Saturday, May 9, 2026
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भीम गाथा: एक सच्चे हीरो की अनकही कहानी

शकील अख़्तर, इंदौर स्टूडियो। भीम में बल भी है और बुद्धि भी। वह सिर्फ़ पेटू और क्रोधी नहीं है। उसके पास भी प्रेम से भरा हृदय है और संवेदनशील मन। महाकाव्य महाभारत के भीम, एक सच्चे हीरो हैं, एक उदात्त नायक; पांडवों में सर्वश्रेष्ठ।.. भीम के चरित्र से जुड़ी आम धारणाओं से अलग, यह था नाटक – ‘भीम गाथा’। आसिफ़ अली लिखित और पद्मश्री विदूषी रीता गांगुली निर्देशित इस नाटक का नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा, दिल्ली में 13 से 16 मई तक मंचन हुआ। एनएसडी के अभिमंच सभागार में नाटक के कुल 6 शोज़ हुए। नाटक को दूसरे वर्ष के छात्र कलाकारों ने प्रस्तुत किया। शास्त्रीय नाट्य परंपरा का जादू: नयनाभिराम दृश्य, नृत्य-संगीत का रस, शास्त्रीय नाट्य परंपरा का जादू; इस नाटक की खूबियां रही। इसमें महाभारत से लेकर रामायण तक की याद थी। द्वापर से लेकर त्रेता युग का मिलन था। इस पौराणिकता में हमारी कला और संस्कृति की अक्षुण्णता का बोध था। (नाटक के अंत में रीता गांगुली अपने बैक स्टेज सहयोगियों के साथ, दर्शकों को बारी-बारी सभी का परिचय देते हुए।)छात्रों के लिये सौभाग्य की बात: छात्र भाग्यशाली रहे, क्योंकि उन्हें इस नाटक के निमार्ण में, रीता गांगुली जैसी सिद्धहस्त ‘गुरू’ का साथ मिला। रीता जी बरसों से एनएसडी से जुड़ी रही हैं, उन्हें अध्यापन, पाठ्यक्रम से लेकर कई यादगार नाटकों के निर्माण का अनुभव है। उनके नेतृत्व में बैक स्टेज की एक क़ाबिल टीम भी नाटक को रचने और गढ़ने में पूरी तन्मयता से जुटी रही। यही वजह थी कि दर्शकों को कुछ चौंकाने वाले दृश्य भी देखने को मिले। इनमें से 3 दृश्य यादगार बन गये। पहला – ‘द्रौपदी के चीरहरण के समय मंच के ऊपर से वस्त्र का निरंतर गिरना’, दूसरा -‘बर्बरीक के चलाये तीर से कई पेड़ों की पत्तियों का टूटकर गिरना’, तीसरा – ‘बर्बरीक के वध के बाद उसकी देह का मंच पर गिरना, सिर का मंच के ऊपर, आकाश में लटकना’।  मंच व्यवस्था के सहयोगियों का आभार : नाटक की परिकल्पना को साकार करने के लिये रीता जी ने अपने सभी सहयोगियों का हृदय से आभार व्यक्त किया। उन्होंने हवा में बर्बरीक का सिर लटका देने के काम को क्रियान्वित करने वाले, बैक स्टेज सहयोगी संजय जी की प्रशंसा की। वहीं नाटक की शास्त्रीय रंग-रचना में अपनी-अपनी तरह से रचनात्मक सहयोग देने वाले साथियों का शुक्रिया अदा किया। इनमें प्रमुख रूप नाम हैं – ‘डॉली अहलूवालिया (वेशभूषा), कंचन और सलमा (वेशभूषा सहायक), सौती चक्रवर्ती (प्रकाश योजना), मेघना कोठारी (सह निर्देशन), काजोल घोष और भूपति (संगीत संयोजन), संगीत संचालन (मेलोडी), बाबू ख़ान (मेकअप), सागनिक चक्रवर्ती (असि.स्टेज डिज़ाइनर) और नाटक के लेखक आसिफ़ अली। नाट्य लेखन की प्रशंसा में रीता जी ने कहा – ‘आसिफ़ जी ने कमाल का नाटक लिखा है, वे एक बेहतरीन अभिनेता भी हैं और एनएसडी में मॉर्डन इंडियन ड्रामा के प्राध्यापक भी’। (निर्देशक रीता गांगुली के साथ उनके सहयोगियों और सहायकों का अभिमंच सभागार में प्रदर्शित पोस्टर के माध्यम से सचित्र विवरण।)एक यादगार और भव्य दृश्य गाथा: यह नाटक एक भव्य और यादगार दृश्य गाथा की तरह है। इसमें मंच, अभिनय, संगीत, नृत्य, वेशभूषा और प्रकाश योजना का समन्वयन, साझा रूप से दर्शकों को आनंद के नये शिखर पर ले जाता है। रीता जी के निर्देशन में यह संयोजन नाटक को भारतीय नाट्य शास्त्र की परंपरा से जोड़ता है। प्राचीन शास्त्रीय सभागार का आभास: नाटक देखने आये दर्शकों को सभागार में प्रवेश करते ही किसी प्राचीन शास्त्रीय सभागार में पहुंचने का आभास हुआ। सभागार के दोनों ओर की दीवारों पर, शैल गुहा (रॉक कट वास्तुकला) की तरह प्रस्तर पर उत्कीर्ण मूर्तियां नज़र आईं। मंच पर शैलकृत स्थापत्य कला के अनुरूप, पत्थरों से निर्मित मंडप और कलात्मक मूर्तियां दिखाईं दीं। इसी वातावरण में शिव स्तुति और ध्वजारोहण से नाटक का श्रीगणेश हुआ। संगीत और नृत्य का सुंदर तालमेल: नाटक में शास्त्रीय संगीत, गायन और नृत्य का भी सुंदर तालमेल था। नाटक के गीतों में शुभा मुदगल, ए.हरिहरन और ओएस अरूण जैसे शास्त्रीय गायकों की आवाज़ें सुनाईं दीं। नाटक के अभिनय में शास्त्रीय नृत्य शैली की भाव-भंगिमाओं को जोड़ा गया था। दर्शकों के लिये यह एक अलग तरह का अनुभव था, जहाँ कलाकार, संवाद के साथ हस्त मुद्राओं का प्रयोग करते नज़र आ रहे थे। पेड़ों आदि की दृश्य रचना में भी कलाकारों का सदुपयोग किया गया। मंच पर उनकी देह से ही जंगल,महल,शाला आदि के दृश्य रचे गये। (गहनों की कल्पना और वेशभूषा के रेखांकन, नाटक के मंचन से पहले हर विभाग के प्रमुखों ने की पूरी तैयारी।)प्रभावी वेशभूषा, गहने और मेकअप: नाटक के लिये सभी स्तरों पर बेहतर काम इसकी विशेषता रही। नाटक की वेशभूषा छात्रों के लिये किसी पाठ्यक्रम से कम नहीं थी। पारंपरिक भारतीय वस्त्र कला की छवियों को दर्शाती पोशाकें दर्शकों के लिये एक आकर्षण बनीं। डॉली अहलूवालिया और उनकी टीम ने इसके लिये अथक प्रयास किये। वेशभूषा के साथ सुंदर गहने भी हर किरदार की अपनी ख़ूबी बनें। शोधपूर्ण और साहसिक नाट्यालेख: भीम की चारित्रिक विशेषताओं के संदर्भ में यह नाटक शोधपूर्ण और साहसिक है। नाटक में भीम का चरित्र पुरानी धारणाओं से अलग, एक नई खोजपूर्ण यात्रा पर ले जाता है। इसमें दक्षिण भारत में लिखी गईं तमिल महाभारत से भी जानकारियां जुटाई गईं। भीम की इस यात्रा में प्रसंग तो कमोवेश जाने-पहचाने थे, मगर अपने चरित्र में वे पांडव भाइयों की अपेक्षाकृत ज़्यादा सच्चे और निष्ठा से भरे नज़र आते हैं। हम देखते और महसूस करते हैं कि भीम केवल बाहुबल के धनी नहीं है, वे विवेक और प्रेम से भरे हैं। उनका चरित्र एक वास्तविक नायक का प्रतीक है। भावुक भीम अपने लक्ष्य से गुमराह नहीं : भीम के पास भी एक भावुक मन है। वे भी प्रेम में डूबे हैं। वनवासी कन्या से अनायास प्रेम और द्रौपदी के प्रति उनकी आसक्ति से इसका पता चलता है। परंतु उनका प्रेम लक्ष्यहीन नहीं हैं। पांडव भाइयों के साथ ही,वे माता कुंती की रक्षा के लिये बेहद सजग हैं। द्रौपदी के लिये भी तन, मन से वचनबद्ध हैं। द्रौपदी को दिये वचन के अनुसार ही वे कौरवों के साथ दुर्योधन और दु:शासन का वध करते हैं। द्रौपदी के कहने पर उसके लिये ‘पुष्प सौगन्धिकम’ लेकर आते हैं। यद्धपि मायावी दर्पण से उन्हें पता चलता है कि जिस द्रौपदी से वे सच्चा प्रेम करते हैं, उसका हृदय कर्ण के लिये आकुल है। इस तरह उनके कोमल मन को गहरी चोट पहुँचती है, वे अकेले ही रह जाते हैं। कलाकारों ने दिखाया अभिनय का कमाल: वैसे तो यह ड्रामा प्रॉडक्शन, सेंकड ईयर के सभी छात्रों के लिये उनके प्रशिक्षण एक हिस्सा था। परंतु नाटक में अभिनय की दृष्टि से, कुछ कलाकारों ने दर्शकों को बेहद प्रभावित किया। इनमें द्रौपदी (मलिका),  हिडिम्बा (प्रार्थना), हिडिम्ब और कीचक (मंजूनाथ), बर्बरीक (गरिमा), हनुमान (गोकुल), विदूषक (कबीर), घटोत्कच (उन्निमाया), कृष्ण (प्रीत), दुर्योधन और कृष्ण (आकाश) जैसे अभिनेता रहे। इनमें भी अपनी भाव-भंगिमाओं और अभिव्यक्ति से लकड़बग्गा का पात्र जीने वाले कुणाल सर्वाधिक पसंद किये गये। लकड़बग्घा के रूप में उनके पास एक भी संवाद नहीं था, मगर उन्होंने बिना संवाद ही वह सब अभिव्यक्त किया, जिसकी ज़रूरत थी। (एनएसडी सेकंड ईयर के कलाकार छात्र; इन सभी छात्रों ने अभिनय के साथ ही नाटक के निर्माण के ज़रिये विविध तरह का प्रशिक्षण हासिल किया। शास्त्रीय नाट्य शैली के बारे में काफी कुछ जाना,सीखा।) भीम के चरित्र की शारीरिक सीमा: नाटक में भीम की केंद्रीय भूमिका हेमंत ने निभाई है। उन्होंने अपनी तरफ़ से बेहतर अभिनय किया। परंतु इकहरी काया वाले हेमंत, बलशाली कद-काठी वाले भीम के चरित्र को सीमित ऊँचाई ही दे सके। असल में दर्शक भीम के रूप में बेहतर शारीरिक गठन वाले कलाकार को देखना चाहते थे। अन्य भूमिकाओं में जिन कलाकारों ने काम किया, उनके नाम हैं – शिवजी (हिमांशु), मामा शकुनि (अमरेश), दु:शासन (विपिन),गांधारी व नटी (मृणाल), धृतराष्ट्र (अतुल), युधिष्ठिर (सुमित), नटी (यामिनी), कुंति (मुस्कान), अर्जुन और सैनिक (अमित), सैनिक (प्रार्थना, संगीता, प्रगति, सुदेशना, वाणी), सहदेव, सम्यक, ज़ुबेर, शिवम, सिद्धार्थ, पन्नीकर, सोनू, सुजीत, नीरज। रीता जी के निर्देशन में नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा का यह एक उत्कृष्ट प्रदर्शन रहा। चूँकि यह छात्र कलाकारों का प्रॉडक्शन रहा, इसलिये संभव है, आगे इसके और मंचन न हो सकें। परंतु जिस तरह से एनएसडी में यह शो तैयार किया गया है, उसे देखकर लगता है, इस नाटक के प्रयोग आगे भी जारी रहना चाहिये। (चित्र सौजन्य:एनएसडी छाया विभाग) आगे पढ़िये –

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