Sunday, October 18, 2026
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बहुत अलग है मेरी कल्पना की ‘रामलीला’– अतुल यदुवंशी

शकील अख़्तर, इंदौर स्टूडियो। ‘मैं रामलीला की एक ऐसी प्रस्तुति तैयार करना चाहता हूँ जो सिर्फ दो घंटे की हो और जिसमें रामलीला का जीवंत अनुभव हो और रामायण का मर्म भी। मैं जिस रामलीला के निर्माण की कल्पना कर रहा हूँ, वह ऐसी ही है। एक ऐसी रामलीला जिसे देश-विदेश के मंचों पर प्रभावशाली तरीके से प्रस्तुत किया जा सके। लोग उस अभिनव रामलीला को हमेशा याद रख सकें।’ यह बात नौटंकी कला के विद्वान और विशेषज्ञ अतुल यदुवंशी ने कही। श्री यदुवंशी इन दिनों प्रयागराज में पारंपरिक रामलीला की तैयारियों में जुटे हैं। दो हफ्ते चलने वाली इस रामलीला की विशेष रिपोर्ट हम जल्द ही प्रस्तुत करेंगे। फिलहाल जानते हैं कि वे किस तरह के रामलीला की परिकल्पना कर रहे हैं।Shakeel Akhter with atul yaduvanshi अतुल जी ने कहा—‘ असल में मैं रामलीला की ‘नट शेल’ या सार प्रस्तुति तैयार करना चाहता हूँ। वास्तव में यह चुनौती से भरा काम है कि ‘कैसे पूरी लीला को सिर्फ 2 घंटे में दिखाया जा सके’। मैं इसे अपने मूल काम ‘नौटंकी’ के साथ ही करना चाहता हूँ। हाँ, इतना ज़रूर है कि स्टेज प्रॉडक्शन के लिये उपलब्ध आज की आधुनिक तकनीक का इसमें उपयोग होगा। उसका सहयोग लेते हुए मैं पौराणिक स्वरूप को उसी दिव्यता और भव्यता के साथ साकार करना चाहता हूँ। इस परिकल्पना पर मेरा काम जारी है। जहाँ तक रामलीला की पारंपरिक प्रस्तुति की बात है तो वह काम मैं पहले से करता आया हूं। इस बार फिर प्रयागराज में परंपरागत रामलीला के आयोजन में व्यस्त हूँ। इसकी नए सिरे से रिकॉर्डिंग की गई है, ऑडिशन लिये गए हैं। सैट के काम के साथ, रिहर्सल का जारी है। यह रामलीला करीब दो हफ़्तों तक चलेगी।’A scene from the Ramlila directed by Atul Yaduvanshi. A presentation by Swarg Rangmandal, Prayagraj.अतुल यदुवंशी नौटंकी की प्रस्तुतियों के लिये अपनी ख़ास पहचान रखते हैं। हाल ही में उन्हें एक ऑनलाइन नौटंकी वर्कशॉप के विशेषज्ञ अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया था। यह ऑनलाइन वर्कशॉप अप्रवासी भारतीयों की संस्था ‘हिन्दी संगम’ (पोर्टलैंड, ऑरेगन, अमेरिका) ने इंदौर स्टूडियो के सहयोग से आयोजित की थी। इस वर्कशॉप के दौरान मुझे अतुल जी से बातचीत और मुलाक़ात का अवसर मिलता रहा। वे नौटंकी कला की एक जीवंत प्रयोगशाला की तरह हैं जो इस कला के संरक्षण और विस्तार के लिये निरंतर काम कर रहे हैं। हमने उनकी इस मूल विधा के बारे में भी बहुत से पूछे।Thumbnail of the online Nautanki workshop broadcast on YouTube.हमने पूछा कि आप नौटंकी की तरफ़ कब और कैसे आकर्षित हुए? अतुल जी ने बताया—‘मेरे गुरु शांति स्वरूप प्रधान जी, इलाहाबाद के सेंट जोसेफ स्कूल में हमारे हिन्दी के टीचर थे। उन्होंने ही मेरे भीतर छिपी कला प्रतिभा को पहचाना था। मैं एक साइक्लिस्ट हुआ करता था। एक खिलाड़ी के रूप में मैं भारत की टीम में भी रहा। मगर एक मोड़ ऐसा आया जब मैं दुविधा में था कि मैं आगे क्या करूँ, किस दिशा में जाऊँ?’behrupia तब गुरु जी ने कहा—‘रामलीला करो।’ हालांकि तब मैं सोचने लगा कि क्या एक अकेली रामलीला ही करता रहूँगा! शांति स्वरूप जी ने मेरी इस बात को समझ लिया और फिर उन्होंने ‘नौटंकी’ के लिये काम करने को कहा। वहीं से मेरी दिशा बदल गई। खिलाड़ी पीछे रह गया, अंदर का कलाकार बाहर आ गया। गुरु जी ने कहा था—‘नौटंकी को तुम्हारी और तुम्हारी नौटंकी को ज़रूरत है।’ यहीं से मैंने अपने खेल जीवन को छोड़कर रंगमंच की दुनिया में कदम रखा।Atul Yaduvanshi अतुल यदुवंशी ‘स्वर्ग रंगमंडल’ के माध्यम से ‘नौटंकी’ के लिये बीते तीन दशकों से लगातार काम कर रहे हैं। वे उन विरले कलाकारों में से एक हैं जो इस कला के जानकार ही नहीं बल्कि एक शोध कर्ता भी हैं। उन्होंने नौटंकी को पुनर्जीवित करने के लिये कई तरह के प्रयोग किए हैं। उन्होंने कहा—‘जब समाज में छपाई, अखबार, रेडियो या टेलीविजन नहीं थे, तब लोक कला और इसके कलाकार ही संचार का सबसे बड़ा माध्यम थे। राजा का संदेश जनता तक और जनता की पीड़ा राजा तक पहुँचाने का काम नौटंकी के कलाकारों ने किया।’Laila Majnooइस लोक नाट्य परंपरा के बारे में उन्होंने बताया—‘आज़ादी की लड़ाई का वक्त रहा हो या पानी और पेड़ों को बचाने की बात हो, या फिर खेतों में काम करते वक्त किसानों का जोश बढ़ाना हो, लोक कलाओं ने हमेशा समाज के लिये अपना काम किया। इस तरह से देखा जाए तो नौटंकी या लोक कला सिर्फ़ मनोरंजन का साधन नहीं रही, बल्कि इनकी आम लोगों के हित में बड़ी भूमिका रही है।’ उन्होंने एक महत्वपूर्ण बात पर ध्यान खींचा—‘आप देखिए, शास्त्रीय कलाओं को तो राजाओं का संरक्षण मिला, जबकि लोक कलाओं को हमेशा आम लोगों और समाज ने प्रोत्साहित किया, आगे बढ़ाया।’ A Nautanki based on the story 'Budhi Kaki' by Premchand.नौटंकी के बारे में पूछे गए एक और सवाल पर उन्होंने कहा—‘एक समय ऐसा आया जब नौटंकी में फूहड़पन और अश्लीलता का बोलबाला हो गया था। इसकी वजह थी इसमें नई और अच्छी कहानियों का अभाव। सालों से चली आ रही पुरानी कहानियाँ दर्शकों को रट चुकी थीं। वे अगले दृश्य को पहले ही दोहराने लगते थे, बहुत बार नौटंकी प्रस्तुत करने वालों को मंच से ही चले जाने को कहते थे। इस स्थिति को बदलने के लिए मैंने अनेक प्रयोग शुरू किए’। अतुल जी ने कहा – ‘ मैं नौटंकी में कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद को लेकर आया। उनकी कालजयी कहानियों जैसे ‘कफ़न’, ‘बूढ़ी काकी’, ‘ईदगाह’ और ‘पंच परमेश्वर’ को नौटंकी की विधा में ढालने का काम करता रहा। नौटंकी में मौजूद फूहड़ता को ख़त्म करने के बारे में सोचता और काम करता रहा।’Abhigyan Shakuntalam श्री यदुवंशी ने कहा—‘हमने ‘बूढ़ी काकी’ की दयनीय अवस्था और ‘कफ़न’ में घीसू-माधव की भूख और संवेदनहीनता को लोक गीतों और अभिनय के माध्यम से इस तरह पिरोया कि दर्शक देखते रह गए। इतना ही नहीं, कालिदास के ‘मालविकाग्निमित्रम्’ और ‘अभिज्ञान शाकुंतलम्’ जैसे महान संस्कृत नाटकों को भी हमने नौटंकी के रूप में बड़ी सफलता से प्रस्तुत किया और इस तरह नौटंकी के नए रूप को राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित किया।’ Another presentation by the Swarg Mandal Rangmandal.अतुल जी ने नौटंकी को उस समय से संभाला, जब लगता था कि यह आगे नहीं बढ़ पाएगी। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के पहले ‘भारंगम’ में ही वह अपनी प्रस्तुति ‘बंटवारे की आग’ को लेकर पहुँचे। एक दौर ये भी था कि नौटंकी में मेरे नए विचारों और बदलावों को लेकर विरोध भी होता था। मगर बाद में विरोध करने वाले भी महसूस करने लगे कि मैं नौटंकी को बचाने के लिये ज़रूरी प्रयोग कर रहा हूँ।Another presentation by the Swarg Mandal Rangmandal.उन्होंने बताया, ‘पाकिस्तान में भी हमने यह नौटंकी प्रस्तुत की थी। मुझे याद है उस वक्त वहाँ के लोग बेहद भावुक हो गए थे। नाटक में दो भाइयों (रामू-श्यामू) के घर के बंटवारे की कहानी थी। जब नाटक के अंत में भारत-पाकिस्तान विभाजन की ओर इशारा करते हुए एक सूफी गाना—”बहन यहाँ है तो भाई वहाँ है, किस्मत पे ताले…” गाया गया, उस वक्त लाहौर के विशाल स्टेडियम में मौजूद हज़ारों दर्शक खड़े होकर देर तक तालियाँ बजाते रहे।’Presentation of the musical drama ‘Lal Rahasya’ by Swarg Rangmandal at the North Central Zone Cultural Centre auditorium.अतुल यदुवंशी कला को किसी जाति या वर्ग तक सीमित रखने के सख्त खिलाफ हैं। उन्होंने कहा—‘कला के क्षेत्र में भी पुरानी दकियानूसी और रूढ़ व्यवहार हमें देखने को मिलता है। समाज की इस सोच के पीछे दासता बनाकर रखने की संकुचित मानसिकता रही है। मैं तो साफ़ कहता हूँ… “डॉक्टर का बेटा नगाड़ा क्यों नहीं बजा सकता?” हमने अपनी कला के माध्यम से ऊँच-नीच की इन बेड़ियों को तोड़ा है।’ A scene from the Nautanki *Laila Majnu*, presented by Swarg Rangmandal.नौटंकी के निरंतर विकास और इस कला को जीवंत बनाए रखने के साथ अतुल यदुवंशी ने एक और बड़ा काम किया है। उन्होंने ‘स्वर्ग‘ (Society for Welfare and Advancement of Rural Generations) नामक संस्था बनाई है। इसके बारे में पूछने पर श्री यदुवंशी ने कहा—‘हमने लोक कलाकारों की बदहाली और उनके वृद्ध होने पर सम्मानजनक तरीके से जीवन गुज़ारने के लिये यह संस्था बनाई है। इसमें जुड़ने की कोई फ़ीस नहीं है। आप यह जानकर हैरान रह जाएंगे कि मेरी इस संस्था से 18 राज्यों के सैकड़ों कलाकार जुड़े हैं। हम उनकी पेंशन बहाली के लिये इस संगठन के माध्यम से काम कर रहे हैं।’Atul Yaduvanshi, Director of Swarg Rangmandalयह पूछने पर कि नए कलाकारों को वे क्या संदेश देना चाहेंगे? अतुल यदुवंशी कहते हैं—‘मैं इतना ही कहना चाहता हूँ कि कामयाबी रातों-रात नहीं मिलती, इसके लिये हमें लगातार काम करना पड़ता है। सस्ती लोकप्रियता से बचना भी ज़रूरी है। कला एक साधना है, एक तपस्वी के रूप में हमें अपना काम करते जाना है, ताकि हम अपनी कला और संस्कृति की जड़ों को हरा-भरा रख सकें।’ आगे पढ़िये – क्यों ख़ास है भारत की ऑफिशियल ऑस्कर एंट्री फिल्म ‘गोंधल’ https://indorestudio.com/gondhal-oscars-2027-official-entry/

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