Wednesday, May 13, 2026
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आज़ादी के बाद की पीढ़ी में श्रीकांत वर्मा सबसे ऊर्जावान लेखक-कवि

  • रायपुर में श्रीकांत वर्मा के साहित्यिक अवदान पर दो दिनी संगोष्ठी
  • पहला सत्र ‘बुखार में कविता’ दूसरा ‘घर लौटने की चाह’
  • ‘तीसरा रास्ता’ में हुई ‘साहित्य, सत्ता और समय’ पर बात

रायपुर, द टेलीप्रिंटर। आज़ादी के बाद के साहित्यकारों की पीढ़ी में श्रीकांत वर्मा सबसे ऊर्जावान लेखक-कवि हैं। उनके सिवाय संभवतः कोई ऐसा नज़र नहीं आता है। वे सटीक कहानीकार और अनूठे उपन्यासकार हैं तो अपने भीतर बहुत गहरे से बहती हुई पिघलते लोहे-सी काव्य धारा को पूरे धीरज से सहा और उसे उन्होंने बिल्कुल नए काव्य विन्यासों में ढाला। शायद अपने घुमड़ते काव्य आवेग के आगे कवि का धीरज निष्फल हो गया, लेकिन तब यह काव्य आवेग या काव्य संवेदना उन्हीं की कविताओं के सुघड़ विन्यासों में आसपास, यहाँ-वहाँ चिंगारियों की तरह बिखरता गया।

यह बात सुप्रसिद्ध कवि और चिंतक अशोक वाजपेयी ने ‘जलसाघर’ और ‘मगध’ जैसी कालजयी काव्यकृतियों के लिए पहचाने जाने वाले कवि श्रीकांत वर्मा के गृह प्रदेश छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में उनके साहित्यिक अवदान पर एकाग्र दो दिनी संगोष्ठी में कही। यह कार्यक्रम रजा फाउण्डेशन एवं छत्तीसगढ़ फ़िल्म एण्ड विजुअल आर्ट सोसायटी ने मिलकर आयोजित किया था।

श्रीकांत वर्मा पर एकाग्र यह आयोजन कई मायनों से उल्लेखनीय रहा। इसके ज़रिए एक महत्वपूर्ण रचनाकार का वह किंचित भूला हुआ संसार फिर से चर्चा के केंद्र में आया। श्रीकांत वर्मा के रचना संसार को हमारे आज के राजनैतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक संकटों के संदर्भ में व्याख्यायित करते हुए इन दो दिनों में कई बिंदुओं पर महत्वपूर्ण पर्चे पढ़े गए, बहुत सार्थक चर्चाएं हुईं । अशोक वाजपेयी, नंद किशोर आचार्य, ओम थानवी,ललित सुरजन, मंगलेश डबराल, अरुण कमल, मदन सोनी, उदयन वाजपेयी, ध्रुव शुक्ल और आशीष त्रिपाठी के साथ आज के समय और साहित्यिक परिदृश्य पर बहुत ही गम्भीर और प्रासंगिक बातचीत होती रही।

इस आयोजन में देश के नामचीन साहित्यकार, लेखक और संपादकों ने वैचारिक विमर्श किया। पहले सत्र ‘बुखार में कविता’ में साहित्यकार नंदकिशोर आचार्य, मदन सोनी, मंगलेश डबराल और अरूण कमल ने हिस्सा लिया। दूसरे भाग में ‘घर लौटने की चाह’ विषय पर अतिथि वक्ता के रूप में कवि और आलोचक  आशीष त्रिपाठी और कवि उदयन वाजपेयी ने अपनी बात रखी।

‘तीसरा रास्ता’ में साहित्यकार विजय कुमार, संपादक ललित सुरजन और धुव शुक्ल ने सार्थक चर्चा की। इसके बाद ओम थानवी और राजेंद्र मिश्र ने साहित्य, समय और सत्ता को लेकर कई बड़े सवाल खड़े किए। वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी ने एक मानीखेज वक्तव्य दिया। कार्यक्रम के समापन सत्र में सत्ता, आज का समय और रचनात्मक चुनौतियों पर श्री अशोक वाजपेयी अपने महत्वपूर्ण विचार सामने रखे।

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