Wednesday, May 20, 2026
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बुकर पुरस्कार एक पड़ाव, मंज़िल नहीं ! – गीतांजलि श्री

इंदौर स्टूडियो, विशेष प्रतिनिधि। पुरस्कार एक पड़ाव है, यह मंज़िल नहीं। लेखक का काम है सिर्फ लिखना। लिखकर कोशिश करना। मैं सभी से यही कहूँगी। यही मैं भी करूँगी। अपने पाँचवे उपन्यास ‘रेत समाधि’ के लिये प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय बुकर पुरस्कार प्राप्त करने वाली लेखिका गीजांजलि श्री ने यह बात कही। यह पहला मौका है जब किसी मूल हिंदी कृति के लिये यह पुरस्कार दिया गया है। उनके इस उपन्यास का अंग्रेजी अनुवाद डेजी रॉकवेल ने ‘टॉम्ब ऑफ सैंड’ (Tomb of Sand) के नाम से किया है। अस्सी साल की विधवा की महागाथा रेत समाधि’: गीतांजलि श्री का उपन्यास ‘रेत समाधि’ 2018 में प्रकाशित हुआ। इसकी कथा के केंद्र में एक अस्सी साल की विधवा है जो अपने पति के गुजरने के बाद आ गये अवसाद से न केवल उभरती है बल्कि अपने इतिहास से जुड़े कई अनसुलझे पहलुओं का सामना कर अपने जीवन का नये सिरे अवलोकरन करती है। गीतांजलि ने उपन्यास के कथ्य के बारे में कहा, ‘यह जीवन की अनुभूतियों का उपन्यास है। असल में जीवन बहुत से प्रवाहों,हालात,घटनाओं के बीच से गुज़रता है। हम सब बाहर से एक साधारण जीवन जी रहे होते हैं, मगर हम पर अपने हालात में बहुत सी असाधारण स्थितियों से भी गुज़रते हैं। यही इस उपन्यास के अंदर है। गीतांजलि श्री ने यह भी कहा कि एक लेखक को ख़ुद अपने अंदर से आई चुनौतियों से लड़कर आगे बढ़ना होता है। उसे बाहरी तौर पर मिलने वाले प्रतिकार या प्रतिसाद को गहरे तक लेने से बचकर काम करना पड़ता है। वही मैं करने की कोशिश करती हूँ। मैं लिखने में किसी तरह के समझौते या प्रभाव से बचती हूँ, मैं जो महसूस करती हूँ, लगता है। वह लिखती हूँ। इस मामले में एक आज़ाद लेखिका हूँ’। अब तक पाँच उपन्यास प्रकाशित: ‘रेत समाधि’ सहित लेखिका के अब तक पाँच उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं। इससे पहले आये उनके उपन्यास हैं माई,हमारा शहर उस बस, तिरोहित, और खाली जगह। इसके अलावा उनके चार कहानी संग्रह अनुगूँज,वैराग्य,प्रतिनिधि कहानियाँ,मार्च मां और साकुरा और यहाँ हाथी रहते थे, प्रकाशित हो चुके हैं। उनके लेखन का इंग्लिश, फ्रेंच, जर्मन, कोरियाई और सर्बियन भाषा में अनुवाद हुआ है।अनुवादक डेज़ी रॉकवेल एक लेखक और चित्रकार: उपन्यास का अनुवाद करने वाली डेज़ी रॉकवेल एक चित्रकार और लेखिका हैं। डेज़ी वरमॉन्ट यूएसए में रहती हैं। उन्होंने हिंदी और उर्दू के कई क्लासिक कृतियों जैसे उपेन्द्रनाथ अश्क की गिरती दीवारें, भीष्म साहनी की तमस और खाजीदा मस्तूर की आँगन इत्यादि का अनुवाद किया है। अपने अनुवादों  के लिए वे भी कई पुरस्कार भी जीत चुकी हैं। ज्ञात हो अंतरराष्ट्रीय बुकर पुरस्कार अंग्रेजी में अनूदित पुस्तकों के लिए हर वर्ष दिया जाता है। पुरस्कार का मकसद अंग्रेजी में अनूदित हुए उच्चस्तरीय साहित्य को सम्मानित करके उत्कृष्ट रचनाओं के अनुवाद को प्रोत्साहित करना और अनुवादक के महत्व को पहचान देना है। वहीं लेखक और अनुवादक के महत्व को बराबर मानकर 50000 पौंड (लगभग 50 लाख) की पुरस्कार राशि को लेखक और अनुवादक के बीच बराबार भागों में बाँट दिया जाता है।
रेत समाधि की महागाथा में क्या ? : अस्सी की होने चली दादी ने विधवा होकर परिवार से पीठ कर खटिया पकड़ ली। परिवार उसे वापस अपने बीच खींचने में लगा। प्रेम, वैर, आपसी नोकझोंक में खदबदाता संयुक्त परिवार। दादी बजि़द कि अब नहीं उठूँगी। फिर इन्हीं शब्दों की ध्वनि बदलकर हो जाती है अब तो नई ही उठूँगी। दादी उठती है। बिलकुल नई। नया बचपन, नई जवानी, सामाजिक वर्जनाओं-निषेधों से मुक्त, नए रिश्तों और नए तेवरों में पूर्ण स्वच्छन्द। हर साधारण औरत में छिपी एक असाधारण स्त्री की महागाथा तो है ही रेत-समाधि, संयुक्त परिवार की तत्कालीन स्थिति, देश के हालात और सामान्य मानवीय नियति का विलक्षण चित्रण भी है। और है एक अमर प्रेम प्रसंग व रोज़ी जैसा अविस्मरणीय चरित्र। कथा लेखन की एक नयी छटा है इस उपन्यास में। इसकी कथा, इसका कालक्रम, इसकी संवेदना, इसका कहन, सब अपने निराले अन्दाज़ में चलते हैं। हमारी चिर-परिचित हदों-सरहदों को नकारते लाँघते। जाना-पहचाना भी बिलकुल अनोखा और नया है यहाँ। इसका संसार परिचित भी है और जादुई भी, दोनों के अन्तर को मिटाता। काल भी यहाँ अपनी निरंतरता में आता है। हर होना विगत के होनों को समेटे रहता है, और हर क्षण सुषुप्त सदियाँ। मसलन, वाघा बार्डर पर हर शाम होनेवाले आक्रामक हिन्दुस्तानी और पाकिस्तानी राष्ट्रवादी प्रदर्शन में ध्वनित होते हैं ‘कत्लेआम के माज़ी से लौटे स्वर’, और संयुक्त परिवार के रोज़मर्रा में सिमटे रहते हैं काल के लम्बे साए। और सरहदें भी हैं जिन्हें लाँघकर यह कृति अनूठी बन जाती है, जैसे स्त्री और पुरुष, युवक और बूढ़ा, तन व मन, प्यार और द्वेष, सोना और जागना, संयुक्त और एकल परिवार, हिन्दुस्तान और पाकिस्तान, मानव और अन्य जीव-जन्तु (अकारण नहीं कि यह कहानी कई बार तितली या कौवे या तीतर या सडक़ या पुश्तैनी दरवाज़े की आवाज़ में बयान होती है) या गद्य और काव्य : ‘धम्म से आँसू गिरते हैं जैसे पत्थर। बरसात की बूँद।’

Geetanjali Shree Daisy Rockwell

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