शकील अख़्तर, इंदौर स्टूडियो। भूमिका दुबे वर्तमान भारतीय रंगमंच की सबसे सशक्त अभिनेत्रियों में से एक हैं। उनका लिखा, निर्देशित और अभिनीत नाटक ‘केला’ इसका बेहतरीन उदाहरण हैं। केला परमार की भूमिका में वे मंच पर अपने किरदार के हर उतार-चढ़ाव को शिद्दत से तो निभाती ही हैं, नाटक की कहानी में दूसरे पात्रों को भी बखूबी अभिनीत करती हैं। बड़ी बात ये है कि वे हरेक में एकदम अलग नज़र आती हैं।
एनएसडी, दिल्ली में देखने को मिला शो: इस नाटक को हाल ही में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय एनएसडी, दिल्ली में देखने का अवसर मिला। इस कहानी को उन्होंने एनएसडी, दिल्ली में में रहते हुए ही इम्प्रोवाइज़ किया था, धीरे-धीरे उन्होंने इसे डेढ़ घंटे के एक मोनोलाग (एकालाप) में बदल दिया। इस ट्रैजिक किरदार में ये दमदार अभिनेत्री अपने अभिनय से दर्शकों को पूरी तरह से बाँध लेती है। दर्शक भूमिका की इस प्रस्तुति के दौरान एक पल के लिये भी हिल नहीं पाते। वे इस किरदार में उनके साथ बहते चले जाते हैं।
बिजली की गति से बदल जाते हैं पात्र: मंच पर बिजली की गति से पात्र बदलना और फिर मुख्य किरदार में लौटना आसान नहीं होता। भूमिका ‘केला’ के रूप में यह बेहद आसानी से करती हैं। वे मुख्य किरदार के साथ, कथा में आये दूसरे पात्रों का अभिनय भी, बड़ी कुशलता के साथ करती हैं। इस दौरान उनकी प्रस्तुति में कहीं भी, कोई कमी नज़र नहीं आती। दर्शक एक मिनट के लिये भी उनके किरदार से अलग नहीं हो पाते। मोनोलाग में उनकी यह सम्मोहक अभिव्यक्ति ही इस प्रस्तुति की सफलता है। आपको बता दें, भूमिका इस एकल नाटक के अब तक 17 शोज कर चुकी हैं।
एक ग्रामीण स्त्री के जीवन की कहानी: नाटक पुरूष प्रधान समाज या पितृसत्ता वाले, एक परिवार की बेटी की कहानी है। इस कहानी में वे बचपन से लेकर जीवन की संध्या तक का सफर तय करती है। कहानी हमें 60 के दशक के ग्रामीण परिवेश में ले जाती है, जामुन के पेड़ों से अपना जीवन यापन चलाने वाले एक रूढ़िवादी परिवार में। हालात बदलने के साथ केला को गाँव छोड़कर शहर आना पड़ता है। शहर में केला को, जामुन के पेड़ों, माँ, परिवार और गाँव के माहौल की बहुत याद आती है। हालांकि बदलते वक्त के साथ सबकुछ बदल गया है। न वह पुराना गांव बचा रहता है, न ही वो पेड़ और परिवेश। शहर में केला कपड़ों को रंगने का काम करते हुए अपने मुश्किल जीवन की गाड़ी खींचती है। केला के रूप में वह बचपन से लेकर वैवाहिक जीवन और फिर वृद्धावस्था तक के सफर को तय करती है। दर्शक इस यात्रा में उसके सहभागी बन जाते हैं।
मुंबई यूनिवर्सिटी से स्नातक की उपाधि: भूमिका मास मीडिया में मुंबई यूनिवर्सिटी से स्नातक की उपाधि प्राप्त अभिनेत्री हैं। 2015 में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, नई दिल्ली से अभिनय में विशेषज्ञता के साथ ग्रेजुएशन किया। 2016 से बतौर अभिनेत्री रंगमंच के साथ ही छोटे और बड़े परदे के लिये काम कर रही हैं। अभी तक भूमिका 5 फीचर फिल्मों, 8 शॉर्ट फिल्मों, 4 वेब सीरीज़ और 50 से अधिक विज्ञापनों में काम कर चुकी हैं। नेटफ्लिक्स पर हाल ही में प्रदर्शित ‘आई हंसी दिलरुबा’ और ‘द रेलवे मैन’ में भी उन्होंने अभिनय किया है।
रंगमंच की तालीम विरासत में मिली: भूमिका को अभिनय और रंगमंच की तालीम विरासत में मिली है। उनके पिता गोपाल दुबे, रंग मंडल, भारत भवन (भोपाल) के कलाकार रहे हैं। वे बीते 40 सालों से लगातार रंगकर्म में सक्रिय हैं। एक वरिष्ठ निर्देशक के रूप में लगातार काम कर रहे हैं। भूमिका की आरंभिक शिक्षा भोपाल में ही हुई है। वे अपने पिता के रंगकर्म को अपने अभिनय में एक नई कल्पना और विस्तार के साथ आगे बढ़ा रही हैं।
Play: Kela, Produced by: Bhumika Bhopal and Jairangm, Created by: Bhumika Dube, Lights: Sarthak Narula, Music: Priyash Pathak, Sound: Arvind Nair, Production: Atrrayee। आगे पढ़िये – अमोल पालेकर ने कहा, मैंने फिल्मों के लिये चुनी आम आदमी की कहानियां – https://indorestudio.com/aam-aadmi-ki-kahani-amol-palekar/









