‘मेरे अंदर हमेशा यही ख़याल रहता है कि …और रियाज़ करना है। गाने को और बेहतर बनाना है। ख़ुद की कमियों को परखना है। गाने में जो कमियां लगती हैं, उनमें सुधार करना है। बच्चे आते हैं, उन्हें और अच्छा सिखाना है। पुरस्कार की घोषणा के अगले दिन से मेरे अंदर यही सब ख़याल रहा, हमेशा की तरह’। शास्त्रीय गायक पंडित गौतम काले ने उनसे हुई विशेष बातचीत में यह बात कही। उन्हें संगीत नाटक अकादमी,दिल्ली के प्रतिष्ठित उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ान युवा पुरस्कार की घोषणा की गई है। उनसे पुरस्कार पर प्रतिक्रिया पूछी गई थी। इस विशेष बातचीत में उनसे ऐसे बहुत से ज़रूरी सवाल पूछे गये। जवाब में गौतम जी ने जो कुछ कहा, यहाँ पढ़िये उनके वही जवाब, उन्हीं के शब्दों में – शकील अख़्तर, इंदौर स्टूडियो।
मान्यता मिलने की ख़ुशी, मगर मूल भाव अपनी साधना: मन को अच्छा तो लगता है, ख़ुशी होती है, जब आपको संगीत नाटक अकादमी जैसी प्रतिष्ठित संस्था से मान्यता मिलती है। शहनाई के उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ान साहब के नाम से स्थापित युवा पुरस्कार मिलता है जिनका आप बचपन से नाम सुनते आये हैं। परंतु जैसा कि मैंने कहा, इस उपलब्धि के अगले दिन से से ही मैं अपने मूल काम और भाव में लौट गया। फिर वही सब किसी निरंतर शुरू हो गया। सच यही है कि पुरस्कार से हमें प्रेरणा और काम करने की ताक़त मिलती है। मैं इसे इसी रूप में लेता हूँ।
संगीत को बढ़ाने में समाज का महत्वपूर्ण योगदान: हम लोग तानसेन को जानते हैं, उसके पीछे सबसे बड़ा कारण सम्राट अकबर है। अकबर की नज़र उनपर पड़ गई। उन्होंने रीवा नरेश से उन्हें अपने पास बुलवा लिया। इस दृष्टि से सोचे तो समाज का एक बड़ा रोल है। आज राज्याश्रय का दौर तो है नहीं। समाज का जो बुद्धिजीवी वर्ग है। उन सबका इस काम में अहम रोल है।
शास्त्रीय संगीत को ख़राब कहना बंद करें: मेरा यह भी कहना है कि हम शास्त्रीय संगीत को असमायिक या ख़राब ना बोलें। हो सकता है कि आपको यह संगीत पसंद ना हो। दुनिया में सबको सब पसंद आये, ज़रूरी नहीं। परंतु इसे ख़राब कहना या एक अलग दृष्टि से देखना बंद कर देना चाहिये। यह काम समाज को ही करना है। जब शास्त्रीय संगीत बड़े ख़राब नहीं कहेंगे तो नई जनरेशन भी ऐसा नहीं सोचेगी। अच्छी बात है कि आज इस बारे में लोगों में जागरुकता आ गई है। परंतु कुछ लोग आज भी इसे संकुचित दृष्टि से देखते हैं, इसे समयानुकूल नहीं मानते।
मध्यप्रदेश में संगीत को लेकर अच्छा काम: मध्य प्रदेश में संगीत की दृष्टि से अच्छा काम हो रहा है। हमारा राज्य ऐसा है जहाँ सबसे ज़्यादा संगीत के कार्यक्रम होते हैं। हमारे यहाँ साल भर कार्यक्रम,आयोजन और उत्सव होते हैं। उनमें अच्छे कलाकार सुशोभित होते हैं। शासन की तरफ से भी काफी कुछ अच्छा है। भोपाल में गुंदेचा ब्रदर्श का ध्रुपद गुरूकुल चलता है,वह शासन द्वारा पोषित है, वह भी काफी अच्छा चलता है। वहाँ से भी बहुत सारे छात्र निकलते हैं। हाँ, अगर कुछ गुरूकुल और विकसित हो जायें, तब यह और भी अच्छी बात होगी।
संगीत सीखने वाले छात्रों की शासन करे मदद: इंदौर में मेरे पास कटनी,सतना,छतरपुर जैसे नगरों से बहुत फोन आते हैं। वह कहते हैं,सर हमें सीखना है। मेरे हाथ बँधे होते हैं, मैं कैसे उनको अपने पास बुलाऊँ? इंदौर अब बड़ा शहर हो चुका है। यहाँ पर आने वाले छात्रों को काफी खर्च करना पड़ता है। ऐसे स्टूडेंट्स जो कला या संगीत के क्षेत्र में कुछ हासिल करने के लिये यहां आना चाहते हैं या किसी और शहर जाना चाहते हैं। उनके लिये आवास,भोजन आदि की शासन को मदद करना चाहिये। ताकि वे कम खर्च में अपनी तालीम का प्रबंधन कर सकें। तब हम भी और छात्रों को सिखा, बढ़ा सकते हैं।
शास्त्रीय संगीत में बंधन नहीं, प्रयोग की पूरी संभावना: शास्त्रीय संगीत के आकर्षण से बँधे होने का मेरा एक बड़ा कारण इसमें किसी तरह के बंधन का ना होना है। सिर्फ तीन या चार अनुशासन हमें फॉलो करने होते हैं। इनमें से एक राग, दूसरा उसका स्वरूप, तीसरा ताल, चौथा बंदिश पर टिके रहना। इन अनुशासनों के अलावा कोई बंधन नहीं है। शेष आपकी क्षमता का विस्तार है। इसीलिये आप पायेंगे कि हर कलाकार की अपनी छाप अपनी संगीत कला में दिखाई देती है। चाहे राग कोई भी हो, वो यमन हो या दरबारी। कहने का मतलब ये है कि इसमें प्रयोग करने के बहुत अवसर हैं।
शास्त्रीय संगीत के अंदर पूरी आज़ादी: अगर मैं लताजी के गीत में छेड़छाड़ करूँगा तो लोग कहेंगे, अरे वह गीत तो ऐसा नहीं है। आप ऐसे कैसे गा रहे हैं? परंतु शास्त्रीय संगीत में खुद उस संगीत में ही इतनी आज़ादी है कि आप उसमें जितना करते चले जाये कम है बल्कि करते-करते आपकी उम्र भी कम पड़ जायेगी। लोग कहते हैं भी है कि यह तो जनम-जन्मातंर तक चलने वाला संगीत है। पहले मैं भी यह नहीं समझ पाता था। परंतु आज लगता है कि यह कितनी गहरी कला है।
सिखाने की प्रक्रिया दिलचस्प होना चाहिये: शास्त्रीय संगीत के मूल में राग है। परंतु इसकी तालीम के लिये हमें अपने सिखाने की कला को और दिलचस्प बनाने की ज़रूरत है। मान लीजिये किसी छात्र को किसी फिल्म का कोई गीत बहुत पसंद है। तब उन्हें उस गीत के मूल तत्वों और संबंधित रागों के बारे में बताया जाये। तब वे भी रुचि से पूछ बैठते हैं, अच्छा सर ये इस राग पर है ! …तब उनका आर्कषण हमारे संगीत की तरफ़ ज़्यादा बढ़ जाता है बनिज़्बत इसके कि मैं उन्हें कहूँ..चलो आँख बंद करो… ‘स’ लगाओ…और तुम्हारा ये सुर नहीं लग रहा…। मतलब पहले की तुलना में हमें आज के ज़माने के हिसाब से सिखाने की प्रोसेस को बदलना पड़ेगा।
शास्त्रीय संगीत सुनने के अवसर हो रहे कम: हमारी नई पीढ़ी के सामने एक समस्या और भी है। उन्हें शास्त्रीय संगीत सुनने नहीं मिल रहा। आज रेडियो ट्यून करते ही हमें वही सुनने को मिलता है, जो आज के माहौल पर छाया हुआ है। मुझे तो विविध भारती पर भी इसकी कमी महसूस होती है। वे रात में अगर शास्त्रीय संगीत लगा भी देते हैं तो उसे भी वक्त पूरा होते ही काट देते हैं। यह भी नहीं देखते कि राग पूरा हुआ है या नहीं। मतलब एक वह माध्यम था, अब लगता है वह भी ख़त्म हो गया है, एक तरह से। यानी बच्चों के लिये हमारे संगीत को सुनते रहने के विकल्प नहीं के बराबर हैं। अब हम भले ही बड़ी-बड़ी बातें करते रहे कि ‘साब हमारा संगीत बहुत अच्छा है’।
शास्त्रीय संगीत के कार्यक्रमों में हो कुछ अलग: हमने कुछ समय पहले एक कार्यक्रम किया था जिसमें 75 कलाकार स्टेज पर थे, उसका दिलचस्प पार्ट एंकरिंग का था, इसमें एक ग्रैंड डॉटर (पोती) अपने दादा जी से बात करती है। वह सवाल पूछती है। इन सवालों के बीच हमने कुछ स्टोरीज़ शामिल की थीं। इस तरह वह एक दिलचस्प कार्यक्रम बन गया था। कहने का मतलब यह भी है कि हमें हमारे आयोजनों और कार्यक्रमों को भी नये दिलचस्प अंदाज़ में नई पीढ़ी के बीच लाने की ज़रूरत है। ताकि वे हमारे मूल संगीत को जाने और उसके लिये उनके अंदर अभिरूचि जागे।
हमारी संस्कृति की संवाहक हमारे कलाकार: एक ज़माने में पंडित रविशंकर जी, बिस्मिल्ला खाँ जैसे लोग विश्व पटल पर भारत की पहचान के सांस्कृतिक दूत हुआ करते थे। उनकी वजह से हमारी भारतीय संस्कृति की पहचान होती थी। हमारे तहज़ीब में अंर्तनिहित समभाव और आपसी एकता के ताने-बाने का पता चलता था। आज भी ऐसे बहुत से कलाकार हमारी संस्कृति की अपने-अपने स्तर पर पताका देश और दुनिया में फहरा रहे हैं। मिसाल के लिये मेरे दिमाग़ में पहला नाम पंडित विश्वमोहन भट्ट का आता है, उन्हें पूरी दुनिया बहुत प्यार से सुनती है। दूसरा नाम राशिद खाँ साहब का है। उनके लाजवाब गायन को सभी बड़ी लगन से सुनते हैं। शाहिद परवेज़ जी के सितार की सारी दुनिया प्रशंसक है। ध्रुपद गायक उदय भवालकर जी भी हैं जिन्हें पूरी दुनिया प्रेम करती है। आज के दिग्गज संगीत कलाकार हैं जो राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय संस्कृति को आगे बढ़ा रहे हैं।
संगीत में ‘ॐ’ भी, अल्लाह भी: हमारे संगीत और कला विधाओं ने हम सभी को हमारी मिट्टी के साथ बाँधकर रखा है। यहाँ कोई तेरे-मेरे,इसके-उसके का बैर भाव नहीं है। जैसे कि मुझे मेरे गुरू पंडित जसराज जी की याद आती है। उन्होंने हमें सबसे पहले ‘मेरो अल्लाह मेहरबान’ जैसी बंदिश सिखाई। इसी तरह हमें प्रारंभ में ‘ॐ’ के गायन की तालीम मिली और फिर श्रीअनंत हरिनारायण की। हमारे गुरूजन शिवजी की बंदिश भी बताते हैं, साथ ही रहमान की भी। घरानों और गुरूजनों के पास संगीत कला को लेकर कोई विभाजन नहीं मिला। आज अगर किसी की दृष्टि संकुचित हो रही है तो यह उसकी समझ की कमी है। इसके पीछे थोड़ा राजनैतिक पहलू भी है। परंतु संगीत में इसका असर नहीं के बराबर है, क्योंकि जैसा कि मैंने कहा, आज भी शास्त्रीय संगीत के आसमान पर भारतीय संगीत को प्रतिष्ठित करने वाले पंडित विश्वमोहन भट्ट भी हैं और उस्ताद राशिद ख़ान साहब भी हैं। राशिद खाँ साहब ‘राधा बृज को चली’ ऐसा गाते हैं कि क्या कहूँ आपको!… यह सब फिज़ूल की बातें हैं जिसे कहें कि लड़ने के लिये चिमटी खोरना। इसके लिये हिंदू-मुस्लिम होना ही नहीं, कोई भी नासमझ कर सकता है। समझना हमें हैं।
‘संगीत गुरूकुल’ के विद्यार्थी बना रहे नई पहचान:
मैं अपने गुरूकुल में संगीत की तालीम से बहुत संतुष्ट हूँ। मुझपर गुरू की बड़ी कृपा है। मैंने 2009 से बच्चों को सिखाना शुरू किया था। मेरी एक स्टूडेंट चेतना खले है। आज वे संगीत में पीएचडी कर रही हैं। उसी के साथ अनुजा वालुजकर भी जुड़ी हैं, दोनों आज जुगलबंदी में अपनी पहचान बना रही हैं। मतलब शास्त्रीय संगीत में लड़कियों की जुगलबंदी। राजन-साजन मिश्र,सागर बंधु, सिंह बंधु मिलेंगे। पुरूष गायकों की जुगलबंदी अक्सर हम देखते हैं और रही है। परंतु इन दोनों युवा गायिकाओं के मन में यह विचार आया और अब वे इसमें अच्छा कर रही हैं। दस साल की मेहनत के बाद अब उनके कार्यक्रम भी होने लगे हैं। मेरा एक और स्टूडेंट है, जिसका नाम ओशो जैन है। वह अभी भी शास्त्रीय संगीत सीख रहा है। परंतु वह ख़ुदके बहुत अलग तरह के गाने बनाता है। वो पिक्चरों के गाने नहीं गाता। वह ख़ुद लिखकर अपना संगीत बनाता है। आज उसकी अपनी पहचान है। ऐसे बच्चे भी हैं। कुछ ऐसे स्टूडेंट्स हैं जिन्होंने शास्त्रीय संगीत सीखा, मगर वे अंग्रेज़ी में गाती हैं। मेरा कहना है कि विद्यार्थियों का संगीत से अच्छा परिचय कराना महत्वपूर्ण है। इसमें हम गुरूजनों की ज़िम्मेदारी ज़्यादा है, सीखने वालों की कम।
संगीत सीखने का मतलब सिर्फ़ गायक बनना ही नहीं: मेरा यह भी कहना है कि शास्त्रीय संगीत सीखकर कोई ज़रूरी नहीं कि आप वही करें। मिसाल के लिये मेहंदी हसन साहब ने शास्त्रीय संगीत ज़रूर, परंतु उन्होंने गाईं ग़ज़लें। ग़ुलाम अली साहब,जगजीत सिंह जी,भूपेन्द्र-मिताली जी,..इन सभी गायक कलाकारों ने शास्त्रीय संगीत सीखा। मगर इन सभी ने ग़ज़ल की दुनिया में नाम रोशन किया।
और रियाज़ करना है, गाने को और बेहतर बनाना है- पंडित गौतम काले
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