Saturday, March 7, 2026
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बलि और शम्भू: बुज़ुर्गों की भावनाओं का मार्मिक नाटक

अभिषेक कुमार, इंदौर स्टूडियो। दिल्ली के गोल मार्केट में मौजूद मुक्तधारा सभागार में नाटक ‘बलि और शम्भू’ का मंचन हुआ। ख्यात अभिनेता और लेखक मानव कौल के लिखे इस नाटक का निर्देशन नीलेश दीपक ने किया है। उन्होंने ही नाटक में मुख्य भूमिका भी निभाई है। ‘हिन्दी रंगभूमि’ द्वारा प्रस्तुत यह नाटक ओल्ड एज होम में रहने वाले बुजुर्गों की भावनाओं को मार्मिक तरीके से पेश करता है। आज के एकाकी परिवार और सोशल मीडिया की चकाचौंध में हमारे बुजुर्गों की अवहेलना और उनकी अनदेखी एक समाजिक प्रश्न खड़ा करता है।नाटक के कथ्य में मानवीय पहलू: नाटक का कथ्य, पारिवारिक, सामाजिक नज़रिये के साथ ही मानवीय पहलू को भी संवेदनशील तरीके से उठाता है। शंभू (नीलेश) अपनी बेटी तितली (हर्षिता) को बहुत प्यार करता है, लेकिन तितली भागकर शुभांकर से शादी कर लेती है। शादी के बाद अपने पिता से माफी मांगकर उनको मनाने के लिए वापस घर लौटते समय कार एक्सीडेंट में उसकी मौत हो जाती है और शुभांकर (गौरव) बच जाता है। घर से दूर ‘ओल्ड एज होम’ में शम्भू: बेटी की मौत के बाद शंभू घर छोड़कर ओल्ड एज होम आ जाता है और एक मानसिक रोगी की तरह रहने को विवश हो जाता है। कुछ दिन बाद वहां पर रहने के लिए बलि (मुकेश) आता है, जिसको उसके घर वालों ने निकाल दिया है। पहले तो बलि और शंभू में बिलकुल नहीं बनती लेकिन धीरे-धीरे वे दोस्त बन जाते हैं। अपनी जिंदगी के दर्द को सांझा करने के साथ एक दूसरे को हंसाकर-रुलाकर खुश होते हैं।शम्भू जी का अकास्मिक निधन: ओल्ड एज होम में विकट स्थिति तब उत्पन्न होती है जब शम्भू जी का अकास्मिक निधन हो जाता है। उसी दिन उनसे मिलने दो साल बाद शुभांकर आने वाला होता है। डा. झुलमिल (सान्या) शुभांकर का सामना करना नहीं चाहती है और बलि के जिम्मे छोड़कर चली जाती है। बलि को शम्भू समझ बैठता है शुभांकर: नाटक के अंत में शुभांकर और बलि की बातचीत दूसरे स्तर पर पहूँच जाती है। शुभांकर, बलि को शम्भू समझ कर अपनी मन की पीड़ा बताने लगता है जबकि नौकर गौतम (कृष्णा) ने शुभांकर को रास्ते में ही बता दिया था कि शम्भु जी मर गए हैं।  नाटक नोक झोंक के बीच ओल्ड एज होम में रहने वाले बुजुर्गों की भावनाओं को मार्मिक तरीके से पेश करता है और समाज को आइना दिखाता है।शम्भू बने नीलेश का बेहतरीन अभिनय: नाटक में शम्भू की भूमिका में नीलेश दीपक ने बेहतरीन अभिनय किया है उनकी संवाद अदायगी ने दर्शकों को भी भावुक कर दिया। बलि के रूप में मुकेश झा ने अपनी हँसमुख चरित्र के माध्यम से गहरा प्रभाव छोड़ा। तितली बनी हर्षिता कपूर, डा. झिलमिल- सान्या राज, गौतम के रूप कृष्णा राजपूत और शुंभाकर के अभिनय में गौरव कुमार ने सशक्त अभिनय का परिचय दिया। नाटक में प्रकाश परिकल्पक दिव्यांग श्रीवास्तव ने प्रकाश के विभिन्न आयामों से प्रभाव छोडने में कामयाब रहे। नाटक का संगीत चिराग जैन ने दिया। आगे पढ़िये – भुवनेश्वर में 22 भारतीय भाषाओं के युवा साहित्यकार हुए पुरस्कृत https://indorestudio.com/22-yuva-sahityakar-puraskar/

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