Wednesday, September 9, 2026
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भेड़िये, बिम्ब, शूर्पणखा और हैलो शेक्सपियर!

देवमणि पांडेय, इंदौर स्टुडियो डॉट कॉम। लखनऊ से प्रकाशित होने वाली ‘कला वसुधा’ त्रैमासिक प्रदर्शनकारी कलाओं की महत्वपूर्ण पत्रिका है। बीते बरस आया इसका एक विशेष अंक नये नाटकों पर केंद्रित था। अब चूंकि देश में कला गतिविधियां फिर से शुरू हो चुकी है। इसलिये रंगकर्मियों के लिये इस विशेष अंक का ज़िक्र बहुत ज़रूरी है। ताकि वे नये नाटकों का अपने मंचन के लिये चयन कर सकें। इस अंक में दो-चार नहीं बल्कि पूरे 31 नाटक एकसाथ प्रकाशित किये गये हैं,चार सौ से अधिक पन्नों का यह नाट्य अंक एक अनमोल दस्तावेज़ है। इनमें मौलिक,अनुदित और रूपांतरित तीनों तरह के नाटक शामिल हैं जो बड़ी सराहनीय बात है। भेड़िये,बिम्ब,शूर्पणखा और हैलो शेक्सपियर इस विशेषांक के दिलचस्प नाटक हैं। ‘हैलो शेक्सपियर’ हाल ही में प्रकाशित भी हो गया है।
सुमन कुमार का नाटक भेड़िये ! : हिंदी की पहली आधुनिक कहानी के रूप में मशहूर भुवनेश्वर की बहुचर्चित कहानी #भेड़िए (1936) का नाट्य रूपांतरण सुमन कुमार ने किया है। पूर्वरंग में कुछ बोध कथाएं और लोक कथाएं जोड़कर उन्होंने इस कहानी को मंचानुकूल और असरदार बना दिया है। नाटक अंततः अपनी  प्रस्तुति में इस स्थापना तक पहुंचता है कि हम सब के भीतर भी भेड़िया होता है। विभा रानी का नाटक ‘बिम्ब’ : कथाकार विभा रानी का एकल नाटक #बिंब_प्रतिबिंब दो वास्तविक स्त्रियों के जीवन की अविस्मरणीय कथा पर आधारित है। समाज के मौजूदा ताने बाने में यह नाटक स्त्रियों के दुख और यातना की मार्मिक अभिव्यक्ति है।ज़फर संजरी का नाट्य रूपांतरण ‘शूर्पणखा’ : कथाकार डॉ नरेंद्र कोहली के उपन्यास #शूर्पणखा का नाट्य रूपांतरण ज़फ़र संजरी ने किया है। इस नाट्यालेख में शूर्पणखा के संवाद काफ़ी रोचक हैं। बहुआयामी संवादों के ज़रिए यह नाटक आधुनिक परिदृश्य से अपना रिश्ता जोड़ लेता है। हफीज़ ख़ान,शकील अख़्तर का नाटक ‘हैलो शेक्सपियर’: ‘हैलो शेक्सपियर’ नाट्यालेख ख़ुद में एक महत्वपूर्ण दस्तावेज़ भी है। इसकी शुरुआत इस संवाद से होती है-  “यह दुनिया एक रंगमंच है और हम सभी सिर्फ़ एक पात्र। दुनिया के रंगमंच पर सभी का आना और जाना होता है। हर इंसान अपनी ज़िंदगी में कई भूमिकाएं निभाता है। यह राज़ समझ ना आया, कितना ब्रेन लगाया, इतना बड़ा क़िस्सागो आख़िर कहां से आया? साढ़े चार सौ साल बाद भी कालजई नाटककार विलियम शेक्सपियर (1564-1616) के रंगमंचीय योगदान पर दुनिया नतमस्तक है। शेक्सपियर के नाटकों में  इंसानी चरित्र की कमज़ोरियां ट्रेजडी की बड़ी वजह बन जाती है। हफ़ीज़ ख़ान और शकील अख़्तर ने इस आलेख में शेक्सपियर के छत्तीस नाटकों में से छ: प्रमुख ट्रेजडी नाटकों- किंग लियर, मैकबेथ, हैमलेट, रोमियो जूलियट, आथेलो और जूलियस सीजर के प्रमुख दृश्यों को बड़ी ख़ूबसूरती से आपस में जोड़कर इसे एक ऐतिहासिक नाटक की शक्ल दे दी है। स्कूल कॉलेज में शेक्सपियर को पढ़ने वाले छात्रों के लिए यह नाट्यालेख बहुत उपयोगी है। इस नाट्यालेख के ज़रिए शेक्सपियर की जीवनी और उनके संपूर्ण रचना संसार की भी एक झलक मिल जाती है।  इसमें खुद विलियम शेक्सपियर भी एक प्रमुख पात्र के रूप में मौजूद हैं। कुल मिलाकर हेलो शेक्सपियर कॉस्टयूम डिजाइन और साज सज्जा के बिना पेश किया जाने वाला एक प्रयोग धर्मी नाटक है।जलता हुआ दिया मगर रोशनी नहीं: मुंबई के हिंदी रंगमंच की दशा और दिशा पर शशांक दुबे का शोधपरक आलेख एक महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ है। मुंबई महानगर के प्रमुख रंग समूहों और उनके प्रमुख नाटकों का ज़िक्र करते हुए शशांक नाटकों की वर्तमान स्थिति का आकलन करते हैं और इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि जलता हुआ दिया हूं मगर रोशनी नहीं। हिंदी रंग परिदृश्य और नाट्यालेखन पर हृषिकेश सुलभ का महत्वपूर्ण आलेख मौजूदा रंगकर्म से जुड़े कई अहम् मुद्दे लेकर कर सामने आया है। आज़ादी के बाद जिन रचनाकारों ने नाटक और रंगमंच को अपने सृजन से समृद्ध किया उनके योगदान को उन्होंने रेखांकित किया है। साहित्य की विभिन्न विधाओं के समानांतर नाटक की यात्रा का आकलन भी उन्होंने पेश किया है।
नये नाटक निर्देशकों के दंभ का शिकार : हिंदी साहित्यकार नाट्यालेखन के प्रति उदासीन क्यों हैं? इसकी पड़ताल करते हुए सुलभ जी इस मुद्दे पर पहुंचते हैं कि रंगमंच के क्षेत्र में निर्देशक का दंभ और दख़ल ज़रूरत से ज़्यादा है। लेखक को दूसरे दर्जे की नागरिकता देकर निर्देशक अपना वर्चस्व स्थापित करना चाहता है। इससे कई साहित्यकारों ने नाट्यालेखन से तौबा कर ली है। यदि रंगमंच को जीवंत रखना है तो नये नाटकों का मंचन करना ही होगा। सुलभ जी के अनुसार आज अधिकांश निर्देशक परियोजना आधारित रंगकर्म कर रहे हैं। आनन-फ़ानन में कुछ भी मंचित कर धन सहेज लेने की प्रवृत्ति भी कुछ निर्देशकों को नाटककार बनने के लिए विवश करती है। यह एक गैर रचनात्मक और भयावह स्थिति है। हिंदी रंगमंच को इससे उबरना होगा। नाट्यालेख प्रसंग पर ऐसी अद्भुत सामग्री उपलब्ध कराने के लिए प्रधान संपादक शाखा बंद्योपाध्याय, संपादक डॉ उषा बनर्जी, संपादकीय सहयोगी कुमार अनुपम और पूरी टीम को बहुत-बहुत बधाई।

‘कला वसुधा’ का वेब अंक आप www.notnul पर पढ़ सकते हैं। प्रिंट पत्रिका मंगाने के लिए निम्नलिखित पते पर संपर्क करें – संपादक : कला वसुधा त्रैमासिक, सांझी-प्रिया, बी-8, डिफेंस कॉलोनी, तेली बाग़, लखनऊ -226029+918052557608, +919889835202 ई मेल: kalavasudha01@gmail.com 

 

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