Wednesday, April 15, 2026
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दिल पर गहरा असर करता है…’चचा’ केजी त्रिवेदी का रंगमंच

 भोपाल,25 अक्टूबर 2018 (इंदौर स्टुडियो डॉट कॉम)। चचा यानी केजी त्रिवेदी भोपाल के ऐसे वरिष्ठ रंग निर्देशक और गुरू हैं जिनकी राजधानी के रंगमंच कलाकार सराहना करते नहीं थकते। त्रिवेदी मंच के कलाकारों को इस खूबी से प्रशिक्षित करते हैं कि वे खुद आत्मविश्वास से भर उठते हैं। मंच पर बेहतर काम कर दिखाते हैं। उनके निर्देशित नाटकों की शैली भी ऐसी है जो दर्शकों के दिल और दिमाग पर गहरा असर डालती है। वे छोटी-छोटी चीज़ों से दृश्यों प्रभावशाली बना देते हैं। भोपाल में आज 25 अक्टूबर से शुरू हो रहे छह दिवसीय विभा मिश्रा स्मृति समारोह के मद्देनज़र हम उनकी निर्देशकीय शैली पर आधारित यह विशेष रिपोर्ट प्रकाशित कर रहे हैं। चचा त्रिवेदी बाल नाटकों और स्त्री प्रधान नाटकों के मंचनों के लिए विशेष रूप से पहचाने जाते हैं। उनकी इन्हीं विशेषताओं को अपनी  रिपोर्ट में रेखांकित कर रहे हैं रंगमंच से जुड़े कलाकार,लेखक-शिवकांत ‘मामा’

चचा के नाटक छोड़ते हैं अमिट प्रभाव : एक संहिता में प्राण फूँककर मंच पर सजीवित करने की कला ही नाट्य निर्देशन है। निर्देशक अपने अनुभवों को उपयोग कर नाटक में रंग भरते हैं। हर निर्देशक का जिया जीवन दूसरों से अलग होता है , इसीलिए हमें नाट्य निर्देशन में विविधता के दर्शन होते हैं । किंतु जिस नाटक का समाज से सरोकार नहीं,उस नाटक का अस्तित्व ही स्वीकार नहीं किया जा सकता। इस प्रश्न के उत्तर को ध्यान में रखकर जब आप केजी त्रिवेदी के नाटक देखते हैं तो वे न केवल इसपर खरे उतरते हैं बल्कि दर्शकों के दिलो-दिमाग़ पर अमिट छाप छोड़ते हैं। त्रिवेदी के नाटकों में समाज का वही रूप देखने को मिलता है, जैसा आप उसे देखते हैं।

नाटक ‘रूदाली’ , ‘नर-नारी’ , ‘सावित्री’ , ‘तथास्तु’, ‘वंशज’, ‘भूख आग है ‘ इसके अच्छे उदाहरण हैं। वे कहते भी हैं कि आप अगर ख़ुद समाज में जीते नहीं तो इस समाज के लिए नाटक नहीं बना सकते। वेश-भूषा और रूप सज्जा से अभिनेता उस समाज जैसा दिखने तो लगता है, पर उसका व्यवहार उसी समाज जैसा ही हो जिसका वो अंग है, रचने के लिए समाज की समझ ही मायने रखती है।

 प्रतीकात्मक शैली से नाटकों में फूंकते हैं जान :शैली की बात करें तो आपकी प्रतीकात्मक शैली कहना शायद सबसे उपयुक्त होगा। त्रिवेदी अपने नाटकों में उपयोग होने वाली चीज़ों को उनके विशिष्ट अर्थों के साथ प्रस्तुत करते हैं जिससे वे चीज़ ना रहकर प्रतीक बन जाते हैं। जैसे ‘वंशज’ नाटक में गुलाब के फूल को पुरुष पात्रों द्वारा जलाना , गुलाब की कोमलता और सुंदरता को स्त्री समाज का प्रतीक बना देता है और उनपर होने वाले अत्याचार को बिम्बित करता है। नाटक ‘सावित्री’ में एक भरी हुई गगरी , सावित्री को गोद मिलने वाली संतान का प्रतीक हो जाती है।  जब सावित्री अपने मन की ये इच्छा अपने पति ज्योतिबा फुले से कहती है तो उस गगरी को सावित्री बाई से अपने हाथ में लेना उनकी स्वीकृति बता देता है। नाटक ‘सावित्री’ में ही ज्योतिबाफुले के अंतिम संस्कार को अपने हाथों से करने का संकल्प लेती सावित्री बाई फुले का गुलाल का माथे पर लगाना और फिर पुरोहितों पर फेंकना न केवल क्रांति को बताता है बल्कि इस नई परम्परा का उत्सव होना भी परिलक्षित करता है। नाटक ‘रूदाली’ में चक्की को बेचने के लिए उस पर सफेद कपड़ा डाल बाहर ले जाना ,अर्थी का सा चित्र बनाता है , किसी की रोजी-रोटी की मृत्यु के मायने रचता दृश्य बन पड़ता है। नाटक ‘रुदाली’ में ही खाट को खड़ा भर करना जीवन में किसी संबंध के अंत होने का संकेत हो जाता है।  नाटक ‘आकार’ में जज का फैसला सुना कर स्वयं पिस्तौल चलाना ,न्याय तंत्र पर कटाक्ष बन जाता है कि कुछ मृत्युदण्ड न्याय नहीं वरन् शक्ति के प्रभाव में  सुनियोजित हत्याएँ  हैं।

छोटी-छोटी चीज़ों से बड़े दृश्यों का प्रभाव :प्रतीकात्मक शैली के अलावा , छोटी सी चीज़ों से बड़े दृश्य बना देना भी उनकी विशेषता है। जैसे नाटक – ‘गगन दमामा बाज्यो ‘ में काकोरी में लूट से पहले चलती ट्रेन का दृश्य सिर्फ रंगीन टॉर्चों के चलते प्रकाश से रचा गया है। ‘गगन दमामा बाज्यो’  में ही अंग्रेंज़ों द्वारा क्रांतिकारियों की खोज को भी स्टेज़ पर टार्च से  अलग-अलग स्पॉट पर देकर रचा गया। नाटक ‘वंशज’ में  प्रेमी युगल में लड़की के दुपट्टे को लड़के के अपने कंधे पर रखना उन्हें शादी के जोड़े में बदल देता है। प्रतीकात्मक शैली के प्रयोगों के बावजूद त्रिवेदी अतिरेक नहीं करते। नाटक का ‘कथ्य’ मज़बूती से उभरकर सामने आता है।

सिर्फ मनोरंजन ही नाटक का लक्ष्य नहीं: केजी त्रिवेदी की एक और विशेषता यह है कि वे सिर्फ मनोरंजन के लिए ही नाटकों का मंचन नहीं करते ,ना ही वे ऐसे काम को पसंद करते हैं। इसीलिए आपके नाटक में समाज को दी जाने वाली सीख साफ़ देखी जा सकती है। ‘तथास्तु’ जहाँ बेटियों को जन्म देने के लिए आवाज़ उठाता है तो ‘वंशज’ सूने गर्भों की व्यथा रेखांकित करता है। ‘हस्तिनापुर’ स्त्री के सत्ता अधिकार की बात करता है, जबकि ‘सावित्री’ दलितों और स्त्रियों के शिक्षा अधिकार का प्रश्न उठाता है । ‘आकार’ में व्यक्ति के सत्यनिष्ठ विचारों की अमरता का गान है। ‘भूख आग है’ समाज की स्वार्थता और सम्पन्नता के अंधेपन को आँखें दे रहा होता है। कुछ नाटकों को छोड़ दें तो आपके लगभग सभी नाटको के विषय-केंद्र में स्त्री ही रही है। ‘हस्तिनापुर’ हो या ‘सावित्री’ , ‘तथास्तु’ हो या रुदाली , ‘स्त्री मेरे भीतर’ हो या ‘वंशज’  या फिर ‘बिरज़ीस कदर का कुनबा’। समाज के अर्धांग को अपने पूर्णांग होने का अहसास दिलाने का जैसे बीड़ा लेकर वे अपनी यात्रा पर आगे बढ़ते जा रहे हैं।

रोबोट नहीं एक चैतन्य अभिनेता का निमार्ण: चचा त्रिवेदी एक निर्देशक के साथ साथ एक अध्यापक भी हैं। जवाहर बाल भवन में नाटक विभाग के अध्यापक हैं। एक निर्देशक का गुरू होना आपके साथ काम करने वाले अभिनेता और अभिनेत्रियों के लिए आशीर्वाद की तरह है। एक अभिनेता तभी विकास कर सकता है जब उसे उसकी कल्पना शक्ति के विकास का अवसर दिया जाए । आप अभिनेता को मात्र रोबोट मान निर्देश नहीं देते बल्कि उसे स्वयं खेलने की स्वतंत्रता  भी देते  हैं। यही बात आपको बाक़ी निर्देशकों से एकदम अलग करती है ।लाभ ये होता है कि आपका अभिनेता ख़ुद को आत्मविश्वास से भरा पाता है। साथ ही स्वयं की  कल्पनाशीलता का विकास कर एक परिपक्वअभिनेता बनने की अग्रसर होता है।  कोई रोबोट नहीं  मशीन नहीं बल्कि एक चैतन्य अभिनेता । आप बस साथ खड़े हो उसकी ग़लतियों को दूर करते जाते हैं। चाक पे घूमते मिट्टी के लौंदे की तरह अभिनेता अपनी गति पाता है और आपकी हल्की-हल्की थाप उसे उसका रूप देती जाती है। ये काम कोई निर्देशक नहीं बल्कि एक गुरू ही कर सकते हैं।                              ( indorestudio.com देशभर में कला और संस्कृति के क्षेत्र में काम कर रहे कलाकारों और कला संस्थाओं पर केंद्रित वेबसाइट है। आप भी हम से जुड़ सकते हैं। अपनी कला गतिविधियों, कार्यक्रमों, उपलब्धियों से जुड़ी खबरें और वीडियोज़ हमसे शेयर कर सकते हैं। संपर्क के लिए ई मेल करें indorestudio@gmail.com)

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