शकील अख़्तर, इंदौर स्टूडियो। ‘माँ…मुझे आप और पापा, दोनों चाहिये। मैं आप दोनों के बिना नहीं रह सकती’। …16 साल की मेघा अपनी माँ को वीडियो कॉल पर जब यह कहती है, तब अपने बेवफ़ा पति से ‘तलाक’ लेने जा रही माँ; अपनी बेटी के लिये समझौता करने को मजबूर हो जाती है। मगर उसे इस बात का यक़ीन नहीं है कि उसका पति भविष्य में उसे फिर से धोखा नहीं देगा, इसीलिये वह दर्शकों से पूछती है…कि आप ही बताइये मैं क्या करूँ? अपनी शादी का रिश्ता बनाये रखूँ या फिर इसे तोड़ दूँ।’ … 22 वें भारत रंग महोत्सव में मंचित यह था नाटक -‘जब वी सेपरेटेड’। प्रख्यात अभिनेता राकेश बेदी के लिखे और निर्देशित इस नाटक का यह 50 वाँ सुपर शो था। इसमें हरलीन कौर रेखी और राहुल भूचर के साथ राकेश बेदी ने मुख्य रूप से अभिनय किया है। एक किरदार बैंक मैंनेजर बने सचिन जोशी का भी है। इस नाटक का मंचन दिल्ली के कमानी ऑटिडोरियम में हुआ।
प्रिया, संजय की जिंदगी में ‘वो’: यह नाटक प्रिया माहेश्वरी और संजय साहनी की प्रेम कहानी पर आधारित है। संजय पायलट है जो प्रिया की ख़ूबसूरती पर मर मिटता है। प्रिया को शादी के लिये मना लेने के बाद दोनों की शादीशुदा ज़िदंगी शुरू हो जाती है। मगर कहानी तब अलगाव के मोड़ पर पहुँचती है जब प्रिया एक दिन घर के बैडरूम में पति को एक एयर होस्टेस के साथ हम-बिस्तर होते देख लेती है। इस घटना के बाद अपने पति के लिये उसका हमेशा के लिये विश्वास टूट जाता है। बाद में उसे यह भी पता चलता है कि पति ने बैंक के लॉकर से सारे ज़ेवर भी निकाल लिये हैं। उसके बाद अब सेपरेशन यानी तलाक के अलावा कोई और चारा नही बचता।
मंच पर आख़िरी छह महीनों की जंग: मंच पर यह कहानी कोर्ट में तलाक की अर्जी दायर करने के बाद शुरू होती है। कोर्ट ने दोनों को छह महीने का समय दिया है। इन छह महीनों के दौरान दोनों के बीच टूटे प्रेम और पति की बेवफ़ाई को लेकर एक किस्म की जंग शुरू हो जाती है। दोनों एक ही घर में अब भी हैं। मगर बीच में एक दीवार खिंच चुकी है। बेटी होस्टल में रहकर पढ़ाई कर रही है। इस दरम्यान दोनों में वकील,साज़ो सामान,बेटी को अपने साथ रखने जैसी बातों को लेकर झगड़ों का दौर शुरू होता है। इसी दौरान दर्शकों को उनकी लव स्टोरी, शादी और फिर पति की बेवफाई का पता चलता है। अंत में प्रिया को यह भी पता चलता है कि उसका पति उस फ्लैट को भी बेचने जा रहा है जिसमें वे साथ रहते हैं। तनाव के इन मोर्चों के बीच दोनों को जोड़ने की अंतिम कड़ी बेटी मेघा बनती है। बेटी की कोशिशों की वजह से पति संजय को भी अपनी ग़लती का अहसास होता है। वह नये घर में पत्नी और बेटी दोनों के साथ शिफ्ट होना चाहता है।
हरलीन और राहुल का बेहतरीन अभिनय: कशमकश और पारिवारिक कलह से भरे इस नाटक में प्रिया की भूमिका में अभिनेत्री हरलीन कौर रेखी ने ज़बरदस्त अभिनय किया है। वे नाटक में प्रिया की मनोदशा को जीने लगती हैं। इसी तरह पति संजय के किरदार में राहुल भूचर भी कोई मौका नहीं चूकते। मंच पर दोनों में संवाद और अभिनय की जंग सी छिड़ जाती है। राहूल भूचर अपने निगेटिव किरदार के बावजूद दर्शकों के सामने ख़ुदको इस तरह प्रस्तुत करते हैं, जैसे कि वे पत्नी का शिकार बन गये हों। बहुत बार वे दर्शकों की सहानुभूति हासिल कर भी लेते हैं। कुछ जगहों पर अतिरेक को अगर छोड़ दें तो 2 घंटे के इस नाटक में दोनों अपने-अपने किरदारों को बेहद प्रभावशाली अभिनय करते हैं। इसमें हरलिन अपने किरदार की वजह से आगे निकल जाती हैं।
मैं इधर से गुज़र रहा था,सोचा मिलता चलूँ: नाटक का यह वो संवाद है जो पड़ौसी मोंटी मीठालाल का किरदार अदा करने वाले राकेश बेदी, अपनी हर एंट्री के वक्त कहते हैं। वे प्रिया और संजय के फ्लैट के सामने ही रहते हैं। मगर हर बार प्रिया के फ्लैट की डोर बेल बजाकर, यही कहते हैं कि मैं इधर से गुज़र रहा था, सोचा मिलता चलूँ। उनकी ऐसी हर एंट्री पर दर्शक जमकर ख़ुश होते हैं, तालियां बजाते हैं। उनके अभिनय को सैल्यूट करते हैं। मोंटी यानी राकेश बेदी दो बेटों के पिता हैं। उनके दोनों बेटे हांगकांग में रहते हैं। मोंटी अपने फ्लैट में अकेले रहते हैं। उनकी बेटी की एक शूटआउट में हत्या हो गई है। वे प्रिया में अपनी बेटी की झलक देखते हैं।
मोंटी के बार-बार आने को लेकर एतराज़: प्रिया के फ्लैट में मोंटी के बार-बार आने को लेकर संजय एतराज़ जताते हैं। उन्हें लगता है, वे बुरी नीयत से प्रिया से मिलने का बहाना ढूंढ रहे हैं। प्रिया भी यही समझ लेती है। वे बुज़ुर्ग मोंटी के डोर बेल बजाते ही उन्हें वापस भेज देना चाहती है। मगर यहीं पर राकेश बेदी के चरित्र की विंडबना भी सामने आती है। वे अपने बच्चों के बिना बेहद एकाकी जीवन, जी रहे हैं। वे चाहते हैं उनसे कोई बात करे। उनके घर पर आये-जाये। मगर सभी उन्हें नज़रअंदाज़ करते हैं, दूरी बरतते हैं। वे ये भी चाहते हैं प्रिया को संजय अच्छी तरह से रखें, न झगड़े हों, न शादी टूटे। अंत में पता चलता है जिस फ्लैट में वे अकेले रह रहे थे, वह फ्लैट उन्होंने अपने बेटों के नाम कर दिया था। दोनों ने फ्लैट को बेच दिया है। इस वजह ने उन्हें एक दिन वृद्ध आश्रम जाने को मजबूर होना पड़ता है।
‘फेलिसिटी थियेटर’ का पेशेवर प्रॉडक्शन: फेलिसिटी थियेटर के परमार्थिक लेकिन एक पेशेवर थियेटर कंपनी है। ज़्यादातर यह ग्रुप कर्मशियल थियेटर करता है। यही वजह थी कि नाटक अभिनय के साथ ही लाइट,साउंड और सैट के स्तर पर भी बेहद उत्कृष्ट था। नाटक का सैट किसी फ़िल्मी सैट से कम नहीं था। इस सैट का डिज़ाइन परेश दरू ने तैयार किया है लेकिन दिल्ली में इसका संयोजन मुजाहिद ने किया। ध्वनि और संगीत दोनों विकास रावत का और प्रकाश योजना योगेश केलकर की थी।
पहले श्वेता निभाती थीं प्रिया की भूमिका: नाटक के विषय में चर्चा करने पर राकेश बेदी ने बताया, यह नाटक लॉकडाउन से पहले 2018 -19 में शुरू किया था। तब से मुंबई सहित देश के कई शहरों में इसके शोज़ हो चुके हैं। पहले इस नाटक में प्रिया की भूमिका अभिनेत्री श्वेता तिवारी अदा करती थीं। उन्होंने 35 से अधिक शोज़ भी किये। परंतु उनकी व्यस्तता के बाद दूसरी अभिनेत्रियों ने काम करना शुरू किया। हरलीन कौर रेखी पिछले साल से इस शो में अभिनय कर रही हैं। वे अब तक करीब 10 शोज़ कर चुकी हैं। नाटक के अंत में फेलिसिटी थियेटर, मुंबई के प्रमुख और अभिनेता राहुल भूचर ने कहा, ‘हम बीते कुछ सालों से लगातार भारत रंग महोत्सव में अपने नाटकों को लाने की कोशिशें करते रहे हैं। मगर हमें पहली बार यह अवसर मिल सका। आगे पढ़ें – जब भारत रंग महोत्सव में ज़िंदा हुआ शायर जौन एलिया का किरदार –
‘भारंगम’ में राकेश बेदी के नाटक ‘जब वी सेपरेटेड’ का सुपर शो
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