इंदौर स्टूडियो। ‘आज हमारे सामने भारतीयता, सभ्यता और लोकतंत्र की ‘संकट-त्रयी’ है। यह बात ख्यात साहित्यकार,भारत भवन के संस्थापक और रज़ा फाउंडेशन के अध्यक्ष अशोक वाजपेयी ने (Ashok Vajpeyi)कही। उन्होंने उज्जैन के सामाजिक विज्ञान शोध संस्थान के सभागार में “लोकतंत्र और भारतीयता का भविष्य” विषय पर अपना विचारोत्तेजक व्याख्यान दिया।
मासिक संवाद श्रंखला के तहत व्याख्यान: कार्यक्रम उज्जैन के अभिनव रंगमंडल (Abhinav Rangmandal) द्वारा अपनी ‘मासिक संवाद श्रंखला’ के तहत आयोजित किया गया। शुभारंभ दीप जलाकर हुआ। इसमें श्री राधा वल्लभ त्रिपाठी, अरूण वर्मा और शास्त्रीय गायिका कलापिनी कोमकली शामिल हुए। श्री वाजपेयी का स्वागत रंगमण्डल के निदेशक शरद शर्मा ने गुलदस्ता देकर किया।
सभ्यता को न समझने का सकंट: ‘सकंट त्रयी’ को को विस्तार से समझाते हुए श्री वाजपेयी ने कहा – ‘सभ्यता का संकट सभ्यता को न समझने का संकट है। हम संसार के सबसे बड़े बहुधार्मिक और बहुभाषिक देश हैं। भारत की ज्ञान परंपरा सर्वश्रेष्ठ है। आजकल अज्ञान की महिमा दिल्ली के लाल किले से लेकर उज्जैन के फ्रीगंज तक है। भाषा की अभद्रता साबित करती है कि आप सभ्य नहीं हैं’।
हर धर्म अपने अध्यात्म से विमुख: श्री वाजपेयी ने कहा – ‘हर धर्म अपने ही अध्यात्म से विमुख है। वह आक्रमक हो गया है बल्कि धर्मों का अपार शस्त्रीकरण हो गया है। भारत के धर्म, लोकतंत्र और भारतीयता से विमुख हो गये हैं। होटल नगरी हो गया उज्जैन। ऐसा लगता है उज्जैन होटल में रहता है घर में नहीं। यह भी धर्म के नाम पर हुआ है’।
संकट के पीछे चार शक्तियां: उन्होंने कहा- ‘हम समाज को लोकतंत्र विरोधी बना रहे हैं। केवल राजनीतिक व्यवस्था लोकतांत्रिक है। धर्म, राजनीति, बाज़ार और मीडिया – ये चार शक्तियां मिलकर हमें संकट में ले आई है। दु:खद रूप से हिंदी नफ़रत की, झूठ की भाषा बन गई है। सत्ता और बाज़ार मिलकर समाज को अपदस्थ कर रहे हैं। आज समाज के रूप में बचे होने का ख़तरा पैदा हो गया है। भारतीयता एक बहु वचनात्मक अवधारणा है। इसमें एकवचन के लिए जगह नहीं होनी चाहिए। परंतु विंडबना है कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया का पालन कर, लोकतंत्र में कटौती की जा रही है’।
क्या हम ख़ुद को लाचार मान लें: श्री वाजपेयी ने कहा- ‘ऐसे हालात में, क्या हम ख़ुद को लाचार मान लें? नहीं। कम से कम दीया लेकर तो खड़े हों। स्वयं को इन चारों शक्तियों से मुक्त करें। भारतीयता का तकाज़ा है कि हम लाचारी से खुद को मुक्त करें। अपने को लोकतांत्रिक बनाएं। सच को, लोकतंत्र को, भारतीयता को नागरिक ही बचाएंगे, कोई अवतार नहीं। बोलें – बोलना चाहिए। निर्भीक होकर सच बोलना चाहिए’।
मेरी ज़िदों के मूल में श्री अशोक वाजपेयी: अपने स्वागत वक्तव्य में अभिनव रंगमंडल के प्रमुख और ख्यात रंग निर्देशक शरद शर्मा ने कहा- ‘2017 में अशोक जी मुक्ति बोध पर व्याख्यान देने इसी सभागार में आए थे। मेरी ज़िदों का श्रेय अशोक जी को है। 1991 से हमारी लगातार मुलाकात होती रहीं। मैंने उस दौर में अशोक जी के साथ कई आयोजन किये। मुझे सत्ता द्वारा प्रलोभन दिए गए कि मैं अशोक वाजपेयी को लगातार बुलाना बंद कर दूं तो सब कुछ मिलेगा। मैंने कहा, रिश्तों के साथ समझौते मुझे मंज़ूर नहीं। अशोक जी के कारण मैं विरोध झेलता आया हूँ, यहां तक की उनके आसपास के लोगों का विरोध भी मुझे झेलना पड़ा है। आज बेहद ख़ुश हूँ कि अशोक जी हमारे बीच हैं। हम अशोक जी की जन्म शताब्दी, उज्जैन में उनके रहते मनाएँगे’।
मुकेश बिजौले की चित्र प्रदर्शनी: इस अवसर पर श्री वाजपेयी की कविताओं पर जाने-माने चित्रकार मुकेश बिजौले की चित्र प्रदर्शनी भी लगाई गई। कार्यक्रम का संचालन कवि-कथाकार शशि भूषण ने किया। आभार कवि पाँखुरी वक़्त ने माना। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में संस्कृतिकर्मियों और समाज सेवियों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। (स्त्रोत: ‘अभिनव रंगमंडल’, उज्जैन द्वारा जारी विज्ञप्ति पर आधारित रिपोर्ट।) आगे पढ़िये – विवेचना के 50 साल, यादगार नाटकों का सुनहरा सफ़र https://indorestudio.com/vivechna-ke-50-sal/









