बाल साहित्य का लेखन समाज के लिये महत्वपूर्ण- वर्षा दास

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विशेष प्रतिनिधि, इंदौर स्टूडियो। ‘बाल साहित्य हमें अनेकता में एकता का संदेश देता है। अतः इसका लेखन हमारे समाज के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण है। हमें इस बात का प्रयास करते रहना चाहिये कि बच्चों को निरंतर बाल साहित्य मिलता रहे’। प्रख्यात गुजराती लेखिका वर्षा दास ने यह बात कही। वे साहित्य अकादमी द्वारा प्रति वर्ष दिये जाने वाले बाल साहित्य पुरस्कार 2025 में आये लेखकों और साहित्यकारों को सम्बोधित कर रही थीं। यह कार्यक्रम दिल्ली के त्रिवेणी कला संगम में आयोजित हुआ। पुरस्कृत बाल साहित्यकारों को पुरस्कार स्वरूप ताम्र फलक और 50,000/- रुपए की सम्मान राशि प्रदान की गई। बाल साहित्य से बच्चों का बढ़ता है आत्म विश्वास: वर्षा दास ने गुजराती के प्रख्यात बाल साहित्यकार गिजु भाई बधेका के लेखन से जुड़े उदाहरण भी दिये। उन्होंने कहा, बच्चे बाल साहित्य पढ़कर जहाँ पढ़ने-लिखने में रूचि तो लेते ही हैं, उनका आत्मविश्वास भी बढ़ता है। कहानियों की विविधता उन्हें सारे संसार से जोड़ती है। उन्होंने बाल साहित्य का विभिन्न भारतीय भाषाओं में अनुवाद को बहुत जरूरी बताया और कहा ऐसा निरंतर होना चाहिये। आगे की तस्वीरों में क्रमश: मराठी, मलयालम, ओड़िया और हिन्दी के लेखक पुरस्कार ग्रहण करते हुए। बाल साहित्यकार ही अब दादा-दादी की भूमिका में: साहित्य अकादेमी के अध्यक्ष माधव कौशिक ने कहा कि बाल साहित्यकार ही अब दादा-दादी और शिक्षक तथा माता-पिता की भूमिका में है। अच्छा बाल साहित्य अगर बच्चों को पढ़ने के लिए मिले तो वह अनुचित गतिविधियों से दूर रहेंगे। अच्छा साहित्य बच्चों की मुस्कान वापस आ सकती है। प्रारंभ में सरस्वती वंदना के बाद मुख्य अतिथि वर्षा दास का स्वागत किया गया। संस्कृति मंत्रालय की अपर सचिव अमिता प्रसाद सरभाई भी इस अवसर पर उपस्थित थी। उनका स्वागत साहित्य अकादेमी की उपाध्यक्ष कुमुद शर्मा द्वारा किया गया।बाल साहित्यकार एक मशाल की तरह: स्वागत वक्तव्य में साहित्य अकादेमी की सचिव पल्लवी प्रशांत होळकर ने दिया। उन्होंने कहा, आज के डिजिटल और सोशल दौर में बाल साहित्यकार एक मशाल की तरह हैं जो बच्चों को नैतिक जिम्मेदारियों का पाठ पढ़ाते हैं। एक अच्छे समाज के लिए यह नैतिक जिम्मेदारी आवश्यक है।बच्चों का कच्चा मन स्लेट जैसा: साहित्य अकादेमी की उपाध्यक्ष कुमुद शर्मा ने अपने समाहार सम्बोधन में कहा- ‘बच्चों का कच्चा मन स्लेट जैसा होता है, जिस पर कुछ भी लिखा गया गहरी छाप छोड़ता है। बच्चों को मोबाइल से दूर रखने के लिए सुंदर चित्र युक्त पुस्तकों को तैयार करने की चुनौती हर किसी के सामने है, जिससे बच्चे इन पुस्तकों के प्रति ज्यादा आकर्षित हो और जीवन में तनाव से दूर रहकर एक अच्छी दुनिया के निर्माण में संलग्न हो। पुरस्कार प्राप्त करने वाली पुस्तकें और उनके लेखक – असमिया – मइनाहंतर पद्य (कविता): सुरेंद्र मोहन दास, बाङ्ला – एखनउ गाये काँटा देय (कहानी): त्रिदिब कुमार चट्टोपाध्याय, बोडो – खान्थि बोसोन आरो आखु दानाय (कहानी): बिनय कुमार ब्रह्म, डोगरी – नन्हीं टोर (कविता):  पी.एल.परिहार ”शौक़”, अंग्रेज़ी – दक्षिण, साउथ इंडियन मिथ्स एंड फै़ब्लस रीटोल्ड (कहानी): नितिन कुशलप्पा एमपी, गुजराती – टिंचाक (कविता): कीर्तिदा ब्रह्मभट्ट, हिंदी – एक बटे बारह (संस्मरण): सुशील शुक्ल, कन्नड – नोटबुक (कहानी): के. शिवलिंगप्पा हंदिहाल, कश्मीरी – शुरे ते चुरे ग्युश (कहानी): इज़हार मुबशिर, कोंकणी – बेलाबायचो शंकर आनी हेर काणयो (कहानी): नयना आडारकार, मैथिली – चुक्का (कहानी): मुन्नी कामत, मलयाळम् – पेन्गिनुकळुडे वन्करायळ (उपन्यास): श्रीजित मुत्तेडत्तु, मणिपुरी – अंगाङ्शिङ्गी शान्बुङ्सिदा (नाटक): शांतो एम, मराठी- आभाळमाया (कविता): सुरेश सावंत, नेपाली – शान्ति वन (उपन्यास): साङ्मु लेप्चा, ओड़िआ – केते फुल फुटिचि (कविता): राजकिशोर पाढ़ी, पंजाबी – जादू पत्ता (उपन्यास): पाली खादिम (अमृत पाल सिंह), राजस्थानी – पंखेरुवं नी पीड़ा (नाटक): भोगीलाल पाटीदार, संस्कृत – बालविश्वम् (कविता): प्रीति पुजारा, संताली – सोना मीरु-वाक् सांदेश (कविता): हरलाल मुर्मु, सिंधी – आसमानी परी (कविता): हीना अगनाणी ‘हीर’, तमिऴ – ओट्राइ चिरगु ओविया (उपन्यास): विष्णुपुरम सरवणन, तेलुगु- कबुर्ला देवता (कहानी): गंगिशेट्टी शिवकुमार, उर्दू – क़ौमी सितारे (लेख): ग़ज़नफ़र इक़बाल। आगे पढ़िये – उर्दू ड्रामा फेस्टिवल में बुद्ध और गालिब, पहले आप और जेब कतरा – https://indorestudio.com/urdu-drama-festival-delhi-ghalib/

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