(वरिष्ठ नाट्य निर्देशक योग मिश्र से डॉ.मोनिका ठक्कर की बातचीत)
बच्चों के लिये रंगमंच से जुड़ना क्यों ज़रूरी है ? बाल रंगमंच और नाटकों में काम करने का उनके मन-मस्तिष्क पर क्या प्रभाव पड़ता है ? बच्चे खेल-खेल में किस तरह से जीवन की गहरी बातों सीखते और समझते हैं ? कैसे अपनी कमियों और ख़ूबियों को पहचानते हैं ? ऐसे ही महत्वपूर्ण सवालों को लेकर मुंबई की प्रख्यात लेखिका और रिसर्च स्कॉलर डॉ.मोनिका ठक्कर ने रायपुर के वरिष्ठ नाट्य निर्देशक और बाल रंगमंच से जुड़े योग मिश्र से बातचीत की थी। उसी बातचीत के प्रमुख अंश हम यहां प्रस्तुत कर रहे हैं। यह बातचीत बाल नाट्य संस्थाओं के कलाकारों के साथ-साथ स्कूली टीचर्स और अभिभावकों के लिये भी बहुत महत्वपूर्ण है।-संपादक,इंदौर स्टुडियो डॉट कॉम।
बच्चों के व्यक्तित्व निर्माण में रंगमंच की अहम भूमिका:
रंगमंच कला बच्चों के व्यक्तित्व के विकास में मददगार होती है। बच्चों को खेल-खेल में कुछ सिखाना मैं बेहतर समझता हूं। बच्चों के साथ नाटक तैयार करना सबसे आसान है। जैसे कच्ची माटी से कोई भी आकार बनाया जा सकता है वैसे ही बच्चों से कोई भी चरित्र की नकल करवाई जा सकती है। बच्चों को रंगमंच के एक अभिनेता के तौर पर साधने के अनेक थियेटर गेम्स हैं। थियेटर के खेलों के माध्यम से बच्चा कब अभिनय के प्रति गंभीर होता चला जाता है, कब उसके भीतर दूसरे बच्चे से अच्छा करने का जज्बा जागृत होने लगता है, उसे स्वयं पता नहीं चलता। परेशानी यह है कि बच्चों पर पढ़ाई का इतना ज्यादा बोझ है कि उनके पास दूसरे कामों के लिए समय ही नहीं बचता। इसीलिए बच्चों के साथ केवल छुट्टियों में ही काम किया जा सकता है।
बच्चों के मनोविज्ञान को समझना ज़रूरी:
बच्चों के साथ काम करने के लिए बच्चों का मनोविज्ञान समझना बेहद जरूरी होता है। हरेक बच्चे की पारिवारिक और सामाजिक पृष्ठभूमि का असर उसके हाव-भाव, आचरण, व्यवहार, क्रिया-कलापों में निश्चित तौर पर झलकता है। कई बच्चे जल्दी नहीं खुलते। कई बच्चे जरूरत से ज्यादा वाचाल होते हैं। कई बोलते ही नहीं, बहुत कुरेदने पर भी शर्माते हैं या इधर-उधर देखने लगते हैं। कई बच्चे हरेक काम बेमन से करते हैं। बच्चों के व्यवहार से बच्चों के मन को टटोलना पड़ता है। धीरे-धीरे बच्चे के मन को खोलना पड़ता है। बच्चे की दिक्कतों का हल तलाशना पड़ता है। सभी बच्चों में ईश्वर ने प्रतिभा तो एक सी दी है, जो अन्तर बच्चों के परफारमेंस में नजर आता है, वह उनके ध्यान का फर्क है। कोई बच्चा ज्यादा ध्यान देता है, कोई कम ध्यान देता है। बच्चों के साथ काम करने वाले के लिए यह बात देखने-समझने की है कि बच्चा किस बात में अधिक रूचि लेता है। उसका ध्यान किस ओर ज्यादा केन्द्रित रहता है। बच्चों का मन बड़ा कोमल होता है। उसके मन पर छोटी-छोटी बातों का गहरा प्रभाव पड़ता है। इसके अनेक उदाहरण हैं। जैसे बच्चों में डर का भाव, आत्मविश्वास में कमी आदि। यह सब बाल मन पर किसी घटना का दुष्परिणाम भी हो सकता है।
बच्चों के नाटक बोझिल नहीं होना चाहिये:
बच्चों के लिए नाटक चुनते समय इस बात का खास ध्यान रखना चाहिए कि नाटक की कथा-वस्तु बोझिल न हो। उसमें बच्चों के मनोरंजन, खेलकूद के अंश जरूर शामिल रहें। नाटक की भाषा सरल और रोचक होनी चाहिए। बच्चों के मनोविज्ञान से जुड़ी मनोविनोद पूर्ण कथा हो तो बहुत ही अच्छा है। बच्चों को समझाने में रोचकता होनी चाहिए। किसी कहानी या घटना के द्वारा अपनी बात समझाई जाए तो बच्चे बड़े आनंद से सुनेंगे और जल्दी समझेंगे। खेल या कहानी के माध्यम से बात समझाई जाये तो उससे बच्चों की रूचि बनी रहेगी। मेरा मानना है कि बच्चों के मनोरंजन के साथ शिक्षा का सबसे उपयोगी माध्यम बाल रंगमंच है। हालांकि इस पर उतना ध्यान ही नहीं दिया जा रहा है। बच्चों के मनोरंजन की पूरी जिम्मेदारी इन्टरनेट या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर डालकर माता-पिता निश्चिन्त हो गए हैं। जबकि पढ़ाई के साथ उनके विकास के लिये ऐसी रचनात्मक गतिविधियों की ज़रूरत है जो उन्हें अच्छा नागरिक भी बनाये और जागरूक भी बनाये। बाल रंगमंच से यह हो सकता है। इससे अच्छे और बुरे को पहचानने और उसमें फर्क करने की क्षमता विकसित होती है।
नये विषयों पर बच्चों के नये नाटक:
बच्चों पर नए नाटक लिखे तो गए हैं पर खेले कम जा रहे हैं। अभी हमारे एक मित्र शकील अख्तर ने बच्चों के दो फुल लेंथ नाटक लिखकर मुझे भेजे थे। एक है “मोनिया दी ग्रेट” दूसरा है- “किलर गेम”। दोनों बच्चों के लिए बेहद महत्वपूर्ण नाटक हैं। ‘मोनिया दी ग्रेट’ गाँधी जी के बचपन पर आधारित है। इस नाटक में बताया गया है कि सामान्य बच्चों की तरह ही गाँधी जी का भी बचपन था। उनके बचपन की घटनाओं और माहौल का उनके जीवन पर कैसा प्रभाव पड़ा, वह इस नाटक में रोचकता से दिखाया गया है। (नाटक का चित्र ऊपर दिया गया है।) उन्हीं का लिखा दूसरा नाटक- ‘किलर गेम’ बच्चों इंटरनेट गेम्स और गजेट्स पर आधारित है। यह नाटक -‘ब्लू व्हेल:एक ख़तरनाक खेल’ के नाम से राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय,दिल्ली में मंचित भी हुआ है। बच्चों पर ऑनलाइन गेम्स का, उनके मनो-मस्तिष्क और जीवन पर कितना घातक असर पड़ सकता है,वह इस नाटक की कथावस्तु है। इस तरह के नाटक तो और भी लिखे जा रहे हैं। परंतु यह खेले कम जा रहे हैं। (नीचे नाटक ‘ब्लू व्हेल’ का एक दृश्य।)
बच्चों के मन पर सकारात्मक असर:
बाल नाटकों या बाल रंगमंच से जुड़ने का बच्चों के मन-मस्तिष्क पर बहुत ही सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। उनमें आत्मविश्वास बढ़ता है। एक-दूसरे के प्रति भरोसा पैदा होता है। वे एक टीम की तरह काम करना सीख जाते हैं। उन्हें अपनी कमियों और सबसे बढ़कर अपनी ख़ूबियों का पता चलता है। वो आसानी से खुद को अभिव्यक्त करना सीख जाते हैं। बाल रंगमंच में काम करने वाले बच्चे जीवन के कठिन संघर्षों में भी सहज बने रहना सीखते हैं। मेरी एक वर्कशाप में दो बहनें आती थीं,उनमें एक का रंग थोड़ा दबा हुआ और एक का खिला हुआ था। जाहिर है परिवार के लोगों के व्यवहार से एक बच्चे में श्रेष्ठता बोध ज्यादा था और दूसरे में हीन भावना साफ दिखाई पड़ती थी। दोनों बहनों की आपस में जरा भी नहीं बनती थी लेकिन दो साल में दोनों बहनों के आपसी व्यवहार में कमाल का परिवर्तन दिखाई दिया। जिस बच्ची का रंग थोड़ा दबा था उसका चिड़चिड़ापन चला गया। दोनों बहनें एक-दूसरे की परवाह करने लगीं। हीन भावना से निकलते ही बच्ची का आत्मविश्वास बढ़ गया। उनके अभिनय में सुधार आने लगा। यह सब अकेले मैंने ही नहीं उस वर्कशाप से जुड़े सभी बच्चों और साथियों ने महसूस किया।
बाल रंगमंच, नई पौध की नर्सरी:
बाल रंगमंच, रंगमंच की नई पौध तैयार करने की नर्सरी भी है। रंगमंच के अच्छे अभिनेता बालरंग से हमें मिलते हैं। बर्शते हमें उनके साथ काम करते रहना चाहिये। उन्हें नाटकों और थियेटर के महत्व से रोचक तरीके से जोड़ना चाहिये। नये विषयों पर नये तरीके से काम करते रहना चाहिये। उसमें ख़ुद बच्चों को हिस्सा बनाना चाहिये। एक बार हमने बच्चों के साथ ‘पेड़ सोचते हैं’ नाम का एक नाटक किया था। यह अपने आप में एक अनूठा प्रयोग था। पेड़ आपस में चर्चा करते हैं कि जब हम नहीं रहेंगे, हमारा सफाया हो जायेगा तब मनुष्यों पर इसका क्या असर पड़ेगा, उनपर कैसी विपत्तियां,आपदायें आयेंगी। वे आपस में चिंता करते हैं। इस तरह नाटक से बच्चों ने खेल-खेल में बहुत कुछ सीखा। नाटक में बच्चों की तरह पेड़ भी समय बिताने के लिए अंताक्षरी खेलते हैं। नाचते और गाते हैं। इस तरह हमने उनका मानवीकरण कर हमने यह संदेश देने की कोशिश कि आख़िर प्रकृति का हम भी हिस्सा हैं। हमें यह समझना बहुत ज़रूरी है।

