले 75 वर्षों को लेकर, भारत के ‘कला संस्थानों’ का कोई इतिहास लिखते हैं, तो ‘त्रिवेणी’ उन संस्थानों में से एक होगा जिसका उल्लेख बहुत कृतज्ञता के साथ करना होगा।”
कवि, आलोचक और साहित्यकार श्री अशोक वाजपेयी ने यह विचार दिल्ली के बहु-कला संस्थान ‘त्रिवेणी कला संगम’ के बारे में व्यक्त किये। हाल ही में ‘त्रिवेणी’ ने अपनी स्थापना के 75 साल पूरे किये हैं। इस अवसर पर कुछ विशिष्ट कला हस्तियों से संवाद की एक श्रृंखला आयोजित की गई थी। श्री वाजपेयी ने उनसे हुई बातचीत में, इस आर्ट सेंटर के सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व पर प्रकाश डाला। साथ ही ‘त्रिवेणी’ की संस्थापक स्वर्गीय सुंदरी के श्रीधरानी के साथ अपने अनुभवों को याद किया।
श्री वाजपेयी ने बातचीत में, इस बात का भी ज़िक्र किया कि कैसे उन्हें इस परिसर से भोपाल के ‘भारत भवन’ के निर्माण की प्रेरणा मिली और बहुत से दिग्गज कलाकारों से उनकी यहीं पर मुलाक़ात हुई। उनसे यह दिलचस्प बातचीत जानी-पहचानी लेखिका और पत्रकार मंदिरा नायर ने की। बातचीत की विशेष रूप से वीडियो रिकॉर्डिंग की गई। हम उसी बातचीत के कुछ संपादित हिस्सों को छोड़कर, बाक़ी बातचीत तकरीबन उसी रूप में यहां प्रकाशित कर रहे हैं। पढ़िये इस बातचीत का पहला भाग। इसमें दौरान मौजूद थे, दिल्ली की कुछ कला हस्तियों के साथ ही ‘त्रिवेणी कला संगम’ के मानद सचिव श्री अमर के. श्रीधरानी। प्रस्तुति: शकील अख़्तर, इंदौर स्टूडियो।
अशोक वाजपेयी: “आप जानती हैं, उस समय जब ‘त्रिवेणी’ की शुरुआत हुई, तब इस राष्ट्रीय राजधानी में बहुत कम सांस्कृतिक संस्थान थे। आपके पास ‘सप्रू हाउस’ था, जो वैसे तो अंतरराष्ट्रीय अध्ययन आदि का केंद्र था। इसमें एक ऑडिटोरियम था जिसका उपयोग अक्सर शास्त्रीय संगीत और नृत्य के लिए किया जाता था। (इसके अलावा) फिर आपके पास AIFACS (आईफैक्स) था। AIFACS में एक ऑडिटोरियम और आर्ट गैलरी थीं। लेकिन कुछ विवाद हुआ, कलाकारों को अपनी बात कहने की अनुमति नहीं दी जा रही थी। इसलिए वे सभी वहाँ से बाहर निकल आए और ‘दिल्ली शिल्पी चक्र’ की स्थापना की। ठीक है और जो एक बहुत महत्वपूर्ण संस्थान भी बन गया।”
“लेकिन त्रिवेणी के बारे में जो बात सबसे अनूठी थी, वह यह थी कि यह देश का पहला प्रमुख ‘मल्टी-आर्ट्स सेंटर’ था। इस तरह का कोई दूसरा मल्टी-आर्ट्स सेंटर नहीं था। अकादमियां (कला अकादमियां) बाद में आईं। अकादमियां उस तरह का बहु-कला समुदाय (मल्टी-आर्ट्स कम्युनिटी) नहीं बन पाईं जो वे बन सकती थीं, लेकिन वे नहीं बनीं।”
“तो यह (त्रिवेणी) एक अनूठा मामला था। इसमें दृश्य कला (विजुअल आर्ट्स) के लिए सुविधाएं थीं। इसमें प्रदर्शनकारी कला (परफॉर्मिंग आर्ट्स) के लिए सुविधाएं थीं। इसका इस्तेमाल थिएटर के लिए भी किया जा सकता था बल्कि साहित्य के लिए भी। और इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि यह पहला संस्थान था जहाँ, इन सबके अलावा, एक मज़बूत शैक्षिक पहलू (एजुकेशनल कंपोनेंट) भी था।”
“और चूँकि सुंदरी जी ने उदय शंकर जी के साथ पढ़ाई की थी, उन्हें उस तरह के प्रशिक्षण का अनुभव था, उन्होंने कोई आधुनिक स्कूल या आधुनिक कॉलेज नहीं बनाया। उन्होंने इस संस्थान में ‘गुरु-शिष्य परंपरा’ के तत्वों को आत्मसात किया और उन्हें शामिल किया। तो यहाँ आपके पास दृश्य कला, संगीत और नृत्य, और अब रंगमंच में प्रशिक्षण के लिए सुविधाएं हैं…” “और, आप जानती हैं, यह बात दिल्ली में बहुत दुर्लभ है। ‘त्रिवेणी’ जैसा कोई दूसरा संस्थान नहीं है। इसलिए त्रिवेणी ने अपनी अहम भूमिका निभाई है। यदि आप पिछले 75 वर्षों में कला संस्थानों को लेकर भारत का इतिहास लिखते हैं, तो ‘त्रिवेणी’ उन संस्थानों में से एक होगा जिसका उल्लेख बहुत कृतज्ञता के साथ करना होगा।”
“और गर्व होता है कि यहाँ इस तरह का एक संस्थान है। ध्यान रहे, जिन संस्थानों ने इस देश में संस्कृति के क्षेत्र में सबसे अधिक योगदान दिया है, वे सभी स्वयं कलाकारों द्वारा शुरू किए गए हैं। तो स्व. सुंदरी के. श्रीधरानी जी एक नर्तकी थीं, जिन्होंने इसकी उस दौर में शुरुआत की। एक समय में ‘दिल्ली शिल्पी चक्र’ भी कलाकारों द्वारा शुरू किया गया था। ‘कला क्षेत्र’ की शुरुआत भी एक अन्य कलाकार ने की थी, और भी। यही वे संस्थान हैं जो सही अर्थों में मायने रखते हैं।”
“जो संस्थान सरकार द्वारा शुरू किए गए थे…… उनमें से कई को शुरू करने का एक संदिग्ध गौरव (Dubious distinction) रहा है… वे सभी अब ठीक नहीं हैं, Gone to seed हो गए हैं। और उन सभी पर ऐसे औसत दर्जे के नौकरशाहों (Civil servants) का कब्ज़ा हो गया है जो बस वहाँ समय काटना चाहते हैं। आज कोई भी ‘ललित कला अकादमी’ के बारे में बात नहीं करता, हालाँकि दृश्य कला (विजुअल आर्ट्स) का इतना जीवंत परिदृश्य मौजूद है। हाँ, और (दूसरी तरफ) आपके पास ‘त्रिवेणी’ है। कुछ अन्य गैलरियां अधिक आकर्षक हो सकती हैं, लेकिन। लेकिन दिल्ली में किसी भी आर्ट शो में सबसे ज्यादा भीड़ ‘त्रिवेणी’ में ही होती है।”
मंदिरा नायर: “हाँ।”
अशोक वाजपेयी: “और मुझे यह पता है।”
मंदिरा नायर: “मुझे पता है कि आपने…”
अशोक वाजपेयी: “क्योंकि मैं इन सुविधाओं का बहुत बड़े पैमाने पर उपयोग करता रहा हूँ।”
मंदिरा नायर: “हाँ।”
अशोक वाजपेयी: “एक समय था जब हमने रज़ा साहब की जन्म शती (100 वर्ष) मनानी शुरू की थी, तो हमने भारत के 100 युवा कलाकारों की एक प्रदर्शनी आयोजित करके इसका जश्न मनाया था। अब 100 युवा कलाकारों का मतलब था, लगभग 300 कलाकृतियाँ, ठीक है? तो उन सभी को सिर्फ यहाँ नहीं दिखाया जा सकता था। इसलिए हमने उन्हें ‘बीकानेर हाउस’ में दिखाया, हमने उन्हें यहाँ ‘त्रिवेणी’ में दिखाया, फिर ‘दिल्ली आर्ट गैलरी’, ‘अलायंस फ्रांसे’ और ‘इंडिया इंटरनेशनल सेंटर’ में।”
मंदिरा नायर: “हाँ।”
अशोक वाजपेयी: “पांच गैलरियां, पांच प्रदर्शनियां एक ही दिन अलग-अलग समय पर शुरू हो रही थीं। ‘बीकानेर हाउस’ जाइए, पहले दिन आपके पास वहां भारी भीड़ होती है। दूसरे दिन, शायद पांच लोग। किसी भी अन्य गैलरी की भी यही कहानी है। यहाँ (त्रिवेणी में)… यह कुछ हद तक बॉम्बे की ‘जहाँगीर आर्ट गैलरी’ जैसा है, जहाँ यह आपके रास्ते में पड़ता है। आप शायद किसी और काम से आ रहे हों, आप शायद रेस्टोरेंट जाने के लिए आ रहे हों या मुझे नहीं पता किसलिए, और फिर आप देखते हैं कि यहाँ एक प्रदर्शनी लगी है, तो सोचते हैं, अंदर क्यों न जाया जाए?”
“यह इकलौती ऐसी गैलरी है जो आम नागरिकों और युवाओं को—शायद युवा प्रेमियों को भी—लुभाती है, जो यहाँ आते हैं, थोड़ी बहुत कला देखने के लिए… यह इसकी एक बहुत बड़ी खूबी है। इसका आर्किटेक्चर, इसकी लोकेशन और यहाँ का माहौल, तीनों ही।” आगे इस बातचीत का अगला भाग – ‘त्रिवेणी’ में आये कला के सभी दिगग्ज https://indorestudio.com/ashok-vajpeyi-interview-triveni-kala-sangam-2/

