शकील अख़्तर, इंदौर स्टूडियो। ‘तुम मेरे इल्म को ज़रूर अपनाओ, मगर मेरे शौक को मत अपनाओ’। …. सिगरेट और शराब को लबों से लगाये रखने वाले, अलग लहजे और शायरी वाले जौन एलिया के किरदार को मंच पर जीते हुये धर्मेंद्र साँगवान जब ये बात कहते हैं, तब दर्शक उनकी इस सलाह को इस तरह तस्लीम करते हैं जैसे ख़ुद जॉन एलिया उनसे मुख़ातिब हों! ….22 वें भारत रंग महोत्सव, दिल्ली में प्रस्तुत यह था उर्दू नाटक – ‘जौन एलिया का जिन’। इरशाद ख़ान सिकंदर लिखित और रणजीत कपूर निर्देशित इस नाटक का श्रीराम सेंटर में मंचन किया गया। दिल्ली के सक्षम सोसाइटी ऑफ आर्ट एंड कल्चर ने इसे प्रस्तुत किया।
दर्शक जीने लगे जॉन का क़िरदार: इस कमाल नाटक की सबसे बड़ी ख़ूबी ये थी कि दर्शक, जौन एलिया के क़िरदार से अपना दिली रिश्ता कायम कर चुके थे। शराब को ज़हर बताकर पीने वाले जौन एलिया के हर बयान को अंदर तक महूसस कर रहे थे। ऐसी स्थिति नाटक में तब आती है जब दर्शक क़िरदार को कलाकारों के साथ ख़ुद भी जीने लगें। स्थिति ये थी कि जब धर्मेंद्र साँगवान, बिख़रे लंबे बालों वाले इस शायर के किसी शे’र का पहला मिसरा पढ़ते, बहुत से दर्शक उसके अगले मिसरे को दोहराने लगते।
शर्म दहशत झिझक परेशानी
नाज़ से काम क्यूँ नहीं लेतीं
आप वो जी मगर ये सब क्या है
तुम मेरा नाम क्यूँ नहीं लेतीं
जौन एलिया का जैसे पहले से था इंतज़ार: दर्शकों की फौरी प्रतिक्रिया से ऐसा भी लगा कि जैसे दर्शकों को जौन एलिया के इस तरह के नाटक का बहुत पहले से इंतज़ार था। एक क़िस्म से इस शायर के लिये एक रूहानी प्यास महसूस कर रहे थे। इस शायर के बारे में जानना चाहते थे कि आख़िर ये अजीब सा शख़्स है कौन? उनकी शायरी में इतनी तड़प, उदासी, तल्ख़ी, बेचैनी क्यों है ? क्योंकर इस शायर को इश्क़ भी है और ख़बूसूरत हसीनाओं से दुश्मनी भी। क्यों इस शायर को दुनिया बस ज़िदंगी तबाह करने की बस्ती लगती है। जहाँ रहते हुये उसे कभी नींद नहीं आती।
एक ही तो हवस रही है हमें
अपनी हालत तबाह की जाये
* * * *
बेक़रारी सी बे-क़रारी है
वस्ल है और फ़िराक़ तारी है
जो गुज़ारी न जा सकी हम से
हमने वो ज़िंदगी गुज़ारी है
बंटवारे का दर्द और पाकिस्तान में रहगुज़र: यह नाटक जौन एलिया के संदर्भ में दर्शकों को उनके बहुत से सवालों का जवाब भी देता है। उनकी ज़िदंगी और अदबी दुनिया से काफ़ी हद तक वाकिफ़ कराता है। बताता है कि उनका असली नाम सैयद जौन असगर था। उनका जन्म 14 सितंबर 1931 को यूपी के अमरोहा में हुआ। उनके पिता सैयद अल्लामा शफ़ीक़ हसन एलिया, एक एस्ट्रोनॉमर और भाषाविद् थे। घर में सबसे छोटे जौन ने आठ साल की उम्र में ही अपना पहले शे’र कहा था। नौजवानी के दिनों में ही ‘ख़ूनी खंजर’ नाटक लिखा और अभिनीत किया। वे विभाजन के ख़िलाफ़ थे मगर बंटवारे के बाद 1957 में अपने प्यारे अमरोहा को छोड़कर उन्हें कराची, पाकिस्तान जाना पड़ा। पाकिस्तान जाकर भी दिल हिंदुस्तान में ही रहा। कराची में जाने के बाद जल्द ही वे अदबी हलकों में लोकप्रिय हो गये। तककरीबन 60 साल की उम्र में जाकर उनका पहला संकलन प्रकाशित हो सका। आज पूरी दुनिया में इस महान् शायर को सबसे ज़्यादा पढ़ा,देखा और सुना जाता है।
नाटक में अमरोहा का ख़ानदानी जिन: ज़ाहिर है कि नाटक में तथ्यों से कहीं कोई छेड़छाड़ नहीं की गई है परंतु क्रियेटिव लिबर्टी के लिये नाटक की प्रस्तुति में एक जिन का क़िरदार रचा गया है। यह जौन का एक ख़ानदानी जिन है, लिहाजा वह इस शायर के अतीत की कड़ी बनता है जो अमरोहा से जुड़ी उनकी ज़िदंगी के बारे में बताता है। उनकी ख़िदमत में शराब और सिगरेट का इंतज़ाम भी करता है। जबकि जौन एलिया का मंच पर अवतरण कराची में उनकी क़ब्र से होता है। नाटक उसी क़ब्रिस्तान में घटित होता है। यहाँ जौन, रोशनी और शोर से दूर अपने नये मकाँ में गुज़रे दौर को याद करते हैं। उन्हें अपने वालिद-वालदा,बहनें,बीवी,बेटी,बच्चे याद आते हैं। अपने भाई के क़त्ल का मंज़र याद आता है। तलाकशुदा एकाकी ज़िदंगी याद आती है। माँ-भाभी,भतीजी से मनो-संवाद होता है। इस तरह नाटक में जौन एलिया, मन और अवचेतन के एनकाउंटर के ज़रिये अपनी तबाह ज़िदंगी के बेबस,बर्बाद हालात और बेदिल दौर से गुज़रते हैं। अपने हालात बयान करते हैं।
मुस्तिकल बोलता ही रहता हूँ
इतना ख़ामोश हूँ मैं अंदर से
मीर,ग़ालिब,मंटो की नाटक में एंट्री: जौन एलिया को क़ब्रिस्तान में उर्दू अदब और शायरी के दिग्गज भी याद आते हैं। वे उनकी रूहों से मुलाक़ात करते हैं। इनमें मीर तक़ी मीर,ग़ालिब,सआदत हसन मंटो और उस्ताद मुसहफ़ी साहब भी पहुंचते हैं। चूँकि ये जौन के मन की एक ‘अन्तर-दशा’ है इसलिये साथ रहकर भी ‘जिन’ को ये शायर दिखाई नहीं देते। जब अपने काल विशेष के शायर मिलते हैं तब उनके अलग क़िरदारों और मिज़ाज का टकराव भी होता है। मंटो, मीर, गालिब और उस्ताद मसहफ़ी से जुड़े ऐतिहासिक तथ्यों और अदबी सलाहियतों को लेकर एक रस्साकशी शुरू हो जाती है। यह सबकुछ नाटक में नई रोचकता का रंग भर देता है। नाटक में उर्दू के प्रति शायर की आसक्ति को भी दर्शाया गया है। बल्कि एक जगह वे कहते हैं कि हम शायर या अदीब ही लफ्ज़ के रचियता और उसके अंतिम टीकाकार है।
जहनी क़ैफियत के मुताबिक संवाद: नाटक में जौन के मक़बूल शे’रो को रखा ही गया है। संवादों में उनकी जहनी क़ैफियत के मुताबिक, संवादों को भी रचा गया है। ऐसे में कहीं-कहीं वे अपनी ‘रौ’ में अपशब्दों का भी इस्तेमाल करते हैं। परंतु दर्शकों ने क़िरदार के अनुरूप ही उस खुन्नस को कुबूल किया है। वे तालियां बजाकर या हँसकर उस स्थिति विशेष पर महसूस कराते हैं कि – ‘हां, एकदम सही कहा’। नाटक में सभी ने अपने-अपने स्तर पर सराहनीय काम किया है। मगर विशेषकर हमें जौन एलिया के साथ ही जिन, मंटो, मीर, शहाना जैसे क़िरदार निभाने वाले कलाकार याद रह जाते हैं। नाटक में धर्मेंद्र साँगवान ने जौन एलिया के मुख्य किरदार को जीवंत किया है, वहीं उनके साथ विक्रमादित्य पाण्डेय (ज़ालिमीन जिन्न), सुनील रावत (सआदत हसन मंटो), शहाना एलिया (कोमल मुंशी),मीर तक़ी मीर (सत्यम तिवारी),गुलाम हमदानी मुसहफी (रितेश यादव) मिर्ज़ा गालिब (भूपेंदर), माँ (रश्मि सिंह), भाभी (अक्सा परवीन) रक्कासा (तरूणा कांडपाल) ने सराहनीय काम किया है। नेपथ्य में सहयोग क्रमश: शेर सिंह (रूप सज्जा), रश्मि सिह,आर्यन चौधरी (वेशभूषा), अशोक सागर भगत (प्रकाश परिकल्पना), मंच सामग्री (सुनील रावत,आर्यन चौधरी,रणविजय झा), ध्वनि परिकल्पना (सैंडी) का रहा।
परदे के पीछे नाटक का असली नायक : पूरे नाटक में अपनी स्क्रिप्ट की वजह से इरशाद ख़ान सिकंदर नेपथ्य में रहकर भी असली नायक नज़र आते हैं। उनकी क़लम जौन एलिया के क़िरदार में सिर चढ़कर बोलती है। नाटक के अंत में निर्देशक रणजीत कपूर ने उनकी तारीफ़ यह कहकर भी की कि मैंने इरशाद की स्क्रिप्ट को ज्यों का त्यों रहने दिया है। ऐसा कम होता है। इसी तरह रणजीत कपूर जी ने निर्देशन में सहयोग के लिये सुनील रावत की तारीफ़ की। उन्होंने यहाँ तक कहा कि असल में सुनील रावत ने ही नाटक को बनाने में असली भूमिका निभाई है। दर्शकों से इस सीनियर लेखक,निर्देशक ने कहा कि नाटक के परफॉरमेंस से उनके अंदर एक नई ऊर्जा का संचार हुआ है। उन्हें लग रहा है कि वे इस उम्र में भी अपनी बीमारी के बावजूद वे बहुत कुछ करने में सक्षम है। उनकी इस बात का दर्शकों ने करतल ध्वनि से स्वागत किया। बाद में इसी नाटक की क़िताब का विमोचन भी किया गया। विमोचन के इस कार्यक्रम में ख्यात शायर फरहत अहसास, राजपाल एंड सन्स की प्रकाशक श्रीमती मीरा जौहरी भी मौजूद थी। आपको बता दें इरशाद ख़ान सिकंदर की शायरी की दो क़िताबें मंज़रे आम पर पहले ही आ चुकी हैं।
(आगे पढ़े, 22 वें भारत रंग महोत्सव के शुभारंभ की पूरी ख़बर।)
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