Wednesday, August 19, 2026
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भारत रंग महोत्सव में दर्शकों ने परफॉर्म किया ‘वेलकम ज़िदंगी’!!

शकील अख़्तर, इंदौर स्टूडियो। गुजराती नाटकों के प्रख्यात लेखक, निर्देशक, कवि और अभिनेता सौम्य जे. जोशी का लिखा यह एक सिद्ध नाटक है ‘वेलकम ज़िदंगी’। 22वें भारत रंग महोत्सव में इसका ‘सीमाचिन्ह’ मंचन हुआ। कमानी ऑडिटोरियम में नाटक के बाद, काफ़ी देर तक दर्शक तालियाँ बजाते रहे। इन तालियों से अभीभूत सौम्य जोशी को कहना पड़ा -‘ ये तालियां बरसों तक हमारे दिलो-दिमाग़ में गूँजती रहेंगी। हमने सुना था कि नाटक को फिफ्टी परसेंट कलाकार परफॉर्म करते हैं, बाक़ी फिफ्टी परसेंट दर्शक। आज हमने यह देख भी लिया और महसूस भी कर लिया! बाप-बेटे में नहीं हुई 14 साल से बात: यह नाटक मूल रूप से उस पिता और बेटे पर केंद्रित है जिनमें पिछले 14 साल से बात नहीं हुई। इस अबोलेपन का असर उनके परिवार पर कितना भारी पड़ता है, ‘वेलकम ज़िदंगी’ में यही दिखाया गया है। सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक धरातल पर चलने वाले इस नाटक में तीखे-तर्कपूर्ण संवाद, दमदार और मँजा अभिनय; प्रेक्षागृह में ऐसा माहौल निर्मित कर देते हैं कि दर्शक ख़ुद नाटक का हिस्सा बन जाते हैं। वे कभी तालियाँ बजाते हैं, कभी हँसते हैं और कभी सन्नाटे में चले जाते हैं। यह नाटक मुंबई के ‘नाइन लाइव्स इंटरटेनमेंट’ की प्रस्तुति रही। मैट्रो के मेहनतकश क्लर्क की कहानी: नाटक मुंबई के उस मेहनती क्लर्क की कहानी है जो सुबह 6 बजकर 20 मिनट की ट्रेन पकड़कर ऑफिस चला जाता है, शाम ढल जाने के बाद थका-हारा घर लौटकर आता है। नाम है अरूण गनात्रा। उनकी पत्नी भानु गनात्रा और बेटा विवेक है। एक सोसायटी की ऊपरी मंज़िल पर रहने वाला यह परिवार किसी आम मध्यम वर्गीय परिवार की तरह ही है। क्लर्क पिता, अपने संघर्षपूर्ण अतीत की यादों से चिपके हैं और वे जल्द रिटायर होने वाले हैं। बेटा एमबीए कर चुका है और वह नौकरी की जगह अपना बिज़नेस शुरू करना चाहता है। बाप-बेटे के इस अबोलेपन में माँ दोनों के बीच संवाद का ‘ब्रिज’ हैं। बिज़नेस के लिये चाहिये 4 लाख: पिता और बेटे के रिश्ते में स्थिति तब तनाव में तब्दील हो जाती है, जब बेटा पिता से चार लाख रूपये की माँग कर बैठता है। वह भी तब, जब माँ इस मामले में हाथ खड़े कर देती है। वह विवेक से कहती है- ‘बेटा ये बात तो तुझे ही करनी पड़ेगी, ये पैसे का मामला है। इस मामले में मैं बीच में नहीं पड़ सकती’। बेटे के कहने पर पिता ‘बिज़नेस प्लान’ की फाइल बेटे से लाने को कहते हैं। मगर बेटे के फाइल देने के आठ दिन बाद तक उसे पलटकर नहीं देखते। ऐसे में दोनों के बीच तनातनी बढ़ जाती है और पिता के अर्निणय की वजह से उलझे बेटे का भविष्य अधर में लटक जाता है। औपचारिकताएं पूरी न कर पाने की स्तिथि में बेटा आख़िरकार, बिज़नेस न करने का फैसला कर लेता है।ज़िंदा हुई मन के अँधेरों की तस्वीर: इस बीच बेटे विवेक के अंतरमन में बैठी पिता की एक खलनायक जैसी तस्वीर ज़िंदा हो जाती है जो सच्ची नहीं है। पिता को बेटे की इस समझ का तब बड़ा झटका लगता है जब उनका प्यारा बेटा विवेक घर छोड़कर चला जाता है।.. और फिर नाटक उस मोड़ पर पहुंचता है, जब पिता के रिटायरमेंट का दिन आ चुका है। पिता उस दिन के लिये एक ऐसी ‘स्पीच’ तैयार करते हैं जो नौकरी में बिज़ी रहने वाले पिताओं के नाम है। इसी स्पीच में छिपा है ‘वेलकम ज़िदंगी’ का सच्चा संदेश!अभिनय ने दी नाटक को बुलंदी: तीन पात्रों वाले इस नाटक में सौम्य जोशी, क्लर्क पिता के रूप में कमाल का अभिनय करते हैं। माँ के रूप में जिज्ञा व्यास भी दर्शकों पर पहले सीन से ही छा जाती हैं। बाप-बेटे के बीच वे अपने संतुलित अभिनय से ऐसा किरदार रचती हैं कि दर्शक उनके हर हाव-भाव की कठपुतली बन जाते हैं। नाटक में वे एक सूत्रधार की भूमिका भी निभाती हैं। इसी तरह बेटे के रूप में अभिनय बैंकर भी अपने चरित्र की गहरी छाप छोड़ जाते हैं। वे पिता के स्वभाव,अपनी परिस्थिति और ख़ुद से संघर्ष करते हुए एक ऐसे बेटे के रूप में सामने आते हैं, जो माँ की क़द्र करता है, पिता से अलगाव महूसस करते हुये भी असल में उनसे प्यार करता है। तीनों का चारित्रिक समन्वयन नाटक को शिखर पर ले जाता है। यहीं पर लेखक,अभिनेता सौम्य जे. जोशी के निर्देशन की सफलता सिद्ध होती है। खिड़की से नज़र आती तेज़ बारिश: वन बैड रूम किचन वाला फ्लैट, खिड़की के बाहर नज़र आती मुंबई की तेज़ बारिश, फ्लैट के अंदर बना वॉश बेसिन। इस मंच सज्जा और सैट ने दर्शकों का बार-बार ध्यान खींचा। रेल पटरियों पर दौड़ता फ़िल्मी टच वाला संगीत, बढ़िया टाइमिंग नाटक की दूसरी ख़ूबियां रहीं। कहने को नाटक बेहद गंभीर है, मगर इसमें हँसने-हँसाने की भी भरपूर गुंजाइश रखी गई। इसमें माँ बनी जिज्ञा व्यास की अदाकारी लाजवाब रही। वेलकम ज़िदंगी का 974 वां मंचन: नाटक के बाद सौम्य जोशी ने कहा, ‘दिल्ली में ‘वेलकम’ का यह 974 वां शो था। इससे पहले जितने भी मंचन हुये वे सब गुजराती भाषा में थे। भारत रंग महोत्सव में पहली बार हमने हिन्दी में इस नाटक को प्रस्तुत किया। हालांकि हिन्दी अनुवाद को लेकर हम कुछ फिक्र में थे। मगर दर्शकों ने जिस तरह से इस नाटक को पसंद किया। उसने हमें नया हौसला दिया है। 23 फरवरी की शाम, 22वें भारत रंग महोत्सव के तहत, दिल्ली चैप्टर की यह समापन प्रस्तुति रही। नाटक के अंत में संगीत नाटक अकादमी में ड्रामा विभाग के डिप्टी सेक्रेटरी और कथक केंद्र के डायरेक्टर सुमन कुमार ने कलाकारों का गुलदस्ता भेंट कर अभिनंदन किया। साथ ही नाटक की यादगार प्रस्तुति की बड़ी सराहना की। आगे पढ़ें – ‘भारंगम’ में वर्चुअल और मशीनी ज़िदंगी का रियलिटी चेक! सं ने कही।

‘भारंगम’ में वर्चुअल और मशीनी ज़िदंगी का ‘रियलिटी चेक!’

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