Wednesday, May 13, 2026
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‘भारंगम’ में वर्चुअल और मशीनी ज़िदंगी का ‘रियलिटी चेक!’

शकील अख़्तर, इंदौर स्टूडियो। तेज़, ग्लोबल प्रतिस्पर्धी दुनिया ने इंसान को एक मशीन बनाकर रख दिया है। टीवी की दुनिया ने हमारी ज़िंदगी को निगल लिया है। घर में साथ रहते हुये भी परिवार में संवादहीनता की स्थिति है। किसी के पास किसी के लिये वक्त नहीं। आज के हालात की ‘रियलिटी’ को चेक करने पर मजबूर करता यह नाटक है –‘इसी दिन, इसी वक़्त’। इसे निर्देशित किया है प्रख्यात सिने और रंग निर्देशक कुमार सोहोनी ने। इसका विचारोत्तेजक लेखन किया है अभिराम भडकमकर ने। कुमार सोहोनी ने लेखक के बारे में कहा, ‘सन् 2000 में अभिराम जी ने यह नाटक लिख दिया था। उन्होंंने 20 साल पहले ही आज और आने वाली दुनिया को लेकर बहुत सी बातें लिख दी थीं। उन्होंने लिख दिया था कि नई ‘ग्लोबल दुनिया’ में लोग फोन पर एक-दूसरे को देखते हुये बात कर सकेंगे। टीवी के पात्र इंसानी ज़िदंगी को प्रभावित करने लगेंगे। सूचना की क्रांति लोगों के जीवन के लिये एक बड़ी समस्या बनकर सामने आयेगी।’  नाटक का प्रभावशाली ओपनिंग शो: 22 वें भारत रंग महोत्सव में इसका यह पहला प्रभावशाली ‘ओपनिंग शो’ हुआ। दिल्ली के कमानी ऑडिटोरियम में इस नाटक का मंचन हुआ। मंचन के बाद निर्देशक कुमार सोहोनी ने कहा -‘ 112 प्रॉडक्शन्स और कई नामी अभिनेताओं के साथ काम करने के बाद, यह मेरा पहला नाटक है जिसे मैंने नये कलाकारों के साथ बनाया है। मुझे ख़ुशी है कि इसे दिल्ली के दर्शकों ने लाजवाब रेस्पांस दिया है। यह मेरे लिये एक सुखद अनुभव है। नाटक में कहाँ लाफ्टर मिले, कहाँ पर दर्शकों को हमारी बात गहरे तक छू गई। हमें ख़ुद भी पहली बार इन बातों को देखने और समझने को मिला। यहाँ यह बताना ज़रूरी है कि एनएसडी 1979 बैच के ग्रेजुएट कुमार सोहोनी ने रंगकर्म के पचास नान स्टॉप बरस भी पूरे कर लिये हैं। दो पीढ़ियों की सामानांतर कहानी: यह नाटक मार्केटिंग का काम करने वाले सुरेंद्र,उनकी कामकाजी पत्नी अनघा, सहेली विशाखा और कॉलेज में इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने वाले बेटे मानस और उसकी गर्लफ्रेंड प्रिया कहानी है। बाकी कलाकार टीवी के पात्र हैं जो एक फिल्म स्क्रीन पर टीवी ऑन,ऑफ़ करने पर दिखाई देते हैं। इस तरह नाटक दो सामानांतर ट्रैक्स पर एकसाथ चलता है। पहले दृश्य से ही नाटक बताता है कि परिवार में सभी को टीवी देखना पसंद है। मगर सभी के अपनी पसंद के कार्यक्रम हैं। ऐसे कार्यक्रमों से दिन शुरू होता है। मगर यह वर्चुअल दुनिया कितनी अपनी बन पाती है, कितना काम आती है। यह आगे पता चलता है। दिनचर्या टीवी से शुरू, टीवी पर ख़त्म: सुबह-सुबह टीवी देखते हुये सुरेंद्र जैसे ही योगाभ्यास शुरू करता है। एक इन्फ्लूएंसर को पटाने के लिये बॉस का फोन आ जाता है। सुरेंद्र योग करना छोड़कर अपने बॉस के दिये टारगेट को एचिव करने के काम पर लग जाता है। पत्नी अनघा को अपने पसंदीदा सीरियल ‘सावित्री’ देखने की लत है। रोज़ाना ठीक साढ़े आठ बजे सहेली विशाखा के आते ही दोनों सीरियल देखने बैठ जाते हैं। पिता और माँ के ऑफिस जाने के बाद बेटा मानस सोकर उठता है। वह रिमोट से ऐसे कार्यक्रमों को सर्च करता है जिनमें पूछे गये सवालों के सही जवाब देने ही हज़ारों रूपये के ईनामों की बरसात हो।संवादहीनता और बिखरते रिश्तों का टकराव:  इस तरह टीवी की आभासी दुनिया और मशीनी जिंदगी के बीच परिवार में संवादहीनता की स्थिति है, बढ़ती दूरियों का टकराव है। पति को लगता है, वह घर के जिन लोगों के लिये जॉब में टिके रहने के लिये प्रतिस्पर्धी और मारकाट वाले हालात से जूझ रहा है, इसकी किसी को परवाह ही नहीं है। पत्नी को लगता है कि पति के पास ना वक्त है, ना उसकी भावनाओं की क़द्र। बेटे को लगता हैं, मम्मी-पापा ने उसकी सुनते नहीं। यहाँ तक कि उसकी प्रेमिका प्रिया भी। प्रिया कहती है, तुम जो चाहे कर लो। मगर प्यार और शादी के कमिटमेंट की बात मत करो। प्रिया ख़ुद भी एक वर्चुअल दुनिया की आगोश में है। अमेरिका में रहने वाले एक अनजाने मर्द से चैटिंग’ करते-करते उसे प्यार हो गया है। इस तरह यह कहानी आज के हालात की तस्वीर उजागर करती आगे बढ़ती है। टीवी में गुमशुदा हुये पात्रों की तलाश:  परिवार को बड़ा झटका तब लगता है जब प्रिया के शादी से इनकार कर देने और ब्रेकअप हो जाने के बाद, मानस घर छोड़कर चला जाता है। यहीं पर नाटक का अंत आता है। पता चलता है कि घर में, माँ और पिता के पास अपने बेटे के दोस्तों के नंबर तक नहीं हैं। अब बेटे की खोज के लिये भी एक टीवी के कार्यक्रम ‘गुमशुदा की तलाश’ का सहारा लिया जाता है। उस प्रोग्राम में बेटे के बारे में सूचना तो प्रसारित होती ही है। एक-एक करके ख़ुद सुरेंद्र,अनघा,विशाखा के भी गुम हो जाने की ख़बरें प्रसारित होती है। इस तरह नाटक बताता है कि ये लोग दुनिया में होकर भी नहीं है। इस मशीनी और टीवी जैसे माध्यमों से जन्मी वर्चुअल दुनिया में कहीं गुम हो गये हैं। रियल और वर्चुअल पात्रों का कमाल अभिनय: नाटक में स्क्रीन पर दिखाई देने वाले टीवी पात्रों का अभिनय जितना सशक्त था उतना ही मंच पर अभिनय करने वाले पात्रों का अभिनय। शो में दिखाये गये टीवी प्रोग्राम पहले से ही फ़िल्मांकित कर प्रस्तुति में रखे गये हैं। यद्धपि पूरी प्रस्तुति में पात्रों के साथ टीवी कार्यक्रमों और आपसी प्रतिक्रियाओं के तालमेल और टाइमिंग का ज़बरदस्त तालमेल था। इसी से जुड़े संगीत और प्रकाश की योजना थी। मंच को भी एक फ्लैट की शक्ल में एक्ट के हिसाब से तीन हिस्सों में बाँटा गया था। जबकि हर एक्ट के अंत में ऐसा भावनात्मक संवाद या प्रश्न था, जो दर्शकों को सीन के कट होते ही तालियां बजाने और सोचने पर मजबूर कर रहा था।रियल और वर्चुअल पात्रों का कमाल अभिनय: नाटक में स्क्रीन पर दिखाई देने वाले टीवी पात्रों का अभिनय जितना सशक्त था उतना ही मंच पर अभिनय करने वाले पात्रों का अभिनय। शो में दिखाये गये टीवी प्रोग्राम पहले से ही फ़िल्मांकित कर प्रस्तुति में रखे गये हैं। यद्धपि पूरी प्रस्तुति में पात्रों के साथ टीवी कार्यक्रमों और आपसी प्रतिक्रियाओं के तालमेल और टाइमिंग का ज़बरदस्त समनवयन था। इसी से जुड़े संगीत और प्रकाश की योजना थी। एकदम नये कलाकारों के साथ निर्माण: निर्देशक कुमार सोहोनी ने नाटक के बाद बताया – ‘इस नाटक में काम करने वाले कलाकार नये हैं, सभी मुंबई यूनिवर्सिटी के नये ड्रामा ग्रेजुएट्स हैं। इनमें सुरेंद्र,अनघा,विशाखा,मानस और प्रिया के पात्रों का अभिनय करने वाले कलाकारों के नाम हैं – सुरभि बर्वे, प्रसाद माली, अनुज प्रभु, श्रद्धा पोखरणकर और अंकिता नरवेणकर। टीवी के पात्रों का अभिनय करने वाले कलाकार हैं- वरदा सालुनके, ललिता अमृतकर, श्रीपाद जोशी, पल्लवी प्रधान, युगंधरा वलसाँगकर, शुभम जीते, नेहा थाटे, प्रशस्ति जावखेड़कर, श्रद्धा सोहोनी और पल्लवी प्रधान। नाटक का संगीत – श्रद्धा सोहोनी और आनंद जोशी ने संयोजित किया। नाटक के अंत में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की तरफ़ से वरिष्ठ कला समीक्षक रवींद्र त्रिपाठी ने निर्देशक कुमार सोहोनी का गुलदस्ता भेंट का अभिनंदन किया। आगे पढ़िये – ‘भारंगम’ में राकेश बेदी के नाटक जब वी सेपरेटेड का सुपर शो!

‘भारंगम’ में राकेश बेदी के नाटक ‘जब वी सेपरेटेड’ का सुपर शो

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