भूत और परी कथाओं से बच्चों को नहीं बहलाया जा सकता-कुमुद शर्मा

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पल्लवी प्रशांत होळकर, इंदौर स्टूडियो। ‘आज के बच्चों को भूत और परी कथाओं से नहीं बहलाया जा सकता। आज बच्चों के पास तर्क, ज्ञान और कल्पना शक्ति से उपजे ऐसे सवाल हैं, जो हम बड़ों को भी निरुत्तर कर देते हैं’। साहित्य अकादेमी की उपाध्यक्ष कुमुद शर्मा ने यह बात कही। वे साहित्य अकादेमी बाल साहित्य से पुरस्कृत लेखकों के बीच अपने विचार व्यक्त कर रही थीं। साहित्य अकादेमी सभागार में यह सम्मिलन आयोजित हुआ। इसमें पुरस्कृत लेखकों ने भी हिस्सा लिया। अपने विचार व्यक्त किये। परंपरा और बदलाव के बीच लिखने की चुनौती: कुमुद शर्मा ने कहा- ‘आज के बाल लेखकों को, परंपरा और तकनीकी बदलावों के बीच लिखना है। यह एक बड़ी चुनौती है। बाल साहित्यकार एक तरीके से बच्चों के लिए नैतिक मूल्यों और ज्ञान की ऐसी गुल्लक सौंप रहे हैं, जो उनके जीवन में बहुत बड़ी भूमिका निभाएगी’। कुमुद जी ने कहा कि हमारे देश में बाल साहित्य की बहुत प्राचीन और लोकप्रिय परंपरा रही है। पंचतंत्र इसकी सबसे बड़ी मिसाल है। उन्होंने सभी पुरस्कृत लेखकों को बधाई दी। (नितिन कुशलप्पा)
लोक कथाओं और किंवदंतियों पर लेखन: नितिन कुशलप्पा एमपी (अंग्रेजी) ने कहा, उनकी पुस्तक दक्षिण भारत की लोक कथाओं और किंवदंतियों पर केंद्रित है। उन कथाओं में इतिहास लोककथाओं का अनूठा संगम है जो बच्चों को मनोरंजन की नई दुनिया में ले जाता है। सुरेंद्र मोहन दास (असमिया) ने कविताओं और बाल साहित्य के लेखन के, साथ ही अनुवादक और कलाकार के रूप में अपनी यात्रा के बारे में विस्तार से बताया। त्रिदिब कुमार चट्टोपाध्याय (बाङ्ला) ने लेखन पर अपने पिता के प्रभाव और अपनी प्रेरणाओं के बारे में चर्चा की। (सुशील शुक्ल)बच्चों के साथ खेलना है पसंद: कीर्तिदा ब्रह्मभट्ट (गुजराती) ने कहा कि उन्हें बच्चों के साथ खेलना बहुत पसंद है और उन्हें पढ़ाना, उनसे मीठी बातें करना, उन्हें कहानियाँ सुनाना और उनके सवालों का जवाब देना इतना अच्छा लगता है कि वे उन अनुभवों को ही अपनी कविताओं में ढाल देते हैं। सुशील शुक्ल (हिंदी) ने कहा कि बच्चों के लिए लिखने वाले को बच्चों को ऐसा दोस्त बनाना आना चाहिए जो कि उन बच्चों के अंदर रोशनी पैदा करे और उनको नई उष्मा दे सके। (इज़हार मुबशिर) मेरी पुस्तक बचपन के दिनों की डायरी: के. शिवलिंगप्पा हंदिहाल (कन्नड़) ने अपने पुरस्कार विजेता संग्रह को अपने बचपन की डायरी बताते हुए कहा कि उन्होंने बाल साहित्य का महत्त्व और सार्वभौमिकता कभी भी कम नहीं होगी। इज़हार मुबशिर (कश्मीरी) ने कहा कि कश्मीरी लेखकों के सामने सबसे बड़ी चुनौती गोला-बारूद के बीच से बच्चों को ऐसी दुनिया के बारे में बताना है जहाँ से उनकी मुस्कानें वापस आ सके। (नयना आडारकार)मेरे बच्चों ने मुझे बनाया बाल साहित्यकार: सुश्री नयना आडारकार (कोंकणी) ने कहा कि मेरे बच्चों ने मुझे बाल साहित्यकार बना दिया, इसका मुझे गर्व है। मेरी पुरस्कृत पुस्तक में सीधे-सादे बच्चों के सामने आने वाली प्रमुख समस्या है। स्कूल के दोस्त उसपर धौंस जमाते हैं। ऐसे माहौल में एक बच्चा खुद ही समस्या का हल निकालता है। (सुरेश सावंत) ज्ञान और मनोरंजन का हो संतुलन: सुरेश सावंत (मराठी) ने कहा इस बात पर खेद व्यक्त किया कि बाल साहित्य लेखन की कोई अच्छी समीक्षा नहीं की जाती है। उन्होंने कहा, वही बाल साहित्य समय की कसौटी पर खरा उतरता है, जिसमें ज्ञान और मनोरंजन की लय और उसका संतुलन ठीक तरह से सँभाला गया हो। (विष्णुपुरम सरवणन)परंपरा और वर्तमान सच के बीच का सेतू: लेखक सम्मिलन में बिनय कुमार ब्रह्म (बोडो) ने कहा कि बाल साहित्य हमारी सांस्कृतिक परंपराओं और वर्तमान सच के बीच एक सेतु का काम करता है और मैं बोडो साहित्य में यह काम निरंतर कर रहा हूँ। पी.एल. परिहार ‘शौक’ (डोगरी) ने आज की पीढ़ी में नैतिक मूल्यों को बढ़ावा देने वाली बाल पत्रिकाओं की कमी पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा, आज के बच्चे परियों की कहानियों, नैतिक कविताओं और कहानियों से आगे बढ़ गए हैं। उन्हें विज्ञान-आधारित साहित्य प्रदान करने की आवश्यकता है। (राजकिशोर पाढ़ी)   इन लेखकों ने भी व्यक्त किये विचार: सम्मिलन में मुन्नी कामत (मैथिली), श्री श्रीजित मुत्तेडत्तु (मलयाळम्), शांतो एम, (मणिपुरी), साङ्मु लेप्चा (नेपाली), राजकिशोर पाढ़ी (ओड़िया), भोगीलाल पाटीदार (राजस्थानी), प्रीति पुजारा (संस्कृत), हरलाल मुर्मु, (संताली), हीना अगनाणी ‘हीर’, (सिंधी), विष्णुपुरम सरवणन (तमिल), गंगिशेट्टी शिवकुमार (तेलुगु), ग़ज़नफ़र इक़बाल (उर्दू) ने भी अपने रचनात्मक अनुभव साझा किए। आगे पढ़िये – बाल साहित्य का लेखन समाज के लिये महत्वपूर्ण -वर्षा दास। https://indorestudio.com/bal-sahitya-ka-lekhan-varsha-das/

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