विनय उपाध्याय,इंदौर स्टूडियो। दिल्ली के राष्ट्रीय गांधी संग्रहालय में विश्व संग्रहालय दिवस पर बापू की जि़ंदगी के मुख्तलिफ़ मकामों को पेश करती एक प्रर्दशनी का आगाज़ हुआ है। इस प्रदर्शनी में गांधी के जीवन से वाबस्ता पचास घटना-प्रसंगों का यह लेखा-जोखा पत्थरों से बनी कलाकृतियों में नुमाया है। ख़ामोश पत्थरों में मोहनदास करमचन्द्र गांधी के नक़्श तराशने और उनकी आवाज़ों को लौटाने का नायाब करिश्मा अनिता दुबे के हुनर का नतीजा है। आज़ादी के अमृत काल में यह भारत की एक बेटी का महात्मा के मस्तक पर कृतज्ञता का मंगल तिलक है। 18 मई से लगभग पाँच महीनों तक जारी रहने वाली इस प्रदर्शनी है- ‘महात्मा गांधी: स्टोरीज़ थ्रू स्टोन्स’।
अनिता दुबे की अनथक तपस्या: दिल्ली के राजघाट स्थित संग्रहालय की वीथिका में गुजि़श्ता बरसों में गांधी की आभा ने अनेक रूप रचे हैं लेकिन प्रस्तर कला की यह पहली बानगी है। इस अद्वितीय सृजन के पीछे अनिता की अनथक तपस्या है। पत्थरों की तलाश में बरसों से बांवरी-सी भटकती उनकी रूह, अक्सर बेजान से बिखरे टुकड़ों में कोई धड़कता सा अहसास सुनती और उन्हें थाम लेती। यूँ किसिम-किसिम के पत्थरों का जखीरा जमा होता रहा। नहीं मालूम था कि इन रंग-बिरंगे, बेडौल-सुडौल, चिकने और खुरदुरे पत्थरों से सुनी-अनसुनी कहानियाँ बोल उठेंगी। गांधी की यह गौरव गाथा इसी यात्रा का एक सुनहरा सोपान है।
कलाकृतियों से अतीत की सैर: कलाकृतियों की इस बस्ती में बापू की उंगली थामे अतीत की सैर की जा सकती है। उनके जन्म से लेकर हे राम! की अंतिम पुकार तक लगभग पचास पड़ाव हैं। घटनाओं से जुड़े प्रामाणिक संदर्भ जुटाने के लिए अनिता ने अनेक दस्तावेज़ खंगाले। रचनात्मक मानस तैयार किया। प्रसंगानुकूल पत्थरों में उनके चित्रण की परिकल्पना की। बापू की बदलती आयु, उनका भाव-मुद्राएँ, उनकी वेश-भूषा, लाठी, चप्पल, चश्मा, टोपी, घड़ी और चरखे को क्रमबद्ध घटनाओं के तारतम्य में फ्रेम करना बड़ी चुनौती थी। इन प्रतीकों के लिए विभिन्न आकारों के न केवल पत्थर बल्कि सहायक सामग्री के बतौर तुलसी के पौधे की सूखी शाखें, बाँस के तिनके, धागे, सूखे पत्ते आदि का इस्तेमाल किया।
पोर्ट्रेट सिरीज़ के समय आया विचार: गांधी की छवियों का यह सुंदर परिवेश रचने की बुनियाद अनिता के मन में तब पड़ी जब वे भारत की विभूतियों के पोर्ट्रेट की श्रृंखला पर काम कर रही थी। इस सिलसिले में कुछ माह पहले उन्होंने ‘मूड्स ऑफ गांधी’ पोर्ट्रेट बनाया। इस दौरान उन्हें लगा कि गांधी की इबारत को महज़ एक पोर्ट्रेट में नहीं रचा जा सकता। उनके महान हस्ताक्षर को अनेक कोटियों में देखा-समझा जाना चाहिए। यही वो प्रस्थान बिंदु था जिसने अनिता को नयी तरह से बेचैन किया। किश्त-दर-किश्त वे स्वाधीनता के इस महानायक को सिरजती रही। 
‘विश्वरंग’ भोपाल में लगी थी पहली प्रदर्शनी: नवंबर 2022 में उनकी ये कलाकृतियाँ साहित्य और कलाओं के अंतरराष्ट्रीय महोत्सव ‘विश्वरंग’ (भोपाल) में प्रदर्शित हुईं। टैगोर विश्वविद्यालय के इस जलसे में देश-विदेश से आये मेहमानों और दर्शकों ने गांधी को कला के एक नए माध्यम में ढलते देखा था। पहचान और प्रसिद्धि ने यहाँ से पंख पसारे। अनिता की फ़नकारी का यह नवोन्मेष था। इस प्रोत्साहन से दृष्टि को विस्तार मिला। गांधी के गुमशुदा पहलुओं को जानने की तिश्नगी बढ़ती गयी। नए घटना-प्रसंग जुड़ते गये। फेहरिस्त में इज़ाफा हुआ। आँकड़ा आधा सैकड़ा तक जा पहुँचा।
आज वो बापू कहाँ हैं: इन कलाकृतियों को निहारते हुए स्वाभाविक ही अनिता दुबे की कला यात्रा को जानने की उत्कंठा भी जागती है। प्रस्तरकला से गांधी कथा उकेरने की भी एक कहानी है। पत्थर चुनते समय उन्हें यह नहीं मालूम था कि इनका उपयोग वे गांधी कथा कहने में करेंगी। गोल, चिकने, खुरदुरे, काले, लाल सफेद सभी एक साथ बीनकर अपनी मुट्ठी मजबूत करती रही। इस बीच अख़बार में गांधीजी पर एक आलेख के शीर्षक ने उनके भीतर गांधी दर्शन पर सोचने की प्रेरणा जगाई। सोचा- राष्ट्रपिता यदि आज होते तो क्या होता? राजनीति, समाज, धर्म, विज्ञान, शिक्षा, युद्ध आदि के साथ बापू का अपना चिंतन और प्रयोग था। लेकिन आज बापू कहाँ हैं?
पत्थरों से दांडी यात्रा का चित्रण: तभी दांडी यात्रा (12 मार्च) की याद कैलेण्डर ने दिलाई और अनिता ने अपने संग्रह के पत्थरों से दांडी यात्रा को चित्रित किया। फिर से गांधी जी को तसल्ली से पढ़ना शुरू किया। गांधी कथा कहने का विचार जागा और तब क्रमबद्ध घटनाओं को प्रस्तर से प्रस्तुत किया। यहाँ गांधीजी के तीन बंदरों का उल्लेख बहुत ही प्रासंगिक है। एक है – मिजारु, जो बुरा नहीं देखता। दूसरा है- किकाजारु, जो बुरा नहीं सुनता और तीसरा है- इवाजारू, जो बुरा नहीं कहता। चीन के प्रतिनिधियों ने गांधी जी से मुलाकात के दौरान उन्हें इसे भेंट किया था जो जापान की संस्कृति में बुद्धिमान बंदर के रूप में भी प्रसिद्ध है। गांधी जी को ये बंदर बहुत प्रिय थे।
हर प्रसंग वाले महात्मा गाँधी: प्रदर्शनी से गुजरते हुए बालक गांधी, छात्र गांधी, कस्तूरबा के साथ शादी, बैरिस्टर गांधी, अफ्रीका में रेल यात्रा, कस्तूरबा का अफ्रीका में साथ, सत्याग्रही गांधी, गांधी जी कस्तूरबा की स्वदेश वापसी, चंपारण पहला आंदोलन, गुजरात खेड़ा आंदोलन काठियावाड़ी परिधान, अहमदाबाद मिल भूख हड़ताल, गांधी जी का प्रिय चरखा, टैगोर और गांधी जी, महात्मा गांधी विचार, साबरमती आश्रम, साइकिल चलाते गांधी, असहयोग आंदोलन, विदेशी सामान का बहिष्कार, गांधी जी के तीन बंदर, लाठी और लड़का, वैज्ञानिक गांधी, दांडी यात्रा, नमक सत्याग्रह आदि शीर्षक कृतियाँ बरबस ही ध्यान खींचती हैं। (लेखक विनय उपाध्याय वरिष्ठ पत्रकार, कला समीक्षक और उदघोषक हैं। कला, साहित्य और सांस्कृतिक आयोजनों पर निरंतर अपने लेखन और रिपोर्ट्स के लिये पहचाने जाते हैं।) आगे पढ़िये –
बेजान पत्थरों में बापू: महात्मा के मस्तक पर कृतज्ञता का तिलक
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