सुहैल वारसी, इंदौर स्टूडियो। जबलपुर में विवेचना रंगमंडल के कलाकारों ने नाटक ‘न्याय को घेरा’ का बुंदेली में मंचन किया। नाटक का निर्देशन अक्षय सिंह ठाकुर ने किया। स्थानीय शहीद स्मारक ऑडिटोरियम में हुए इस नाटक में विवेचना के कुल 35 कलाकारों ने हिस्सा लिया। कलाकारों की इतनी बड़ी टीम का प्रबंधन, वरिष्ठ रंगकर्मी विवेक पाण्डेय ने किया। अभिनय के साथ ही नाटक का संगीत इस दिलचस्प प्रस्तुति की ख़ूबी रही। नाटक सत्ता लोलुप राजनीति के ज़रिये जनता के साथ हो रहे अन्याय की ओर ध्यान आकर्षित करता है।
जर्मनी लेखक बर्तोल्त ब्रेख़्त का नाटक: आप जानते ही हैं मूल रूप से यह नाटक जर्मनी नाटककार और कवि बर्तोल्त ब्रेख़्त ने ‘कॉकेशियन चॉक सर्कल’ के नाम से लिखा है। इसका हिन्दी में स्व.कमलेश्वर ने रूपातंरण किया है। परंतु विवेचना के लिये इस नाटक का बुंदेली में रूपांतरण आशुतोष द्विवेदी और वंशिका पाण्डेय ने किया है।
भारत भवन का यह ख्यात नाटक रहा: आपको याद दिला दें, फ्रिट्ज़ बेनेविट्ज़ के निर्देशन में 1983-84 में इस नाटक का भारत भवन के कलाकारों ने, बुंदेली में ही मंचन किया था। ‘इंसाफ़ (खड़िया) का घेरा’ का घेरा नाम से तब इसके कई शोज़ हुए थे। इस नाटक के ज़रिये रंगमंडल को ख़ासी ख्याति मिली थी। इस नाटक में द्वारिका प्रसाद, विभा मिश्रा, सरोज शर्मा और विपिन शर्मा जैसे कलाकारों ने अपने अभिनय से नाटक में जान फूंक दी थी। नाटक में अजदक की भूमिका निभाने वाले स्व. द्वारिका के कहे जाने वाले संवाद – ‘हम कौनू नायक थोड़े ही हैं’.. इसपर ज़बरदस्त तालियां बजती थीं।
विवेचना ने दिया सक्षम रंगमंच का परिचय: विवेचना रंगमंडल के इस मंचन ने भी भारत भवन के उसी मंचन की याद दिला थी। साथ ही इस प्रस्तुति के ज़रिये अपने सक्षम रंगकर्म का परिचय दिया। अगर आप इस रिपोर्ट में प्रस्तुत तस्वीरों को ही देखें तो आप नाटक की जीवंतता का अनुमान लगा सकते हैं। असल में ‘न्याय को घेरा’ एक ऐसा नाटक है जिसमें जो ड्रामा चल रहा है, उसके अंदर भी एक और नाटक घटित होता है। उसका संदेश ये है कि असल में संसाधन उन्हीं के पास होने चाहिए जो संसाधनों का सर्वोत्तम उपयोग करते हैं।
मासूम बच्चे के जीवन से जुड़ी कहानी: नाटक की कहानी के अनुसार, राजकुमार चतुर सिंह, ‘जबलगढ़’ के सूबेदार की हत्या कर, उसके राज्य पर कब्जा कर लेता है। इस हमले के दौरान सूबेदार की पत्नी महल छोड़कर भाग निकलती है। भागते समय वह अपने मासूम बच्चे ‘वीर’ को महल में ही छोड़ देती है। वहाँ पर मौजूद एक दासी ‘सरोज’ मासूम बच्चे ‘वीर’ को उठा लेती है। वह उसे अपने पास ही रख लेती है और उसका अपने बच्चे की तरह पालन-पोषण करती है।
गरीबों का हमदर्द न्यायाधीश की एंट्री: इस बीच एक गाँव का मुंशी ‘अजदक’ न्यायाधीश बन जाता है। वह गरीबों के हक़ में फ़ैसले देने लगता है। उसी न्यायाधीश के सामने मासूम बच्चे ‘वीर’ का मामला भी आता है। इस बच्चे की दावेदार दो माँ है। एक माँ वो वह, जो अपनी जान बचाने के लिये बच्चे को महल में छोड़कर चली गई थी, दूसरी वह जिसने उसे हमले के वक्त बचाकर उसकी परवरिश की थी। न्यायाधीश अजदक नहीं जानता कि सच क्या है। मगर उसे फ़ैसला करना है कि ‘वीर’ की असली माँ कौन है? अजदक का ये फैसला ही नाटक को दिलचस्प बना देता है। साथ ही यह नाटक अपने व्यापक अर्थों में यह नाटक, जनता के नाम पर जनता के शोषण और मूल्यहीन सियासत का भी पर्दाफ़ाश करता है।
नाटक में कलाकारों का प्रशंसनीय अभिनय: नाटक में अक्षय सिंह के निर्देशन में कलाकारों ने प्रशंसनीय अभिनय किया। इनमें दासी सरोज, सूबेदारनी, अजदक और वीर जैसी भूमिकाएं निभाने वाले मुख्य कलाकारों के साथ ही सभी ने अपने-अपने स्तर पर बेहतर काम किया। नाटक में मंच पर अभिनय करने वाले कलाकारों में क्रमश: अदित्री पाण्डेय, वंशिका पाण्डेय, राशि वर्मा, स्वाति भट्ट, प्रभा जाधव, आस्था तिवारी, अनुज यादव, सावन सेन, आशु घुसिया, सौरभ केवट, ओम प्रकाश साहू, रितेश कनौजिया, आशीष वाल्मीक, कार्तिक कुमार नामदेव, बसंत पाण्डेय, अनिकेत मिश्रा, आर्यन गुप्ता देव्यांश चौधरी,नीतेश चौबे, अंशित तिवारी, मयंक जाधव, विकी तिवारी शामिल रहे।
गीत-संगीत और नृत्य ने दी गति: इसी तरह नाटक का गीत-संगीत ने भी दर्शकों को प्रभावित किया। नाटक को गति दी। नाटक का संगीत अमित चक्रवर्ती ने तैयार किया और गीत आशुतोष द्विवेदी ने लिखे। संगत करने वाले कलाकारों में क्रमश: दिनेश सिंह (हारमोनियम), समीर सराठे (तबला), तरुण सिंह ठाकुर (ढोलक), सत्यम तिवारी (बांसुरी) के साथ मनीष तिवारी, नमन मिश्रा, नमन राठौर, रोहित सिंह गायन मण्डली में रहे। नृत्य निर्देशन श्रीमती प्रगति पाण्डेय का रहा।
श्री कृष्ण का रहा विशेष सहयोग: प्रकाश परिकल्पना और संचालन विवेक पाण्डेय का रहा। रूप सज्जा नवीन चौबे, कार्तिक बैनर्जी, मनीष तिवारी ने किया। मंच प्रबंधन आशुतोष द्विवेदी और संतोष राजपूत का रहा। इस प्रस्तुति के लिये मार्गदर्शन सर्वश्री अरुण पाण्डेय, नवीन चौबे, तपन बैनर्जी और सीताराम सोनी का रहा। नाटक की प्रस्तुति कि लिये विशेष सहयोग श्री कृष्ण मालपाणी,अशोका हॉल स्कूल का रहा। रिपोर्ट पर प्रतिक्रिया दीजिये और पढ़िये यह विशेष रिपोर्ट –
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