कला प्रतिनिधि, इंदौर स्टूडियो। गाज़ियाबाद में नाटक ‘बन्ने की दुल्हनिया’ के मंचन में नवोदित कलाकारों ने अपनी अभिनय प्रतिभा का परिचय दिया। दर्शकों ने जोश से भरे उनके अभिनय की सराहना की। नाटक को तीन हफ्ते की नाट्य कार्यशाला के दौरान तैयार किया गया। कार्यशाला और नाटक का निर्देशन वरिष्ठ रंगकर्मी आलोक शुक्ला ने किया। उन्होंने शकील अहमद सैफ़ की कहानी का नाट्य रूपांतरण भी किया।
20 जून से आयोजित हुई कार्यशाला: नये कलाकारों के प्रशिक्षण की यह कार्यशाला 20 जून से 13 जूलाई तक आयोजित की गई। कार्यशाला रीवा शहर की प्रासंगिक संस्था के दिल्ली रंगसमूह ने आयोजित की गई। इसमें तैयार किये गये नाटक का सिल्वर लाइन प्रेस्टिज स्कूल के सभागार में आयोजित ‘कथारंग महोत्सव’ में सफल मंचन हुआ। दर्शकों ने इस हास्य नाटक का जमकर मज़ा लिया।
दूसरे निकाह की ख़्वाहिश का हास्य नाटक : नाटक में अपनी बेगम की मौत के बाद एक वृद्ध व्यक्ति बन्ने खान (मृदुल कुमार) द्वारा दूसरे निकाह करने के प्रयासों की कहानी है। इस दौरान घर, परिवार तथा समाज में जो माहौल बनता है, उससे हास्यास्पद स्थितियां निर्मित होती हैं। दर्शक हँसने पर मजबूर हो जाते हैं। एक घंटे के इस नाटक को देखते वक्त दर्शक अपनी कुर्सियों से बँधे नज़र आए।
इन कलाकारों ने किया अभिनय: नाटक में मुख्य पात्र बन्ने खान की भूमिका मृदुल कुमार ने अदा की। उनके साथ सूत्रधार और बन्ने के दोस्त मासिता (टेकचंद), हारून रसीद (जीतेन्द्र कुमार)बेटी नाजरीन (निकिता करायत), बेटे कलुआ (सौरभ कुमार), भूरा (अभिषेक सेंगर ), बहु आयशा (अंजलि), सलमा (कविता ),भाभी (सिमरन),सरफराज चाचा ( शिवकुमार) दामाद राजा और व्यक्ति दो (संजय यादव) अजनबी और इक़बाल (वागीश शर्मा) ,नाजरीन की सहेली (खुशबु), व्यक्ति एक ( निखिल कुमार), व्यक्ति तीन (विनय शर्मा), छोटा लड़का (सृजन पाण्डेय), शबनम (मेघा सैनी), शबनम की अम्मी (विजय लक्ष्मी) और अब्बा रहमान (प्रताप सिंह) ने भूमिकाएं अदा की।
अनुकूल मंच-सज्जा और वेशभूषा: नाटक की मंच सज्जा और वेशभूषा मुस्लिम परिवेश के मुताबिक थी। मंच के दोनों ओर बनी खिड़कियां, हरे रंग से पुता एक दरवाज़ा, एक ड्रेसिंग टेबल के साथ फीमेल किरदारों द्वारा हिजाब पहने रहना, मेल किरदारों का कुर्ता पजामा और जालीदार टोपी के साथ दाढ़ी ने नाटक के कथानक को उभारने में मदद की। सभी पात्रों ने उर्दू ज़ुबान के साथ जोश से भरा अभिनय किया जिसने दर्शकों अपने मोहपाश में बांध लिया। नाटक के एक हास्य गीत में महज ढोलक (टेकचंद) के प्रयोग ने भी दर्शकों को प्रभावित किया। https://indorestudio.com/

