भोपाल। आज के रचनाकार अपने समय और सामाजिक परिदृश्य से मुठभेड़ करते हुए रचनाधर्मिता का निर्वाहन करें। उन्हें इस बात की चिंता नहीं करना चाहिए कि उनके समय में उनकी रचना को ठीक से समझा नहीं गया। चूंकि अपने समय के कई ऐसे रचनाकार हुए हैं, जो अपनी पहचान रचनाकाल के दौरान नहीं बना सकें, लेकिन कालांतर में उन्हें समझा गया। इसके सबसे बड़े उदाहरण कबीर हैँ। यह विचार वरिष्ठ कथाकार प्रियंवद ने व्यक्त किये। वे रविवार को मध्यप्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन के प्रतिष्ठित भवभूति अलंकरण एवं वागीश्वरी समारोह को सम्बोधित कर रहे थे।
पीएण्डटी चौराहा स्थित मायाराम सुरजन स्मृति भवन में आयोजित समारोह में रचनाकारों के सामाजिक सरोकारों की चर्चा करते हुए प्रियंवद ने कहा कि लेखक अपने पाठक खुद तैयार करता है और संवाद स्थापित करे बगैर यह संभव नहीं है। भवभूति अलंकरण से सम्मानित वरिष्ठ कवि नरेश सक्सेना को इसका उदाहरण बताते हुए उन्होंने कहा कि वे लगातार काव्य रचना में श्रृजनशील रहे, लेकिन 60 वर्ष की आयु में उनकी पहली पुस्तक प्रकाशित हुई। पुस्तक के बिना भी उन्होंने अपना पाठक वर्ग तैयार कर रखा था।
भारतीय भाषाओं में होना चाहिए आपसी संवाद : समारोह की अध्यक्षता करते हुए प्रख्यात कथाकार गिरिराज किशोर ने कहा कि साहित्य का सबसे बड़ा नुकसान भारतीय भाषाओं में परस्पर संवाद न होना है। उन्होंने कहा कि जब तक हम भारतीय भाषाओं का सम्मान नहीं करेंगे, तब तक भारतीय भाषाओं के साथ न्याय नहीं हो सकता। श्री किशोर ने कहा कि वर्तमान दौर में पूरा समाज ऐसी त्रासदी से गुजर रहा है, जहाँ लोग कहकहे लगाना भूल गये हैं। इसलिए हमें ऐसा वातावरण तैयार करना चाहिए, जहाँ ठहाके लग सके और लोगों में संवेदना जागृत हो सके. उन्होंने कहा कि नरेश सक्सेना ऐसे कवि हैं, जिनका सम्मान बहुत पहले किया जाना था। उन्होंने युवा रचनाकारों को अपनी परंपरा से जुडक़र लेखन करने सलाह दी।
नरेश सक्सेना ने शिद्दत से याद किया मध्यप्रदेश को : कार्यक्रम में भवभूति अलंकरण से सम्मानित नरेश सक्सेना ने मध्यप्रदेश अपने संस्मरणों का जिक्र करते हुए कहा कि यहाँ की आवोहवा में रहकर मैंने कविताएँ लिखी। अपनी कलात्मक और साहित्यिक रुचि के कारण अध्यापन में व्यवधान उत्पन्न हुआ, परंतु इसके बावजूद मैंने कविताओं का सिलसिला जारी रखा। उन्होंने कहा कि कोई भी महत्त्वपूर्ण रचना भले ही छंद बद्ध न हो लेकिन यदि उनमें सुंदरता हो, ताकि वे पाठकों को आसानी से कंठस्थ हो जाये। श्री सक्सेना ने राजेश जोशी, विनोद कुमार शुक्ल, भगवत रावत, ज्ञानरंजन आदि का जिक्र करते हुए कहा कि मेरे कवि कर्म में इनका महत्त्वपूर्ण योगदान है। हमें इनकी बोलियों के साथ अंर्तसम्बंध स्थापित करना चाहिए.
विभिन्न पुरस्कारों से नवाज़े गये रचनाकार : समारोह में भवभूति अलंकरण वरिष्ठ कवि नरेश सक्सेना को, वागीश्वरी पुरस्कार कविता में तिथि दानी, कथेतर गद्य में बाबुषा कोहली, गीत-गज़ल में दौलतराम प्रजापति, कहानी में मीनाक्षी नटराजन और ममता सिंह को प्रदान किया गया। इसके अलावा अनुराग तिवारी, विनोद विश्वकर्मा, चित्रांश खरे और जितेन्द्र बिरसारिया को माधुरी देवी अग्रवाल स्मृति पुनर्नवा पुरस्कार तथा वसंत निरगुने, पूर्णचंद रथ, चिन्मय मिश्र और साहित्यिक पत्रिका कला समय को उर्मिला तिवारी में स्मृति में स्थापित सप्तपर्णी सम्मान से नवाज़ा गया।
प्रारंभ में सम्मेलन के कार्यकारी अध्यक्ष महेश कटारे ने स्वागत उद्बोधन दिया, जबकि अध्यक्ष पलाश सुरजन, मंत्री मणिमोहन आदि ने अतिथियों का स्वागत किया। वहीं अतिथियों ने रचनाकारों को पुरस्कृत करने के साथ ही सम्मेलन की पत्रिका विवरणिका के विशेषांक का लोकार्पण किया। कार्यक्रम का संचालन और आभार प्रदर्शन प्रो. विजय अग्रवाल ने किया।

