Saturday, May 9, 2026
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बुज़ुर्ग सोच के गेम को पलटकर रख देता है नाटक ‘हैल्लो पापा’

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रिपोर्ट: शकील अख़्तर, चित्र: सुबोध नातू और प्राकुंर जोशी। सिर्फ़ 17 दिन में तैयार नाटक ‘हैल्लो पापा’ का इंदौर में पहला सीज़न कामयाब रहा। राकेश जोशी के लिखे और निर्देशित इस नाटक का निर्माण उनकी बेटी, जानी-पहचानी अभिनेत्री गुलकी जोशी ने किया है। यह नाटक वृद्धाश्रम में अपने-अपने हालात की वजह से आ पहुँचे 6 बुज़ुर्गों की कहानी (डार्क कॉमेडी) हैं। इनमें एक महिला भी शामिल है। बुज़ुर्गों की कहानी के बारे में सोचकर लगता है कि यह नाटक ज़रूर उनके हालात पर अपनी बात कहता होगा। बेशक यह उनकी बात तो रखता है, मगर नाटक उन्हें ख़ुद भी अपनी दशा के बारे में सोचने को मजबूर करता है। नाटक के अंदाज़ में कहें तो यह उनकी सोच के गेम को पलटकर रख देता है। उन्हें एक बड़ा झटका भी देता है। यही नाटक की खूबी है जिसे देखकर ही समझा जा सकता है।
पहले सीज़न में हुए कुल 4 शोज़: इंदौर में नाटक के 15 और 16 दिसंबर को खंडवा रोड स्थित देवी अहिल्या यूनिवर्सिटी सभागृह में कुल 4 शोज़ हुए। कई मायनों में इस शो ने नया इतिहास रचा। 1 घंटे 40 मिनट का यह नाटक सिर्फ 17 दिनों  में तैयार हुआ। नाटक के टिकट बुक माय शो के माध्यम से विक्रय किये गये। करीब 40 साल पहले शुरू की गई राकेश जोशी की नाट्य संस्था ‘कला निकेतन’ की फिर से सक्रिय हुई। इस संस्था के कुछ कलाकार, सालों बाद मंच पर दिखाई दिये। उन्होंने बड़ी सहजता से अपनी भूमिकाएं निभाईं। शहर में रंगमंच के 35 साल पुराने दौर की याद दिला दी। इनमें ओम जोशी, प्रसन्न शर्मा और प्राजंल श्रोत्रिय जैसे कलाकार उल्लेखनीय रहे। इतना ही नहीं नाटक के गीत ‘हैल्लो पापा’ में इंदौर के गायक, संगीतकार दिलीप बोस की आवाज़ फिर से रंगमंच पर सुनाई दी।
ताज़ा हुईं कला निकेतन की पुरानी यादें: इस नाटक के ज़रिये सालों बाद राकेश जोशी भी अपनी पुरानी टीम के साथ अपने शहर इंदौर से रूबरू हुए या कहें कि एक लंबे अरसे के बाद कलाकारों के बीच लौटे, पुरानी यादें ताज़ा की। उन्होंने शहर के रंगमंच को उन कलाकारों से फिर मिलाया जो कुछ समय से नेपथ्य में चले गये थे। बेशक उनकी टीम के साथ शहर के युवा और सक्रिय कलाकार भी पूरी ऊर्जा से जुड़े नज़र आए। इनमें चेतन शाह और तपन शर्मा शामिल रहे। हर शो से पहले उन पुराने कलाकारों को भी याद किया गया जो इस नाट्य समूह से जुड़े थे, जो अब इस दुनिया के रंगमंच पर नहीं। इनमें उन्नति शर्मा, दीपा तनवीर, अब्दुल रऊफ़ और सूर्यकांत भोजने रहे।
17 दिनों में मंच तक पहुँचा नाटक: 17 दिन में नाटक को जिस तरह से मंच पर ला खड़ा किया गया, यक़ीनन इसके पीछे राकेश जोशी का निर्देशन और उनका बरसों का अनुभव और समझ है। इसका दूसरा बड़ा पक्ष नाटक की कलाकार टीम भी है। मंच पर जितना सधा अभिनय कलाकारों ने किया, उतना ही नेपथ्य की टीम ने उनका साथ और सहयोग दिया। चाहे संगीत पक्ष हो, सैट या प्रकाश या फिर वेशभूषा और मेकअप। बैक स्टेज टीम में चेतन शाह, मिलिंद देशपांडे, तपन शर्मा, चेतन पान्धारकर, ऐनी हैड्फील्ड और दीपाली दाते आदि का सहयोग रहा। कलाकारों ने सहजता से निभाईं भूमिकाएं: अनिल चाफ़ेकर, दिलीप लोकरे और रजनीश दवे इस नाटक के ऐसे अभिनेता कलाकार हैं जो लगातार मंच पर काम कर रहे हैं। मंच पर उनकी टाइमिंग और अनुभव का रंग तो दिखा ही मगर बरसों बाद मंच पर दिखाई दिये ओम जोशी, प्रांजल श्रोत्रिय और प्रसन्न शर्मा भी अपने किरदारों में खूब जमे। राकेश जोशी की कलम ने नाटक के हर किरदार को जितने अलग ढंग से गढ़ा है, बुज़ुर्गों की भूमिकाओं वाले अभिनेताओं ने भी उसे उसी ढंग से मंच पर उन्हें सजीव किया। इनमें बुज़ुर्ग महिला की भूमिका में नेहा झरे भी शामिल हैं। इसी तरह दिवंगत पति-पत्नी के किरदारों में प्रसन्न शर्मा और मीनल शर्मा ने भी अपनी भूमिकाओं को बड़ी सहजता से निभाया, दोनों ही इस नाटक के मंतव्य को दर्शकों तक पहुँचने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाते हैं। अनिल चाफ़ेकर, ओम जोशी और रजनीश दवे ऐसे अभिनेता रहे जिन्हें उनके संवादों की वजह से दर्शकों की ख़ासी सराहना मिली।
गुलकी ने अदा की 3 अलग भूमिकाएं: नाटक की प्रोड्यूसर टीवी अभिनेत्री गुलकी जोशी और विकी यादव ने तीन अलग-अलग भूमिकाएं अदा कीं। शहर के रंगकर्मी चैतन्य शाह ने वृद्धाश्रम के प्रबंधक की भूमिका में नज़र आये। उन्होंने इस नाटक के निर्माण में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। नाटक में बतौर कैमरामैन, श्रृषभ की भी सहयोगी भूमिका रही।
खोलो ख़ुद अपने मन की गांठ:  यह नाटक कहने को उपेक्षित बुज़ुर्गों के जीवन की कहानी है। मगर असल में यह नाटक बुज़ुर्गों को खुद अपने भीतर झांककर देखने और अपना ही आत्म विश्लेषण करने के लिये प्रेरित करता है। नाटक बताता है कि बुढ़ापे में अपने हालात के लिये बेटे-बेटियों को कोसने और उन्हें गुनहगार बताने से पहले उन्हें अपने सत्य का भी अन्वेषण करना चाहिये। उन्हें देखना चाहिये कि कहीं जीवन के दु:स्वप्न के वे ही अपराधी तो नहीं?  सच को स्वीकार करने का संदेश: नाटक संदेश देता है कि जान दे देने से भी बढ़कर, सच को स्वीकार करना है। तब ही शिकायत करने वाले बुज़ुर्ग यह जान पायेंगे कि आख़िर उनके ही बच्चे क्योंकर उन्हें वृद्धाश्रम में छोड़ जाते हैं या फिर वो ख़ुद अपनी मर्ज़ी से आश्रम में रहने आये हैं लेकिन यहां आकर वो ख़ुश क्यों नहीं हैं ? ज़ाहिर है कि यह नाटक एक सामाजिक समस्या या मुद्दे को नये नज़रिये से देखता है और इस विषय पर एक गंभीर बहस को आमंत्रित करता है।नाटक में अपशब्दों का प्रयोग क्यों : नाटक को दर्शकों की बेहद सकारात्मक प्रतिक्रिया मिली है, इसके बावजूद बहुत से दर्शकों ने नाटक में अपशब्दों के प्रयोग को सही नहीं माना है। नाटक में पुलिसवाले के किरदार में अपशब्दों का उपयोग है जो इंदौर के दर्शकों को असहज लगा। उन्हें लगा कि रंगमंच कोई ओटीटी का प्लेटफार्म नहीं है। बिना गालियों के भी संवाद बोले जा सकते हैं। नाटक की गंभीरता को कायम रखा जा सकता है। निश्चित ही राकेश जोशी को दर्शकों की इस प्रतिक्रिया पर विचार करना चाहिये।
नाटक के नये शोज़ होंगे जल्द: यूनिवर्सिटी सभागृह के बाद नाटक के जल्द नये शोज़ भी तय किये जा रहे हैं।
आपको बता दें, नाटक के लेखक-निर्देशक राकेश जोशी इंदौर से बरसों पुराना नाता रहा है। वे वर्षों तक आकाशवाणी इंदौर में सेवारत रहे, साथ ही रंगमंच पर कला निकेतन का सफर तय करते रहे। करीब 3 दशक पहले परिस्थितियां बदली। राकेश जोशी पहले दिल्ली और फिर दिल्ली से आकाशवाणी मुंबई स्थानांतरित हुए। उसके बाद उनके कला कर्म के विस्तार का एक नया दौर शुरू हुआ। चूँकि मुंबई में उनकी बेटी गुल्की की परवरिश हुई, इसलिये उन्होंने परिवार कला विरासत को आगे बढ़ाने का काम किया। वे रंगमंच के साथ ही टीवी धारावाहिकों की जानी-पहचानी अभिनेत्री बन गई। अब प्रोड्यूसर के रूप में पापा के साथ मंच पर साथ निभा रही हैं। इंदौर में उनका भी यह पहला दिलचस्प अनुभव रहा। आगे पढ़िये –
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