Wednesday, May 20, 2026
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बाबा कुछ बरस और जीये होते तो मैं फ़िल्म एक्टर नहीं एक गायक होता: शाहबाज़ खाँ

प्रवीण खारीवाल, इंदौर स्टुडियो। ‘बाबा अगर कुछ बरस और जीये होते तो यक़ीनन मैं फ़िल्म या टीवी एक्टर नहीं बल्कि गायक ही होता।’ यह बात उस्ताद अमीर ख़ाँ के सुपुत्र अभिनेता शाहबाज़ ख़ाँ ने कही। वे इंदौर में अभिनव कला समाज द्वारा आयोजित ‘याद-ए-अमीर’ कार्यक्रम में अपनी भावनायें व्यक्त कर रहे थे। इस विचारपूर्ण कार्यक्रम में बहुविध  संस्कृतिकर्मी आलोक वाजपेयी ने कई अहम सवाल पूछे और इंदौर घराने से जुड़े ज़रूरी मुद्दों पर बातचीत की। एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा, ‘मेरे वालिद कहते थे, नग़मा वही जो रूह सुने और रूह सुनाये’। इंदौर घराने की विशेषताएं कलाकारों की पूँजी : शाहबाज़ खाँ ने अपने वालिद उस्ताद अमीर ख़ाँ साहब की गायकी से सम्बद्ध इंदौर घराने के संगीत पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की। उन्होंने कहा, ‘आज ज़्यादातर संगीत कलाकारों ने इंदौर घराने की संगीत विशेषताएं अपना रखीं हैं। यह बात और है कि कुछ कलाकार इंदौर घराने का नाम नहीं लेते और कुछ जानते ही नहीं कि ये ख़ासियतें किस घराने की है। इस नज़रिये से आज महसूस होता है कि इंदौर घराने के बारे में जागरूकता बढ़ाना और इसे आगे ले जाना हम सभी की जिम्मेदारी है’। उन्होंने आव्हान किया कि इंदौर घराने को और आगे बढ़ाने की मुहिम इंदौर से प्रारम्भ होकर विस्तार पाए और सभी कलाकार, संस्थाएं, संगीत विद्यालय आदि इससे जुड़ें। उन्होंने अभिनव कला समाज को उस्ताद अमीर ख़ाँ की रिकॉर्डिंग्स एवं संदर्भ उपलब्ध कराने का वादा किया। साथ ही कहा, ‘इंदौर घराने की गायकी में कोई शॉर्टकट नहीं है, बहुत सब्र और समर्पण की जरूरत है’। बाबा से मिली संगीत और सुकून की दौलत : शाहबाज़ ने अपने अतीत को याद करते हुए कहा कि वे टाटा-अंबानी के घर में भी पैदा हुए होते तो वो फ़ख्र महसूस नहीं करते, क्योंकि बाबा सुकून, संगीत और श्रोताओं के असीम प्रेम की दौलत छोड़ गए हैं। बाबा के इंतकाल के बाद अम्मा जी अव्वल तो वे ख़ाँ साहब का गाना सुनने नहीं देती थीं या सुन कर ज़ार-ज़ार रोती थीं। अम्मी को मलाल था कि उस्ताद अमीर ख़ाँ साहब और इंदौर घराने को अपेक्षित गौरव मिलना शेष है। अम्मी ने ही उन्हें कहा कि वे गायकी के क्षेत्र में न आयें, क्योंकि उन्हें भय था कि कहीं और सीखने के कारण या किसी अन्य कारण से वे जो गायेंगे, वो बार-बार तुलना की कसौटी पर कसा जाएगा। ऑफर मिले लेकिन बाबा विदेश नहीं गये : शाहबाज़ ख़ाँ ने कहा कि बाबा को विदेशों में बसने के बहुत ऑफर आए लेकिन उन्होंने कहा कि मैं जो करूंगा वह देश में करूंगा और देश को ही अपना सीखा हुआ देकर जाऊँगा। उन्होंने कुछ कलाकारों के पेशेवराना रुख के कारण शास्त्रीय संगीत को हुए नुकसान पर अफ़सोस ज़ाहिर किया। कहा, संगीत में भी फास्ट फ़ूड जैसा रुख अपनाने से पेट और दिमाग दोनों खराब हुए हैं, जबकि बाबा कहते थे कि नग़मा वही जो रूह सुने और रूह सुनाए। शहर को सिनेमा और टीवी जगत में बड़ी पहचान देने वाले इस कलाकार ने सगर्व कहा, उनके बाबा और अम्मी दोनों ही बेहद संतोषी थे। वे फ़कीर बाबा और माँ की परवरिश से बेहद अमीर हुई संतान हैं।टीपू सुलतान मेरा प्रिय धारावाहिक : प्रश्नों के रैपिड फायर राउंड में शाहबाज़ ने टीपू सुलतान को अपना प्रिय धारावाहिक और टीवी को अपना प्रिय माध्यम बताया। उन्होंने अपने लोकप्रिय संवाद भी सुनाकर दर्शकों को आल्हादित कर दिया। उन्होंने अपनी माताजी एवं संगीतकार नौशाद साहब द्वारा उस्ताद अमीर ख़ाँ साहब पर लिखी रचनाओं की भावप्रवण प्रस्तुति से भी खूब दाद बटोरी। वहीं उनके द्वारा अभिनीत रावण के किरदार के तांडव स्त्रोत की सस्वर ओजपूर्ण अदायगी से तो उन्होंने दर्शकों को देर तक तालियाँ बजाने पर मजबूर कर दिया।
अभिनव कला समाज
सहेजेगा खाँ साहब की विरासत:

प्रारम्भ में अभिनव कला समाज के अध्यक्ष और इस रिपोर्ट के प्रस्तोता प्रवीण कुमार खारीवाल ने अभिनव कला समाज में उस्ताद अमीर ख़ाँ साहब की महफ़िलों के सुनहरे दौर को याद किया। उन्होंने इंदौर घराने और उस्ताद अमीर ख़ाँ साहब की विरासत को सहेजने में अभिनव कला समाज की हर संभव, सार्थक एवं सशक्त भूमिका के प्रति आश्वस्त किया। शिक्षाविद प्रो. डॉ. आर. के. जैन ने उस्ताद अमीर ख़ाँ साहब पर शोधपीठ स्थापना का सार्थक सुझाव दिया। अतिथियों का स्वागत कमल कस्तूरी,पं. सुनील मसूरकर, सत्यकाम शास्त्री, रमेश झंवर, डॉ. जावेद अहमद शाह ने किया। स्मृति चिन्ह विजय पारिख एवं विजय गावड़े ने भेंट किया। प्रारम्भ में कार्यक्रम संयोजक बुंदू ख़ाँ ने स्वागत उद्बोधन दिया। अंत में सोनाली यादव ने आभार व्यक्त किया।

 

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