शकील अख़्तर, इंदौर स्टूडियो। भीष्म साहनी के प्रसिद्ध उपन्यास पर आधारित नाटक ‘तमस’ का 14 अगस्त से नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा (एनएसडी) दिल्ली में मंचन शुरू होगा। एनएसडी,रंगमंडल की इस प्रस्तुति में 50 से अधिक कलाकार शामिल होंगे। इनमें रंगमंडल के कलाकारों के साथ ही 2 विदेशी और 15 अन्य कलाकार भी शामिल है। ‘तमस’ का नाट्य रूपांतरण आसिफ़ अली और चितरंजन त्रिपाठी ने किया है। संगीत और निर्देशन चितरंजन त्रिपाठी का है। (फाइल चित्र: एनएसडी, परिसर में मौजूद इसी अभिमंच प्रेक्षागृह में नाटक ‘तमस’ का मंचन होगा।)
प्रीमियर शो केवल आमंत्रितों के लिये: नाटक के विषय में चर्चा करने पर रंगमंडल प्रमुख राजेश सिंह कहा – ‘14 अगस्त का प्रीमियर शो आमंत्रितों के लिये है। परंतु 15 अगस्त के बाद से नाटक के शोज़ आम दर्शकों के लिये प्रारंभ हो जाएंगे। बुक माय शो के माध्यम से टिकट लिये जा सकेंगे। प्रीमियर शो में बतौर मुख्य अतिथि केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री जी किशन रेड्डी होंगे। उनके साथ ही विशिष्ट अतिथियों में केंद्रीय मंत्री अर्जुन मेघवाल, संस्कृति एवं विदेशी राज्य मंत्री मीनाक्षी लेखी, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र न्यास के अध्यक्ष राय बहादुर होंगे। कार्यक्रम की अध्यक्षता एनएसडी के निदेशक प्रो.(डॉ.) रमेश चंद्र गौड़ करेंगे’। (फाइल चित्र: रंगमंडल,एनएसडी के प्रमुख राजेश सिंह ने नाटक ‘तमस’ की घोषणा ग्रीष्म कालीन नाट्य उत्सव के दौरान की थी।)
मूल कृति के साथ छेड़छाड़ नहीं: राजेश सिंह ने कहा – ‘यह पहला मौका है जब ‘तमस’ उपन्यास पर आधारित नाटक को आधिकारिक तौर पर प्रस्तुत किया जा रहा है। नाटक के रूपातंरण में भीष्म साहनी जी की मूल कृति के साथ किसी तरह की कोई छेड़छाड़ या बदलाव नहीं किया गया है। यहाँ तक अपनी तरफ़ एक संवाद भी नाटक में नहीं जोड़ा गया है। भीष्म साहनी ने जिस तरह से लिखा है, किरदारों के लिये जो संवाद लिखे गये हैं, वही इस नाटक की प्रस्तुति में शामिल किये गये हैं’।
भीष्म साहनी जी ने जो देखा, वह लिखा: रंगमंडल प्रमुख ने कहा – ‘भीष्म साहनी जी को भले ही एक लेफ्टिस्ट राइटर माना जाता हो, परंतु मैंने यह बात गहराई से महसूस कि तमस में यह बात कहीं से भी नज़र नहीं आती। उन्होंने बिना किसी पूर्वाग्रह या वैचारिक प्रतिबद्दता के वही लिखा है जो उनके लेखक मन ने देखा और महसूस किया है’। (फाइल चित्र: 1947 के बंटवारे की कभी न भुलाई जाने वाली तस्वीर, हज़ारों मारे गये, लाखों बेघर-बार हुए।)
देशवासियों से प्रेम, असली देश भक्ति: राजेश सिंह ने इस प्रस्तुती की आवश्यकता पर कहा – ‘देखिये सांप्रदायिकता हमारी एकता और अखंडता के हित में नहीं है। देश भक्ति एक अच्छी भावना ज़रूर है। मगर देश लोगों से बनता है। जब तक हमारे अंदर एक-दूसरे के लिये प्रेम और इंसानियत का जज़्बा नहीं होगा, हमारी देश भक्ति का कोई अर्थ नहीं होगा। नाटक यही संदेश देता है कि हम सभी देशवासी, बंटवारे के दर्द, उसके काले इतिहास और सांप्रदायिक वैमनस्यता से सबक सीखे। देश हित में मिल-जुलकर आगे बढ़ें। हम भारत के लोगों ने आज़ादी जिस क़ीमत पर हासिल की है, उससे समझे और आगे कभी ऐसा न हो, इस बात के लिये जागरूक रहे’। (फाइल चित्र: विभाजन की त्रासदी के छूटे निशान, इस दौरान कई शहर,गाँव,कस्बे तबाह हुए। लोग एक-दूसरे के दुश्मन बन गए। क्या अब भी हम कुछ सीख सके हैं?) 
1973 में प्रकाशित हुआ था ‘तमस’: स्व. भीष्म साहनी के उपन्यास ‘तमस’ का 1973 में प्रकाशन हुआ था। 1975 में इसे साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इस उपन्यास में लेखक ने भारत-पाकिस्तान के विभाजन से जुड़े दुर्भाग्यपूर्ण इतिहास को अभिव्यक्त किया है। इसका परिवेश मार्च-अप्रैल,1947 में पंजाब के रावलपिंडी में हुए हिन्दू-मुस्लिम दंगे है। (स्व. साहनी के उपन्यास पर बनी फ़िल्म तमस के एक दृश्य में ओमपुरी और दीपा साही।)
सब जला देती है सांप्रदायिकता की आग: उपन्यास के माध्यम से भीष्म साहनी यह साफ़ करते हैं कि साम्प्रदायिकता एक ऐसी आग है जो आपसी सदभावना, भाईचारे और आत्मीयता को एकाएक भस्म कर देती है। यह आग एक इंसान को धर्म या जातीयता के शिकंजे में जकड़ लेती है। तब देश रहता है न देशवासी। सब पीछे छूटता चला जाता है। बस रह जाता है एक दर्दनाक, शर्मनाक इतिहास और रक्तरंजित मानवता। ऐसे माहौल में ना वास्तविक धर्म रहता है ना ही इंसानियत। (फाइल चित्र: तमस के साथ आक्रोश, अर्द्धसत्य, आघात, पार्टी और द्रोहकाल जैसी फिल्मों के निर्देशक गोविंद निहलानी)
1986 में इस उपन्यास पर गोविंद निहलानी ने दूरदर्शन के लिये सीरियल और एक फ़िल्म का निर्माण किया था। फिल्म में ओमपुरी और दीपा साही ने प्रमुख भूमिकाएं निभाईं थीं। शर्मनाक पहलू यह है कि आज भी हम सांप्रदायिकता और धार्मिक अंधता की रीति-नीति से उभर नहीं पाए हैं। आज़ादी के अमृत महोत्सव के इस समय में हम सभी को इस सांप्रदायिक वैमनस्य के ख़िलाफ़ गंभीर कदम उठाने और आपसी एकता को मज़बूत करने की सख़्त ज़रूरत है। आगे पढ़िये –
जोश और जज़्बा जगाते रहेंगे, मोहम्मद रफ़ी के गाये देशभक्ति के गीत

