अहमद ख़ान, इंदौर स्टुडियो। बॉलीवुड के कुछ निर्देशक ऐसे हैं जो अपनी ख़ास तरह की फ़िल्मों या जॉनर के लिये जाने जाते हैं। ये ऐसे फ़िल्मकार भी हैं जिनका अपना दर्शक वर्ग है और उनकी फ़िल्मों का दर्शकों को बेसब्री से इंतज़ार रहता है। इनमें कोई सिनेमा के परदे पर अनदेखे पहलुओं को सामने लाता है तो कोई एक पूरे युग को ही अपनी फ़िल्मों में जीवंत कर देता है। कोई दर्शक को सीट से उठने नहीं देता तो कोई ऐसी फ़िल्में बनाता है जो देखने वालों नई चेतना से भर देती हैं। कौन है बॉलीवुड की पहचान बने ये ब-कमाल निर्देशक,इस लेख में यही चेहरे।
संजय लीला भंसाली:पीरियड फ़िल्मों का शाहकार
बेहतरीन कहानी और भव्य प्रदर्शन का नाम है संजय लीला भंसाली। पीरियड फिल्में उनकी खूबी है। उनकी फिल्में स्क्रीन पर एक उत्सव की तरह आती हैं। फ़िल्म पद्मावती हो या बाजीराव मस्तानी या फिर देवदास, उनकी फ़िल्मों में जैसे एक युग जीवंत हो उठता है। वेशभूषा, संगीत, किरदारों को वे जिस कुशलता के साथ अपनी फ़िल्मों में पिरोते हैं, वह दर्शकों के लिये यादगार बन जाता है। उनकी जल्द ही आने वाली फ़िल्म ‘गंगूबाई काठियावाड़ी’भी यकीनी तौर पर उनकी एक बेहतरीन कृति साबित होगी।
अनुराग कश्यप: ग्रामीण भारत का बेबाक चेहरा
कस्बाई भारत के गैंग जो अपने वर्चस्व के लिये दुश्मन को देखते ही गोली मार देते हैं। ऐसी बेबाक और बर्बर फ़िल्मों में अनुराग कश्यप आज शीर्ष पर हैं। ब्लैक फ्राइडे से लेकर गैंग्स ऑफ वासेपुर तक, अनुराग कश्यप ने हमारी आसपास की दुनिया का एक अलग ही चेहरा दिखाया है। बॉलीवुड में आज उनकी खोजी कहानियों और किरदारों के ऐसे देसी चेहरे आप प्रमुखता से जगह पाने लगे हैं। उनकी डार्क थ्रिलर ने बॉलीवुड में एक नई तरह का जॉनर बनाई है और इस तरह की फ़िल्मों के शौकीन दर्शकों को आकर्षित किया है। अब उन्हें अनुराग कश्यप की फ़िल्मों का बेसब्री से इंतज़ार रहता है।
अनुभव सिन्हा: समाज को जागरूक करती फ़िल्में
सामाजिक नाटक उन महत्वपूर्ण मुद्दों को उजागर करते हैं जिनके बारे में अक्सर बात नहीं की जाती है या यदि वे हैं भी, तो वे अक्सर छिपे रहते हैं। अनुभव सिन्हा ने समय-समय पर अपनी फिल्मों के माध्यम से देश को प्रभावित करने वाले विभिन्न मुद्दों को उजागर किया है। उनकी फ़िल्म ‘थप्पड़’ में जहां घरेलु हिंसा और विवाहित स्त्री के अधिकारों की जंग लड़ती है। वहीं फ़िल्म ‘मुल्क’ सांप्रदायिकता से जुड़े यथार्थपूर्ण पहलुओं को उजागर करती है। वहीं फ़िल्म ‘आर्टिकल 15’ के माध्यम से दलितों की दुर्दशा को वो बेहद संवेदनशीलता से सामने लाते हैं। अनुभव ने सिनेमा के माध्यम से देश को शिक्षित किया है। उनकी फिल्में समाज में जागृति का प्रतीक बन गई हैं।
सुजॉय घोष: सीट से बाँधे रखने वाली ऑफ बीट फ़िल्में
सुजॉय घोष अपनी फिल्मों के जरिए सस्पेंस क्रिएट करने के लिए जाने जाते हैं। वह आपको पलकें झपकाने नहीं देंते। आप अंत तक फ़िल्म यह जानने के लिये देखते रहते हैं कि अब क्या होगा ? वह आपको यह अनुमान लगाने नहीं देते कि हत्यारा कौन है। यही उनकी खूबी है। वह अंत तक अपने दर्शकों के मन में जोश पैदा करना पसंद करते हैं। सुजॉय ने पिछले कुछ वर्षों में ऑफ बीट स्टोरीलाइन के माध्यम से कुछ दिलचस्प सिनेमा का निर्माण किया है, जो मुख्यधारा की प्रशंसा और वाहवाही बटोर रही है। कहानी,अनामिका,सत्यअन्वेषी जैसी फ़िल्में दर्शकों ने बेहद सराही हैं।
विशाल भारद्वाज: शेक्सपियर के काम को दी भारतीय दृष्टि
बड़े सिनेमा स्क्रीन के चित्रकार विशाल भारद्वाज ने शेक्सपियर के काम को फिल्मों में अपनी ही अंदाज़ में जीवंत किया है। मकबूल से लेकर ओमकारा और हैदर तक जैसी फ़िल्मों में उनकी यह ख़ूबी उभरकर सामने आती है। सबसे बड़ी बात शेक्सपियर के काम को उन्होंने अपनी फ़िल्मों में भारतीय दृष्टि देने की कोशिश की। उसे शानदार ढंग से फिल्मी परदे पर प्रस्तुत किया। आज दर्शक उन्हें एक बेहतरीन फिल्मकार के रूप में भी जानते हैं।
अलंकृता श्रीवास्तव:नारी के अनदेखे पहलुओं की खोज
लिपस्टिक अंडर माय बुर्का अपने समय की एक अग्रणी फिल्म थी, एक मास्टर पीस जिसने नारी के कई पहलुओं को एक नई रोशनी में खोजा। फिल्म को सर्वश्रेष्ठ फिल्म के लिए फिल्मफेयर क्रिटिक्स अवार्ड के लिए नामांकन मिला। जामिया मिलिया इस्लामिया की पूर्व छात्रा, अलंकृता ने समय-समय पर अपनी कहानी कहने के कौशल का इस्तेमाल महिलाओं के उन पक्षों को उजागर करने के लिए किया है जो कभी स्क्रीन पर नहीं दिखाए गये। उनकी नेटफ्लिक्स श्रृंखला, बॉम्बे बेगम, उनकी ओर से एक और सफल प्रयास थी। नारी और नारीत्व और उनके अनेक पक्ष उनकी विशेषता प्रतीत होते हैं और उन्होंने इस संबंध में अपना एक नाम तराशा है।
विशाल फुरिया: डर,ख़ौफ़,दहशत की तस्वीर
भारत में हॉरर के अपने दर्शक हैं, जो हर बार दांतों तले नाखून दबाने और डरावने पलों के जीने के अवसर को गले लगाने के हमेशा तैयार रहते है। विशाल फुरिया ने हॉरर फिल्मों के जॉनर में अपनी अलग जगह बनाई है। बहुप्रशंसित मराठी फिल्म लपाछपी से लेकर हिंदी रीमेक छौरी तक, बड़ी (बली) एक और मराठी हॉरर फिल्म, जो जल्द ही अमेज़न प्राइम वीडियो पर स्ट्रीम होने वाली है। विशाल ने लोगों को डराने के लिए नए, अनदेखे तरीकों का इस्तेमाल किया है। उनकी फिल्मों को एक अलग तरह की फिल्म के रूप में माना जाता है जो लोगों को डराती है, यही उनकी विशेषता है और उन्होंने अपना काफी समय इस जगह को बनाने में लगाया है।
मेघना गुलजार: कहानियां जिन्हें देखना और सुनना ज़रूरी है
कुछ बेहतर और अलग करने वाले निर्देशकों की फेहरिस्त में मेघना गुलज़ार का नाम भी बेहद महत्वपूर्ण है। वे अपने सिनेमा में वास्तविक जीवन की कहानियां कहानियां बड़ी ख़ूबी से पेश करती हैं। हमारे आस-पास जो कुछ घट रहा है, वे अपनी फ़िल्मों में बड़ी कुशलता से पेश करती हैं। ‘हू तू तू से लेकर छपाक और राज़ी’ तक, उनकी फ़िल्में उन मुद्दों से निपटने के लिये प्रेरित करती हैं, जिन से आम आदमी को हर दिन जूझना पड़ता है। फ़िल्म ‘छपाक’ में उन्होंने एक तेज़ाब पीड़िता के आघात और लड़ाई पर प्रकाश डाला, वहीं उन्होंने आरुषि हत्या के सनसनीखेज मामले में माता-पिता की दुर्दशा को जीवंत किया। मेघना ऐसी फिल्में बनाने के लिए जानी जाती हैं जो ऐसी कहानी कहती हैं क्योंकि उन्हें सुनने की जरूरत होती है। उनके प्रयासों के बिना, ऐसी कई कहानियाँ हमेशा के लिए अनकही रह जातीं।
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