- बालीवुड के मशहूर गीतकार इरशाद कामिल से द टेलीप्रिंटर की ख़ास गुफ्तगू
- ‘जग घूमिया’ , ‘स्वेग से स्वागत’ और हवाएँ जैसे उनके गीत हैं युवाओं की पहली पसंद
- ‘जब वी मेट’ , ‘लव आजकल’ , ‘रांझणा’ , ‘चमेली’ , ‘सुल्तान’ और ‘टाइगर जिंदा है’ जैसी फ़िल्मों में लिखे बेहतरीन गीत
जीवन के राग, शब्दों की काया ओढ़, सुरों में ढ़लते हैं तो गीत बनकर मुखरित हो उठते हैं। गीत वही, जो सदियों तक आपकी ज़िन्दगी में शामिल हो, आपके साथ हमकदम बनकर चलते रहें। जब ऐसा ही उत्कृष्ट सर्जन होता है तो वह कालजयी, शाश्वत होता है।
बॉलीवुड के ऐसे फ़िल्मी गीतकार, जिन्हें समाज के प्रति अपनी इस जिम्मेदारी का अहसास है। इसी कड़ी में शामिल सुप्रसिद्ध गीतकार इरशाद कामिल हैं। इरशाद कामिल हिन्दी फ़िल्म जगत के स्थापित गीतकारों में से एक हैं जो युवाओं के दिल की आवाज़ को शब्द देते हैं इसलिए उनके लिखे गाने भी ख़ूब सुने और पसंद किए जाते हैं। इरशाद से भोपाल में अनुपमा श्रीवास्तव ‘अनुश्री’ ने ख़ासतौर पर द टेलीप्रिंटर के लिए बातचीत की।
इरशाद कामिल ने शुरुआत में मासूम-सी मुस्कुराहट के साथ कहा कि बहुत अच्छा मौसम है। थोड़ी बारिश है और भोपाल जैसा खूबसूरत शहर है। मुझ जैसे इंसान को इससे ज़्यादा और क्या चाहिए. फिर उन्होंने एक गहरी साँस छोड़ते हुए अपने कैरियर के सफर के बारे में बताया कि-‘ अहह! यह कैसे शुरू हुआ! एग्जैक्ट डेट बताना तो मेरे लिए बड़ा मुश्किल होगा। एक बात ज़रूर है, जब मैंने मैट्रिक किया तो मुझे थोड़ी-सी शायरी पसंद आने लगी, कविताएँ पसंद आने लगीं, मतलब मेरा झुकाव थोड़ा साहित्य की तरफ़ हो गया। यह सफर तब से शुरू हुआ, अब तक रुका नहीं है अभी लगातार पढ़ रहा हूँ। अभी लगातार नई किताबे खोजता हूँ। नए कवि खोजता हूँ। नए शायरों को पढ़ता हूँ। नए शेर जानने की कोशिश करता हूँ और यह भूख लगातार बनी हुई है।
गम्भीर रिपोर्टिंग से रूमानियत भरे गीतों का सफ़र
यह पूछे जाने पर कि आप गंभीर रिपोर्टिंग करते रहे हैं जनसत्ता और ट्रिब्यून वगैरह में, वहाँ से रूमानियत भरे गीतों की तरह आप का रुख किस तरह हुआ! तो उन्होंने हँसते हुए जवाब दिया-देखिए ऐसा है कि जो मेरी रिपोर्ट पढ़ते थे पहले उन्हें यह लगता था कि मेरी रिपोर्ट में भी रूमानियत है। जी, ऐसा था कि पत्रकारिता से ज़िन्दगी शुरु ज़रूर हुई थी, जैसे कि ज़िन्दगी को कहीं, किसी जगह से शुरू होना होता है। लेकिन मुझे पता था कि पत्रकारिता मुझे पसंद ज़रूर है, लेकिन यह मुझे उस तरह से रोक नहीं पाएगी, जहाँ मुझे जाना है। जाना मुझे मुंबई ही था। मुझे गीत ही लिखने थे। पत्रकारिता भी एक शब्दों के साथ गाढ़ेपन का, दोस्ती का ही रिश्ता था, जो गीतों में बदल गया और वही पत्रकार जो रूमानी अंदाज में अपनी रिपोर्ट लिखा करता था, अब वह रुमानी गीत लिखने लगा।
मेरे हर गीत में स्त्री स्वातन्त्र्य
स्त्री अस्मिता से जुड़े एक सवाल पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि-ऐसा है, आप मेरे गीत उठा लीजिए. मेरे हर गीत में आपको नारी स्वातंत्र्य ही मिलेगा। मैं आपको उदाहरण देता हूँ उदाहरण के तौर पर आप मेरा यही गीत उठा लीजिए पटाखा गड्डी, (गुनगुनाते हुए)
” मौला तेरा माली,
ओ हरियाली, जंगल वाली,
तू दे हर गाली पर ताली।
उसकी कदम-कदम रखवाली,
ऐंवई लोक लाज की,
क्यों है आफत डाली”
देखिए, ये बातें सत्रह-अठारह साल की लड़की की आजादी की बातें हैं। उसकी उड़ान की बातें हैं और मेरे गीतों में कभी भी ऐसा नहीं हुआ कि मैंने नारी का ऑब्जेक्टिफिकेशन किया हो। नारी का वस्तुकीकृत मेरे गीतों में कहीं नहीं मिलेगा। न मैंने कभी किया है, न मैं कभी करूँगा। । मेरी यह मेहनत, यह कोशिश बरकरार रहेगी, क्योंकि मैं “नारी को खुदा की हैंडराइटिंग” मानता हूँ, तो जो इबारत खुदा ने लिखी है, वह खूबसूरत ही होगी।
बच्चों के लिए लिखना खूब पसंद
इरशाद जी के बच्चों के लिए लिखे गीतों पर बात छिड़ी तो उनका जवाब कुछ यूँ था-बच्चों की दुनिया में बहुत खास अंदाज में एंट्री है मेरी। बच्चों की दुनिया में लगातार मेरी एंट्री रहती है, जैसे आपके ही भोपाल में एकलव्य है। एकलव्य के तहत बहुत सारी बाल पत्रिकाएँ छपती हैं उनमें से एक पत्रिका साइकिल भी है और चकमक भी। साइकिल में मैं लगातार बच्चों के लिए लिख रहा हूँ। ऐसी कविताएँ लिख रहा हूँ जो सिर्फ़ बच्चों के लिए हैं।
लंबी प्रक्रिया है गीत लिखे जाने की
बॉलीवुड फ़िल्मों में गीत लिखने की क्या कोई खास प्रक्रिया है? सवाल पर उन्होंने कहा कि निश्चित ही गीत लिखने की तो एक प्रक्रिया है। पहले फ़िल्म की कहानी होती है। कहानी में एक सिचुएशन होती है। उस सिचुएशन के तहत आप एक धुन बनाते हैं और उसके बाद उस धुन पर बोल लिखे जाते हैं। जब गीत लिख लिया जाता है तो उसके बाद डायरेक्टर, म्यूजिक डायरेक्टर, कभी-कभी एक्टर भी आपस में बैठते हैं, बातें करते हैं और जब सारी चीजें फाइनल हो जाती हैं, उसके बाद रिकॉर्डिंग होती है।
मेरे यहाँ नहीं चलता “सब चलता है”
मनोरंजन के नाम पर “सब चलता है” आजकल हम बोल देते हैं। तो क्या यह किसी तरह से उत्कृष्टता में या समाज को दिशा देने में कमी महसूस होती है कि इस तरह का एटीट्यूड लेकर हम व्यवसायिकता के दृष्टिकोण से चलें! इसके जवाब में एक उच्छ्वास के साथ उन्होंने स्पष्ट कहा कि “सब चलता है” सब जगह चलता होगा, लेकिन मेरे यहाँ नहीं चलता।
गीतों में रूहानी अंदाज़ पर उन्होंने कहा कि वह चाहे कुन फाया कुन हो या फिर अन्य। मेरे रूमानी गीतों में भी आपको कहीं न कहीं एक सूफियाना टच ज़रूर मिल जाएगा।

