प्रियंका शक्ति ठाकुर,इंदौर स्टुडियो। ‘बैगा जनजाति की जीवन शैली में अब पहले की तुलना में काफ़ी बदलाव आने लगे हैं। इस समुदाय के युवा अब आपको मोबाइल पर बातें करते या डीजे पर थिरकते नज़र आ सकते हैं। उनपर आधुनिक परिवेश का असर पड़ रहा है’। आदिवासियों पर फ़िल्में बनाने में दिलचस्पी रखने वाले निर्माता निर्देशक राजेंद्र जांगले का यह कहना है। उन्हें बीते दिनों उनकी एथनोग्राफिक फिल्म ‘मांदल के बोल’ के लिये नॉन फीचर केटॉगरी में पुरस्कार मिला है। सुखद यह भी है कि उनके साथ ही मध्यप्रदेश को मोस्ट फ्रेंडली स्टेट अवार्ड भी मिला है। इस तरह राज्य के लिये यह दोहरी ख़ुशी की बात है।
भोपाल के ट्राइबल म्यूज़ियम के लिये बनी फ़िल्म : ‘मांदल के बोल’ फिल्म बैगा जनजाति पर है। यह फ़िल्म भोपाल के ट्राइबल म्यूज़ियम के लिये बनाई गई है। राजेंद्र जांगले कहते हैं, इस जनजाति के लोगों के रहन-सहन में पिछले दो-तीन दशकों में काफ़ी बदलाव आया है। उनपर आधुनिक माहौल का असर पड़ने लगा है। अब बैगा जाति के नौजवान आपको मोबाइल इस्तेमाल करते नज़र आ जाते हैं। उनके बाज़ारों में भी इलेक्ट्रॉनिक वस्तुएं नज़र आने लगी हैं। ऐसे में पुरानी परंपराओं पर भी असर दिखाई दे रहा है। पहले वैवाहिक आयोजनों में बैगा समुदाय के लोग जहाँ ढोल और मांदल बजाते थे, अब वे डीजे बजाने लगे हैं। बेशक, बुज़ुर्गों की पीढ़ी, पुराने रीति-रिवाजों पर चलने की कोशिश कर रही है।
(पारंपरिक वेशभूषा में बैगा जनजाति की युवतियाँ। तस्वीर सौजन्य: साइमन विलियम्स,एकता परिषद।) 
मध्य प्रदेश के लिये गर्व की बात: यह समूचे प्रदेशवासियों के लिए गौरवान्वित करने का क्षण है जब हमारे अपने प्रदेश को सिनेमा के क्षेत्र में इतने प्रतिष्ठित दो पुरस्कार मिले हैं। यह पुरस्कार उन सभी बातों को भी विराम लगाते हैं जिनमें अक्सर यह कहा जाता रहा है कि मध्यप्रदेश पिछड़ा राज्य है। यहां पर्यटन, फिल्म इंडस्ट्री, उद्योग, शिक्षा, चिकित्सा आदि के लिए कुछ भी नहीं। लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर मिली इस पहचान ने हम सभी का सिर गर्व से ऊंचा कर दिया है। वैसे तो मध्यप्रदेश में फिल्म शूटिंग का सिलसिला लगभग 50 वर्ष पहले ही शुरू हो गया था। लेकिन पिछले कुछ समय में सिनेमा के क्षेत्र में मध्यप्रदेश में शूटिंग का जो सिलसिला चला है यही कारण है कि हमारे प्रदेश को मोस्ट फिल्म फ्रेंडली स्टेट का अवॉर्ड मिल सका। प्रकाश झा, राजकुमार संतोषी, अनिल शर्मा, राजकुमार हिरानी सहित कई बड़े निर्देशकों ने यहां अपने ड्रीम प्रोजेक्ट को अंजाम दिया है और उन्हें सफलता भी प्राप्त हुई है।
सिनेमा के क्षेत्र में मध्यप्रदेश की नई पहचान: आज सिनेमा के क्षेत्र में मध्यप्रदेश को जो एक पहचान मिली है उसका श्रेय यहां की सरकार और टूरिज्म डिपार्टमेंट के सहयोग को जाता है। इसके साथ ही यह श्रेय हमें फिल्म निर्देशक प्रकाश झा को भी देना चाहिए जिन्होंने अपने एक नहीं कई फिल्मों की शूटिंग यहां की और यहां के वातावरण, सरकार, प्रशासन और टूरिज्म डिपार्टमेंट से मिले सहयोग की ब्रांडिंग मुंबई में की। इसके बाद यहां फिल्म प्रोजेक्ट आना शुरू हुए और अब मध्यप्रदेश की शूटिंग हब के रूप में पहचान स्थापित हो गई है। ख़ास बात यह भी है कि जिस फिल्म डायरेक्टर ने राज्य में अपना प्रोजेक्ट पूरा किया है वह अपने अगले प्रॉडक्शन को लेकर भोपाल या राज्य के अन्य इलाकों में शूटिंग करने फिर आते हैं। अब फीचर फिल्में ही नहीं बल्कि भोपाल और मध्यप्रदेश में बेवसीरिज, टीवी सीरियल्स, एड फिल्म आदि की शूटिंग का सिलसिला निरंतर जारी है।
यशपाल शर्मा की ‘दादा लखमी’ बेस्ट हरियाणवी फ़िल्म: अपने दमदार अभिनय से फिल्म इंडस्ट्री में एक अलग पहचान बना चुके अभिनेता यशपाल शर्मा जी ने बतौर निर्देशक राष्ट्रीय स्तर पर अलग पहचान बना ली है। उनके द्वारा निर्देशित हरियाणवी फिल्म ‘दादा लखमी’ को भी बेस्ट हरियाणवी फीचर फिल्म के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। यह यशपाल शर्मा जी के बेहतरीन कार्य और सिनेमा के प्रति उनके समर्पण का परिणाम है कि उन्हें इससे पुरस्कृत किया गया।
यह पुरस्कार प्राप्त फिल्म यशपाल शर्मा जी के पांच साल की मेहनत का मीठा फल है। ‘दादा लखमी’ हरियाणा के हीरो हैं, संस्कृति के ध्वजवाहक हैंथिएटर के प्रति उनकी दीवानगी का पता भी इस बात से लगता है कि वे कई बार रात में बगैर बताए किसी को थिएटर की रिहर्सल के लिए भाग जाया करते थे।
‘शूटिंग हब’ बन रहा मध्यप्रदेश: मध्यप्रदेश में 150 से अधिक ऐसी बेस्ट शूटिंग लोकेशन हैं जिनमें फिल्मकार फिल्म शूट करने की इच्छा रखते हैं और अपने प्रोजेक्ट में उन स्थलों को जरूर शामिल करते हैं। यहां के स्थानीय कलाकारों का भी निर्माताओं को भरपूर सहयोग मिलता है। अगर शासन-प्रशासन का इसी तरह से सहयोग बना रहा तब वह दिन दूर नहीं जब हमारा अपना मध्यप्रदेश आने वाले समय में सिनेमा के क्षेत्र में राष्ट्रीय ही नहीं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपना मुकाम बनाएगा। (लेखिका प्रियंका शक्ति ठाकुर रंगकर्मी और रंग निर्देशक हैं।)
बदल रही बैगा जनजाति की जीवन शैली, फ़िल्म निर्देशक राजेंद्र जांगले
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