इंदौर, इंदौर स्टुडियो डॉट कॉम। परिस्थितियों से मानवीय रिश्तों की मधुरता का ताना-बाना छिन्न-भिन्न न हो ये निर्भर करता है कि रिश्तों को जीने की हमारी समझ-बूझ कितनी है। “जिसने लाहौर नहीं देखा उसने कुछ नहीं देखा” भारत-पाक विभाजन के ऐसे ही अनछुए पहलुओं की प्रस्तुति है।

विभाजन की त्रासदी झेलते हुए लखनऊ से लाहौर पहुंचे मिर्ज़ा फहीम बेग को रतनलाल जौहरी की 22 कमरों की हवेली अलाट होती है। जौहरी परिवार की बुजुर्ग माई वहां से निकलने को तैयार नहीं है। माई के रूप में विजयता सरल के परिपक्व अभिनय ने दर्शकों को बांधे रखा। सिकंदर मिर्ज़ा साहब की बेगम (फातेमा आरिफ) और बेटी की सूझबूझ से और माई के ममतामयी व्यवहार से कैसे विपरीत परिस्थितियों में भी मधुरता कायम हो जाती है और कैसे माई सारे लाहौर की चहेती हो जाती है।



